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रावण दहन के साथ राम के जयकारे, उमड़े श्रद्धालु
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बीसलपुर रामलीला में रावण वध लीला का मंचन।
- फोटो : PILIBHIT
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बीसलपुर। नगर के ऐतिहासिक रामलीला मेले में शुक्रवार की शाम अहिरावण वध और रावण वध लीला का मंचन हुआ। रावण के पुतला दहन के साथ मंचन समाप्त हो गया। जैसे ही पुतला दहन हुआ तो राम के जयकारे गूंज उठे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
अपराह्न चार बजे लीला का शुभारंभ उस समय होता है, जब दोनों दलों से युद्ध का आवाहन किया जाता है। उसके बाद रामादल और रावण दल में घनघोर युद्ध होता है। रावण दल जब पराजित होने लगता है, तभी लंकापति रावण के निर्देश पर पाताल लोक से अहिरावण को बुलाया जाता है। अहिरावण अपनी कूटनीति के चलते रामादल से राम और लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल लोक में ले जाता है। अहिरावण राम और लक्ष्मण की बलि देने के लिए तैयारी करने लगता है। इसी बीच रामादल से राम और लक्ष्मण के अचानक गायब हो जाने से रामादल में हड़कंप मच जाता है। विभीषण बताते हैं कि अहिरावण के अलावा राम और लक्ष्मण का कोई भी अपहरण नहंी कर सकता है। यह जानकारी होते ही हनुमान पाताल लोक को रवाना होते हैं। वहां अहिरावण के राजमहल के द्वार पर पहरेदारी कर रहे मकरध्वज से हनुमान की मुलाकात होती है। मुलाकात में हनुमान केा पता चलता कि मकरध्वज उन्हीं का पुत्र है। पहले तो हनुमान मकरध्वज से रास्ता देने को कहते हैं लेकिन मंकरध्वज अपनी स्वामि भक्ति का हवाला देते हुए हनुमान से युद्ध करने को कहता है। और कोई रास्ता न देख हनुमान युद्ध कर मकरध्वज को पराजित कर भीतर प्रवेश कर जाते हैं। हनुमान अहिरावण का वध कर बंधन में बंधे राम और लक्ष्मण को कंधो पर बैठाकर रामादल में ले आते हैं। राम और लक्ष्मण को देखकर रामादल में खुशी की लहर दौड़ जाती है। उधर, अहिरावण का वध होने की सूचना मिलने पर लंका में शोक की लहर दौड़ जाती है। उसके बाद युद्ध स्थल पर राम और रावण का भयंकर युद्ध होता है। राम द्वारा बार बार शीश काटने के बाद भी रावण शीश उग आते हैं, जिससे राम पशोपेश में पड़ जाते हैं। विभीषण द्वारा बताए जाने पर राम वाण मारकर रावण की नाभि का अमृत सुखाते हैं। उसके बाद राम रावण को मार देते हेैं। मरने से पहले राम के आदेश पर लक्ष्मण रावण के सिर के पास खड़े होकर राजनीति की शिक्षा लेने जाते हैं। रावण कहता है कि यदि उन्हें शिक्षा लेनी है तो पैरों के पास खड़ा होना पड़ेगा। राम का इशारा पाकर लक्ष्मण रावण के पैरों के पास खड़ा होता है। उसके बाद रावण लक्ष्मण को राजनीति की शिक्षा देता है। प्राण त्यागने से पहले रावण राम से कहता है कि उसने अपने जीते जी राम को लंका में प्रवेश नहंी करने दिया और वह (रावण) राम के जीते जी राम के बैकुंठ धाम में जा रहा हेै। रावण राम से सवाल करता है कि इसमें जीत किसकी हुई। राम कहते हैं कि जीत रावण की हुई है। इसी के साथ रावण प्राण त्याग देता है और दर्शक भगवान राम के जयकारे लगाने लगते हैं। इसके बाद लीला स्थल पर रखा गया रावण का पुतला फूं का जाता है। पुतला दहन से पहले मेला कमेटी द्वारा रावण के शीश रूपी बनाए गए कागज के गुब्बारे आसमान में उड़ाए गए। मेला कमेटी के लीला प्रबंधक गोपाल कृष्ण अग्रवाल की देख रेख में हुई लीला का संचालन मनोज त्रिपाठी, अवधेश भट्ट और उपेंद्र शंखधार ने रामायण की चौपाइयां, दोहे और छंद पढ़कर किए। रावण वध लीला देखने भारी संख्या में दर्शक उमड़ पड़े थे। इस मौके पर मेला कमेटी के सभी पदाधिकारी मौजूद थे।
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अपराह्न चार बजे लीला का शुभारंभ उस समय होता है, जब दोनों दलों से युद्ध का आवाहन किया जाता है। उसके बाद रामादल और रावण दल में घनघोर युद्ध होता है। रावण दल जब पराजित होने लगता है, तभी लंकापति रावण के निर्देश पर पाताल लोक से अहिरावण को बुलाया जाता है। अहिरावण अपनी कूटनीति के चलते रामादल से राम और लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल लोक में ले जाता है। अहिरावण राम और लक्ष्मण की बलि देने के लिए तैयारी करने लगता है। इसी बीच रामादल से राम और लक्ष्मण के अचानक गायब हो जाने से रामादल में हड़कंप मच जाता है। विभीषण बताते हैं कि अहिरावण के अलावा राम और लक्ष्मण का कोई भी अपहरण नहंी कर सकता है। यह जानकारी होते ही हनुमान पाताल लोक को रवाना होते हैं। वहां अहिरावण के राजमहल के द्वार पर पहरेदारी कर रहे मकरध्वज से हनुमान की मुलाकात होती है। मुलाकात में हनुमान केा पता चलता कि मकरध्वज उन्हीं का पुत्र है। पहले तो हनुमान मकरध्वज से रास्ता देने को कहते हैं लेकिन मंकरध्वज अपनी स्वामि भक्ति का हवाला देते हुए हनुमान से युद्ध करने को कहता है। और कोई रास्ता न देख हनुमान युद्ध कर मकरध्वज को पराजित कर भीतर प्रवेश कर जाते हैं। हनुमान अहिरावण का वध कर बंधन में बंधे राम और लक्ष्मण को कंधो पर बैठाकर रामादल में ले आते हैं। राम और लक्ष्मण को देखकर रामादल में खुशी की लहर दौड़ जाती है। उधर, अहिरावण का वध होने की सूचना मिलने पर लंका में शोक की लहर दौड़ जाती है। उसके बाद युद्ध स्थल पर राम और रावण का भयंकर युद्ध होता है। राम द्वारा बार बार शीश काटने के बाद भी रावण शीश उग आते हैं, जिससे राम पशोपेश में पड़ जाते हैं। विभीषण द्वारा बताए जाने पर राम वाण मारकर रावण की नाभि का अमृत सुखाते हैं। उसके बाद राम रावण को मार देते हेैं। मरने से पहले राम के आदेश पर लक्ष्मण रावण के सिर के पास खड़े होकर राजनीति की शिक्षा लेने जाते हैं। रावण कहता है कि यदि उन्हें शिक्षा लेनी है तो पैरों के पास खड़ा होना पड़ेगा। राम का इशारा पाकर लक्ष्मण रावण के पैरों के पास खड़ा होता है। उसके बाद रावण लक्ष्मण को राजनीति की शिक्षा देता है। प्राण त्यागने से पहले रावण राम से कहता है कि उसने अपने जीते जी राम को लंका में प्रवेश नहंी करने दिया और वह (रावण) राम के जीते जी राम के बैकुंठ धाम में जा रहा हेै। रावण राम से सवाल करता है कि इसमें जीत किसकी हुई। राम कहते हैं कि जीत रावण की हुई है। इसी के साथ रावण प्राण त्याग देता है और दर्शक भगवान राम के जयकारे लगाने लगते हैं। इसके बाद लीला स्थल पर रखा गया रावण का पुतला फूं का जाता है। पुतला दहन से पहले मेला कमेटी द्वारा रावण के शीश रूपी बनाए गए कागज के गुब्बारे आसमान में उड़ाए गए। मेला कमेटी के लीला प्रबंधक गोपाल कृष्ण अग्रवाल की देख रेख में हुई लीला का संचालन मनोज त्रिपाठी, अवधेश भट्ट और उपेंद्र शंखधार ने रामायण की चौपाइयां, दोहे और छंद पढ़कर किए। रावण वध लीला देखने भारी संख्या में दर्शक उमड़ पड़े थे। इस मौके पर मेला कमेटी के सभी पदाधिकारी मौजूद थे।
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