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Pilibhit News: प्रशासन करता रहा सख्ती का दावा... किसानों ने साठा धान खूब उगाया
Sat, 01 Jul 2023 11:39 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
Updated Sat, 01 Jul 2023 11:39 PM IST
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मंडी में बिकता साठा धान।
पीलीभीत। साठा धान की खेती पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू कराने का प्रशासन दावा ही करता रह गया, लेकिन किसानों ने खूब साठा धान उगा डाला। धान लगाने के दौरान शिकायतें भी हुईं, लेकिन अफसर रोपाई रोकने में नाकाम रहे। धान की कटाई के बाद अब मंडी में इसकी बिक्री भी शुरू हो गई है। 20 दिनों में ही मंडी में 27 सौ बोरी साठा धान बिक चुका है।
साठा धान की रोपाई पर शासन ने प्रतिबंध लगा रखा है। अधिकारी दावा करते रहते हैं कि जिले में साठा धान की रोपाई नहीं होने दी जा रही है, लेकिन अधिकारियों के इन दावों की पोल अब मंडी में आ रहा साठा धान खोल रहा है। करीब बीस दिनों से मंडी में साठा धान की खूब आवक हो रही है। आढ़तियों की मानें तो अब तक मंडी में करीब 27 सौ बोरी से अधिक साठा धान आ चुका है। लगातार धान की आवक बनी हुई है।
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मोटा और महीन आ रहा धान, अलग-अलग है कीमत
मंडी में इस समय साठा धान की तीन श्रेणी आ रही हैं। इसमें एक मोटे और छोटे चावल का धान है। इसकी कीमत 1500 से 1700 रुपये प्रति क्विंटल है। महीन चावल का धान भी आ रहा है। यह कुछ बड़ा होता है। इसकी कीमत दो हजार रुपये प्रति क्विंटल है। तीसरी किस्म का धान सरबती की तरह है। इसका भाव 25 सौ से 26 सौ रुपये प्रति क्विंटल है। अच्छा होने पर भाव 2700 रुपये प्रति क्विंटल भी पहुंच रहा है। मंडी में इस धान को खरीदने के बाद पंजाब और हरियाणा भेजा जा रहा है।
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पानी का अधिक दोहन होने से लगा है प्रतिबंधित
जिला कृषि अधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि साठा धान चूंकि ग्रीष्मकाल में किया जाता है, लिहाजा इसे अधिक पानी की जरूरत होती है। उस दौरान बारिश नहीं होती, इसलिए किसानों को खुद ही जल्दी-जल्दी सिंचाई करनी पड़ती है। इसके लिए अंधाधुंध पानी का दोहन किया जाता है। इसे रोकने के लिए इस धान का उत्पादन प्रतिबंधित किया गया है। कुछ साल पहले यहां डीएम रहे वैभव श्रीवास्तव ने साठा धान की बुवाई पर प्रतिबंध लगाया था। इस पर कुछ किसान कोर्ट चले गए थे। यह मामला अब भी कोर्ट में विचाराधीन है।
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कम लागत और अधिक उपज होने से पैदा करते हैं साठा धान
लागत कम और उपज अधिक और दोहरी फसल का लाभ लेने के लिए किसान तराई में साठा धान की पैदावार कर रहे हैं। हालांकि इससे जल दोहन अधिक होता है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि साठा धान लगाने के बाद अन्य फसल को बोने पर उसमें कीट अन्य बीमारियां नहीं लगती हैं। इसलिए इसे लगाने से कई तरीके के लाभ होते हैं। इसके अलावा यह साठ दिन में पककर तैयार हो जाती है। जबकि दूसरी धान की फसलें तीन से चार महीने का समय ले लेती हैं।
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साठा धान की रोपाई पर शासन ने प्रतिबंध लगा रखा है। अधिकारी दावा करते रहते हैं कि जिले में साठा धान की रोपाई नहीं होने दी जा रही है, लेकिन अधिकारियों के इन दावों की पोल अब मंडी में आ रहा साठा धान खोल रहा है। करीब बीस दिनों से मंडी में साठा धान की खूब आवक हो रही है। आढ़तियों की मानें तो अब तक मंडी में करीब 27 सौ बोरी से अधिक साठा धान आ चुका है। लगातार धान की आवक बनी हुई है।
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मोटा और महीन आ रहा धान, अलग-अलग है कीमत
मंडी में इस समय साठा धान की तीन श्रेणी आ रही हैं। इसमें एक मोटे और छोटे चावल का धान है। इसकी कीमत 1500 से 1700 रुपये प्रति क्विंटल है। महीन चावल का धान भी आ रहा है। यह कुछ बड़ा होता है। इसकी कीमत दो हजार रुपये प्रति क्विंटल है। तीसरी किस्म का धान सरबती की तरह है। इसका भाव 25 सौ से 26 सौ रुपये प्रति क्विंटल है। अच्छा होने पर भाव 2700 रुपये प्रति क्विंटल भी पहुंच रहा है। मंडी में इस धान को खरीदने के बाद पंजाब और हरियाणा भेजा जा रहा है।
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पानी का अधिक दोहन होने से लगा है प्रतिबंधित
जिला कृषि अधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि साठा धान चूंकि ग्रीष्मकाल में किया जाता है, लिहाजा इसे अधिक पानी की जरूरत होती है। उस दौरान बारिश नहीं होती, इसलिए किसानों को खुद ही जल्दी-जल्दी सिंचाई करनी पड़ती है। इसके लिए अंधाधुंध पानी का दोहन किया जाता है। इसे रोकने के लिए इस धान का उत्पादन प्रतिबंधित किया गया है। कुछ साल पहले यहां डीएम रहे वैभव श्रीवास्तव ने साठा धान की बुवाई पर प्रतिबंध लगाया था। इस पर कुछ किसान कोर्ट चले गए थे। यह मामला अब भी कोर्ट में विचाराधीन है।
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कम लागत और अधिक उपज होने से पैदा करते हैं साठा धान
लागत कम और उपज अधिक और दोहरी फसल का लाभ लेने के लिए किसान तराई में साठा धान की पैदावार कर रहे हैं। हालांकि इससे जल दोहन अधिक होता है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि साठा धान लगाने के बाद अन्य फसल को बोने पर उसमें कीट अन्य बीमारियां नहीं लगती हैं। इसलिए इसे लगाने से कई तरीके के लाभ होते हैं। इसके अलावा यह साठ दिन में पककर तैयार हो जाती है। जबकि दूसरी धान की फसलें तीन से चार महीने का समय ले लेती हैं।