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थानों के कागजों में चल रहीं ग्राम सुरक्षा समितियां
पीलीभीत
Updated Fri, 05 Feb 2016 10:36 PM IST
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गांवों में आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए अर्सा पहले ग्राम सुरक्षा समितियों का गठन किया गया था, लेकिन यह सुरक्षा समितियां अर्से से सक्रिय नहीं हैं, जबकि जिले में लगातार आपराधिक घटनाएं हो रही हैं। बावजूद इसके महकमे ने कोई सुधार के प्रयास नहीं किए हैं। खास बात यह है कि अर्से से न तो थानों पर समितियों की कोई बैठक ही हुई और न ही पुलिस ने समितियों की कोई सुधि ली। सिर्फ यह समितियां कागजों पर चल रही हैं।
शासन के आदेश पर गांवों में करीब चार साल पहले ग्राम सुरक्षा समितियों का गठन किया गया था। इसके पीछे शासन की मंशा यह थी कि गांवों में सुरक्षा समितियों के होने से अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस को काफी मदद मिलेगी। गांवों में होने वाली हरेक गतिविधियों की जानकारी पुलिस को मिलेगी। इससे जहां एक तरफ पुलिस का गांव-गांव में अपना नेटवर्क रहेगा, वहीं पुलिस अपराधियों पर समय रहते हुए कार्रवाई कर सकेगी। इसके अलावा प्रतिमाह सुरक्षा समितियों की थाना स्तर पर बैठकें करने और बाकायदा इसका एक रजिस्टर बनाने और समितियों द्वारा दिए जाने वाले सुझावों को उसमें दर्ज कर उस पर अमल करना था। जिले में शासन के आदेश पर गांवों में पांच सदस्यीय टीम गठित हुई। शुरुआती दौर में तो थाना स्तरों पर बैठके हुईं, लेकिन ज्यों-ज्यो समय गुजरता गया। पुलिस ने सुरक्षा समितियों की सुधि लेनी बंद कर दी। इससे सदस्यों का समिति से मोह भंग होने लगा। ऐसा नहीं है कि समितियों के सक्रिय होने की जानकारी एसपी से लेकर थानेदारों तक नहीं है। फिर भी आला अफसर जिले में समितियों के सुधार और सक्रिय करने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए।
सुरक्षा समितियों के रजिस्टर के पन्ने भी जस के तस
जिले में 14 थाने हैं। इन थानों पर कागजों में सुरक्षा समितियां आज भी बदस्तूर संचालित हैं, लेकिन अगर थानों पर रखे समितियों को देखें तो अधिकांश थानों के रजिस्टर के चार-छह पन्नों को छोड़ दें तो शेष पन्ने आज भी खाली हैं। वर्ष 2016 में थानों पर बनाए गए सुरक्षा समितियों के रजिस्टर के पन्ने एक माह बीतने के बाद भी जस के तस हैं।
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सुरक्षा समितियां होने से जनता को भी लाभ मिलता है। थाना स्तर पर इसकी समीक्षा की जाएगी। यदि समितियां निष्क्रिय हैं तो उन्हें सक्रिय किया जाएगा।
- अनिल कुमार सिंह, एसपी
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शासन के आदेश पर गांवों में करीब चार साल पहले ग्राम सुरक्षा समितियों का गठन किया गया था। इसके पीछे शासन की मंशा यह थी कि गांवों में सुरक्षा समितियों के होने से अपराधों पर अंकुश लगाने में पुलिस को काफी मदद मिलेगी। गांवों में होने वाली हरेक गतिविधियों की जानकारी पुलिस को मिलेगी। इससे जहां एक तरफ पुलिस का गांव-गांव में अपना नेटवर्क रहेगा, वहीं पुलिस अपराधियों पर समय रहते हुए कार्रवाई कर सकेगी। इसके अलावा प्रतिमाह सुरक्षा समितियों की थाना स्तर पर बैठकें करने और बाकायदा इसका एक रजिस्टर बनाने और समितियों द्वारा दिए जाने वाले सुझावों को उसमें दर्ज कर उस पर अमल करना था। जिले में शासन के आदेश पर गांवों में पांच सदस्यीय टीम गठित हुई। शुरुआती दौर में तो थाना स्तरों पर बैठके हुईं, लेकिन ज्यों-ज्यो समय गुजरता गया। पुलिस ने सुरक्षा समितियों की सुधि लेनी बंद कर दी। इससे सदस्यों का समिति से मोह भंग होने लगा। ऐसा नहीं है कि समितियों के सक्रिय होने की जानकारी एसपी से लेकर थानेदारों तक नहीं है। फिर भी आला अफसर जिले में समितियों के सुधार और सक्रिय करने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए।
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सुरक्षा समितियों के रजिस्टर के पन्ने भी जस के तस
जिले में 14 थाने हैं। इन थानों पर कागजों में सुरक्षा समितियां आज भी बदस्तूर संचालित हैं, लेकिन अगर थानों पर रखे समितियों को देखें तो अधिकांश थानों के रजिस्टर के चार-छह पन्नों को छोड़ दें तो शेष पन्ने आज भी खाली हैं। वर्ष 2016 में थानों पर बनाए गए सुरक्षा समितियों के रजिस्टर के पन्ने एक माह बीतने के बाद भी जस के तस हैं।
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सुरक्षा समितियां होने से जनता को भी लाभ मिलता है। थाना स्तर पर इसकी समीक्षा की जाएगी। यदि समितियां निष्क्रिय हैं तो उन्हें सक्रिय किया जाएगा।
- अनिल कुमार सिंह, एसपी