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एक्सईएन साहब ! न तो इसमें श्रम है, न ही दान, फिर कैसा श्रमदान

Tue, 17 Dec 2019 02:48 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 17 Dec 2019 02:48 AM IST
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पीलीभीत। सिंचाई विभाग के एक्सईएन ने अमरिया में डीबी फीडर नहर की श्रमदान से सिल्ट सफाई कराने की ऐसी योजना बनाकर अफसरों के समक्ष प्रस्तुत की, जिसे अफसर तक ठीक से समझ नहीं पाए हैं। नहर की सिल्ट सफाई में न तो श्रम था, न ही दान। फिर पता नहीं कि सिंचाई विभाग के इंजीनियर ने कैसा श्रमदान कराया। खास बात यह कि श्रमदान करने वाले न तो समाजसेवी थे, न ही नहर से अपनी जरूरतों का पानी सिंचाई के लिए लेने वाले किसान। इस तरह के अद्भुत श्रमदान में सिर्फ ठेकेदार शामिल किए गए। जिन्होंने श्रमदान के नाम पर 21 किलोमीटर लंबी नहर कई फुट गहरे तक खोदकर खनन विभाग के नियमों का उल्लंघन करते हुए अनाधिकृत तरीके से नहर के किनारे 10 करोउ़ से ज्यादा का रेत जमा कर लिया। ये सिंचाई विभाग के इंजीनियर ही जानते हैं कि जब श्रमदान से ही नहर साफ होनी थी तो फिर इसके तीन बार टेंडर कराने की क्या जरूरत पड़ गई। श्रमदान के लिए समाजसेवी या किसान बुलाने के बजाय 10 ठेकेदारों को ही क्यों चुना गया? फिर ठेकेदार बिना पैसे कमाए कब से श्रमदान करने लगे।
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अमरिया क्षेत्र में डीबी फीडर नहर की सफाई लंबे समय से नहीं कराई गई थी। योगी सरकार ने सिल्ट सफाई के बजट पर रोक लगा दी तो सिंचाई विभाग के इंजीनियरों ने उसमें भी कमाई का नया तरीका खोज निकाला। अफसरों के सामने श्रमदान से नहर सफाई का प्रोजेक्ट बनाकर अनुमोदन के लिए प्रस्तुत कर उनको समझाया गया कि अगर श्रमदान से नहर साफ कराई जाए तो सिल्ट भी निकल जाएगा और 55 रुपये प्रति घन मीटर के हिसाब से राजस्व की आमदनी भी हो जाएगी। उच्चाधिकारियों को भी इंजीनियरों का यह प्रोजेक्ट पसंद आया। मगर, वह इंजीनियरों का दिमाग ठीक से पढ़ नहीं पाए। सिंचाई विभाग ने 10 पुराने ठेकेदारों को सिल्ट सफाई के टेंडर दे दिए। ठेकेदारों ने श्रमदान से सिल्ट सफाई के नाम पर नहर को कई फुट गहरे से खोदकर रेत निकालकर उसके ढेर लगा दिए। सिंचाई विभाग के इंजीनियर यही कहते रहे कि वह सरकार और किसानों के हित में नया काम कर रहे हैं। इसमें सिल्ट सफाई का बजट भी बचेगा और नहर भी साफ हो जाएगी। मगर, इसी श्रमदान की आड़ में इस पूरे सिंडीकेट ने 10 से 12 करोड़ की कमाई का हिसाब बना लिया।
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फिर भी हो रही रेत की बिक्री
इस समय मकान बनाने वाले एक ट्रॉली रेत को 2500 से 3500 रुपये तक में खरीदते हैं। ट्रॉली में 20 से 25 क्विंटल तक रेत आती है। खनन निकासी नियमों के अनुसार अगर किसी नदी या नहर से रेत निकाली जाती है तो ठेकेदार को 375 रुपये प्रति घन मीटर की दर से रॉयल्टी देनी पड़ती है। मगर यहां ठेकेदारों का काम 55 रुपये प्रति घन मीटर की रॉयल्टी देकर ही चल गया। मगर, सिचाई विभाग के इस खेल सें खनन राजस्व का 8.5 करोड़ का नुकसान हो गया। हालांकि जिलाधिकारी ने रेत की बिक्री पर रोक लगा दी है। फिर भी रेत की बिक्री जारी है। ठेकेदार 35 से 40 ट्रैक्टर ट्रॉली रेत रोजाना बेच रहे हैं। इस पूरे खेल में खनन विभाग की अनुमति नहीं दी गई। इसके चलते इसमें बड़े अफसरों की गर्दन भी फंस सकती है।
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इन नियमों का है उल्लंघन
1- माइन्स एंड मिनिरल डवलपमेंट एंड रेग्यूलेशन एक्ट 1957 की धारा 4 का उल्लंघन है क्योंकि इसके लिए खनन विभाग से रेत निकालने का कोई लाइसेंस जारी नहीं किया गया है।
2- नदी या नहर से बिना लाइसेंस खनन कर रेत निकालने पर धारा 21 का उल्लंघन है। इसमें खनन निकासी करने वाले को पांच साल की सजा या पांच लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।

3- बिना किसी खनन निकासी प्लान के 500 घन मीटर से अधिक की रेत निकासी में मिट्टी की खुदाई नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल के पर्यावरण नियमों का उल्लंघन है।
4- नदी तल से 10 किलोमीटर अंदर खनन निकासी कर उसका भंडारण बिना किसी प्रशासनिक अधिकारी की अनुुमति के करना भी अपराध है।
नहर से रेत निकासी की प्रशासनिक स्तर पर कोई अनुमति नहीं ली गई। खनन की बिक्री पर रोक लगा दी गई है। कहीं कोई अनियमितता मिली तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। वैभव श्रीवास्तव, डीएम
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