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टाइगर रिजर्व के हितों की रक्षा में नाकाम है महकमा

Wed, 10 Jun 2015 11:24 PM IST
पीलीभीत/माधोटांडा।
पीलीभीत/माधोटांडा। Updated Wed, 10 Jun 2015 11:24 PM IST
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Tiger Reserve
टाइगर रिजर्व की पहली वर्षगांठ पर अधिकारी भले ही खुश हो रहे हैं, पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। वर्ष भर संसाधन और बजट का रोना रोया गया। इसके प्रति विभाग कितना गंभीर है। इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि कोर एरिया की जमीन पर अतिक्रमण होने और अतिक्रमणकारियों से डंडे खाने के बाद अभी तक चार्जशीट तक नहीं भेजी जा सकी।
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नौ जून को टाइगर रिजर्व को एक साल पूरा हो गया।  टाइगर रिजर्व घोषित होने से पूर्व विभाग ने आननफानन में जंगल से सटी ग्राम पंचायतों में बिना बैठक कराए प्रधानों से प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करा लिए, जिसका विरोध अब तक हो रहा है। प्रस्ताव के समय जो वादे किए गए थे वह अब तक पूरे नहीं हुए। जंगल किनारे बसे लोगों का जंगल में प्रवेश बंद कर दिया गया लेकिन ईधन का कोई विकल्प नहीं दिया गया। जिससे उनके सामने समस्या खड़ी है, लेकिन विभाग जनता की समस्याएं तो दूर अपना बचाव भी नहीं कर पा रहा है। तराई क्षेत्र में टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में दर्ज जमीन पर कुछ माह पूर्व 38 लोगों ने कब्जा कर लिया था। इसे छुड़ाने का प्रयास किया गया तो कब्जेदारों ने वन अधिकारियों को दौड़ा दौड़ाकर पीटा था। इसके बाद में मुकदमा तो दर्ज कराया गया, लेकिन चार्जशीट नहीं भेजी गई। जमीन पर कब्जे बदस्तूर जारी हैं।
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धड़ल्ले से हो रही लकड़ी, घास और नरकुल की निकासी
टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद जंगल से जलौनी लकड़ी के अलावा घास, मछली शिकार, नरकुल आदि की निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन मिलीभगत के चलते सभी काम जारी हैं। साइकिलों से जलौनी लकड़ी आ रही है, वहीं जंगल से गुजरने वाली नहरों व अंदर के तालाबोें में मछली शिकार का अवैध रूप से ठेका भी दिया गया है। जिससे शिकार हो रहा है। घास और नरकुल भी जमकर आ रहा है। स्वयं वनविभाग में भी घास और लकड़ी का कटान कर टावर, झोपड़ी आदि बनवा रहा हैं।
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इस्लामुद्दीन/मुनिराज
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