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दिल दहला देने वाला हादसा, फिर भी लापरवाह रहा जिला अस्पताल प्रशासन
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जिला अस्पताल में इमरजेंसी के बाहर स्टेचर पर घायल और बोतल पकड़े खड़ा परिजन। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। असम हाईवे पर सुबह दिल दहला देने वाला हादसा होने के बाद जिसने सुना उसी का दिल दहल उठा, मगर जिला अस्पताल प्रशासन की लापरवाही पर कोई असर नहीं दिखाई दिया। घायलों के परिवार वाले ग्लूकोज की बोतल हाथ में पकड़कर खड़े दिखाई दिए। रेफर के दौरान भी काफी देर तक मरीज स्ट्रेचर पर ही धूप में लेटा रहा।
गजरौला क्षेत्र में हुए हादसे के बाद घायलों व मृतकों को जिला अस्पताल भेजा गया। सूचना पर डीएम भी अस्पताल पहुंच गए। डीएम के सामने तो स्टाफ मरीजों की देखभाल करता नजर आया। डीएम के जाते ही स्टाफ मरीजों को उनके परिजन के भरोसे छोड़ चलते बने। आलम यह था कि डाक्टरों ने हादसे में घायल संजीव शुक्ला को रेफर किया तो उनके परिवार वाले ही स्ट्रेचर लेकर इमरजेंसी कक्ष से एंबुलेंस तक लेकर पहुंचे। फिर भी कोई कर्मचारी उनके पास नहीं आया।
करीब आधा घंटा तक संजीव शुक्ला स्ट्रेचर पर लेटे रहे और उनके परिवार का एक सदस्य संजीव शुक्ला को लगी ग्लकोज की बोतल पकड़े रहा। कई बार उसने कर्मचारियों को बुलाने की कोशिश की, मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा कई अन्य मरीज भी इधर-उधर भकटते नजर आए, मगर अस्पताल का स्टाफ आस पास दिखाई नहीं दिया। जिला अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का दंश मरीजों को रोज ही झेलना पड़ता है, मगर जिम्मेदार इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं।
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गजरौला क्षेत्र में हुए हादसे के बाद घायलों व मृतकों को जिला अस्पताल भेजा गया। सूचना पर डीएम भी अस्पताल पहुंच गए। डीएम के सामने तो स्टाफ मरीजों की देखभाल करता नजर आया। डीएम के जाते ही स्टाफ मरीजों को उनके परिजन के भरोसे छोड़ चलते बने। आलम यह था कि डाक्टरों ने हादसे में घायल संजीव शुक्ला को रेफर किया तो उनके परिवार वाले ही स्ट्रेचर लेकर इमरजेंसी कक्ष से एंबुलेंस तक लेकर पहुंचे। फिर भी कोई कर्मचारी उनके पास नहीं आया।
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करीब आधा घंटा तक संजीव शुक्ला स्ट्रेचर पर लेटे रहे और उनके परिवार का एक सदस्य संजीव शुक्ला को लगी ग्लकोज की बोतल पकड़े रहा। कई बार उसने कर्मचारियों को बुलाने की कोशिश की, मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा कई अन्य मरीज भी इधर-उधर भकटते नजर आए, मगर अस्पताल का स्टाफ आस पास दिखाई नहीं दिया। जिला अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का दंश मरीजों को रोज ही झेलना पड़ता है, मगर जिम्मेदार इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं।
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