{"_id":"632a100912db525bb10d5fc3","slug":"ramlila-of-bisalpur-tehsildar-was-shocked-to-see-the-acting-of-shepherds-pilibhit-news-bly498230371","type":"story","status":"publish","title_hn":"चरवाहों का अभिनय देखकर हतप्रभ रहे गए थे तहसीलदार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चरवाहों का अभिनय देखकर हतप्रभ रहे गए थे तहसीलदार
सार
नगर का ऐतिहासिक रामलीला मेला एक सदी से अधिक समय का सफर तय कर चुका है।कमेटी के पदाधिकारी इसका श्रेय मोहल्ला दुबे के लोगों को देते हैं।इससे चरवाहों को प्रोत्साहन मिला और वे अच्छे तरीके से मंचन करने लगे।मेला कमेटी के उपसभापति विष्णु गोयल बताते हैं कि यहां के रामलीले मेले की एक अलग पहचान है।
विज्ञापन
बीसलपुर रामलीला मैदान का लंका भवन। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
विस्तार
बीसलपुर। नगर का ऐतिहासिक रामलीला मेला एक सदी से अधिक समय का सफर तय कर चुका है। कमेटी के पदाधिकारी इसका श्रेय मोहल्ला दुबे के लोगों को देते हैं। कहा जाता है कि मोहल्ले के चरवाहे गुलेश्वरनाथ मंदिर के पास पशुओं को चराने दौरान आपस में ही लीला मंचन करते थे। एक दिन उधर से बीसलपुर के प्रथम तहसीलदार भूपसिंह गुजर रहे थे। चरवाहों की अभिनय कला को देखकर वह आश्चर्य में पड़ गए और उनकी प्रशंसा की। साथ ही उनका आर्थिक सहयोग भी किया। इससे चरवाहों को प्रोत्साहन मिला और वे अच्छे तरीके से मंचन करने लगे।
मेला कमेटी के उपसभापति विष्णु गोयल बताते हैं कि यहां के रामलीले मेले की एक अलग पहचान है। इसकी शुरुआत लगभग वर्ष 1920 में हुई थी। शुरू के कुछ वर्षों तक तो रामलीला छोटे स्थान पर मंच पर होती रही। बाद में मैदान में होने लगी। बीसलपुर में आकर बसे बदायूं के कटहरिया जाति के लोगों ने भी चरवाहों का काफी सहयोग किया था। मेेला पूरे एक माह तक चलता है।
शुुरुआत में मेले का आयोजन चंदे से होता था। वर्ष 1936 में मेले की बागडोर मोहल्ला दुबे निवासी अधिवक्ता देवीदास ने अपने हाथों में ले ली थी। बताया जाता है कि देवीदास वैसे तो वकालत करने रोजाना जिला मुख्यालय जाते थे, लेकिन मेले दौरान वह नहीं जाते थे। लीला मंचन में मोहल्ला दुबे और दुर्गा प्रसाद के पात्र ही भूमिका निभाते हैं।
विज्ञापन
आज से शुरू होगी रामलीला, तैयारियां पूरी
मेला कमेटी ने बुधवार से शुरू होने वाले रामलीला मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। उपसभापति ने बताया कि मेला परिसर में भरा बारिश का पानी पंपसेट से निकलवा दिया है। मिट्टी डलवाकर मेला परिसर के ऊबड़-खाबड़ हिस्से को समतल करा दिया गया है। खेल-तमाशे वाले और दुकानें लगना शुरू हो गई हैं। बुधवार को गणेश पूजन के साथ मेला शुरू होगा।
वाराणसी की तर्ज पर मैदान में होता है मंचन
यहां रामलीला मंच पर नहीं होती, बल्कि वाराणसी के कस्बा रामनगर की तरह विशालकाय मैदान में होती है। पात्र मैदान में घूम-घूम कर अपनी भूमिका अदा करते हैं। लीला के दौरान मैदान के चारों ओर मजबूत जाल लगाया जाता है।
पुरुष व किन्नर निभाते हैं महिला पात्रों की भूमिका
मेले में सीता, उर्मिला, मंदोदरी, सुलोचना, कैकई, सुमित्रा, मंथरा आदि महिला पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते हैं। इन में कुछ महिला पात्रों की भूमिका किन्नर भी निभाते हैं।
सिर्फ ब्राह्मण ही बनते हैं रामादल के पात्र
रामलीला में रामादल के सभी पात्र सिर्फ ब्राह्मण ही बनते हैं। रावणदल में सभी बिरादरी के लोग बनते हैं। यह परंपरा शुरू से अभी तक बरकरार है।
विज्ञापन
मेला कमेटी के उपसभापति विष्णु गोयल बताते हैं कि यहां के रामलीले मेले की एक अलग पहचान है। इसकी शुरुआत लगभग वर्ष 1920 में हुई थी। शुरू के कुछ वर्षों तक तो रामलीला छोटे स्थान पर मंच पर होती रही। बाद में मैदान में होने लगी। बीसलपुर में आकर बसे बदायूं के कटहरिया जाति के लोगों ने भी चरवाहों का काफी सहयोग किया था। मेेला पूरे एक माह तक चलता है।
विज्ञापन
शुुरुआत में मेले का आयोजन चंदे से होता था। वर्ष 1936 में मेले की बागडोर मोहल्ला दुबे निवासी अधिवक्ता देवीदास ने अपने हाथों में ले ली थी। बताया जाता है कि देवीदास वैसे तो वकालत करने रोजाना जिला मुख्यालय जाते थे, लेकिन मेले दौरान वह नहीं जाते थे। लीला मंचन में मोहल्ला दुबे और दुर्गा प्रसाद के पात्र ही भूमिका निभाते हैं।
विज्ञापन
आज से शुरू होगी रामलीला, तैयारियां पूरी
मेला कमेटी ने बुधवार से शुरू होने वाले रामलीला मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। उपसभापति ने बताया कि मेला परिसर में भरा बारिश का पानी पंपसेट से निकलवा दिया है। मिट्टी डलवाकर मेला परिसर के ऊबड़-खाबड़ हिस्से को समतल करा दिया गया है। खेल-तमाशे वाले और दुकानें लगना शुरू हो गई हैं। बुधवार को गणेश पूजन के साथ मेला शुरू होगा।
वाराणसी की तर्ज पर मैदान में होता है मंचन
यहां रामलीला मंच पर नहीं होती, बल्कि वाराणसी के कस्बा रामनगर की तरह विशालकाय मैदान में होती है। पात्र मैदान में घूम-घूम कर अपनी भूमिका अदा करते हैं। लीला के दौरान मैदान के चारों ओर मजबूत जाल लगाया जाता है।
पुरुष व किन्नर निभाते हैं महिला पात्रों की भूमिका
मेले में सीता, उर्मिला, मंदोदरी, सुलोचना, कैकई, सुमित्रा, मंथरा आदि महिला पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते हैं। इन में कुछ महिला पात्रों की भूमिका किन्नर भी निभाते हैं।
सिर्फ ब्राह्मण ही बनते हैं रामादल के पात्र
रामलीला में रामादल के सभी पात्र सिर्फ ब्राह्मण ही बनते हैं। रावणदल में सभी बिरादरी के लोग बनते हैं। यह परंपरा शुरू से अभी तक बरकरार है।

बीसलपुर रामलीला मैदान का अयोध्या भवन। संवाद- फोटो : PILIBHIT