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लागत बढ़ी तो इस बार घट गया चार हजार हेक्टेयर धान का रकबा
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पूरनपुर क्षेत्र में धान की रोपाई करते लोग। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। खाद और कीटनाशक दवाओं की बढ़ी कीमतों का असर इस बार धान की रोपाई पर साफ दिख रहा है। पिछले साल के मुकाबले इस बार जिले में करीब चार हजार हेक्टेयर से ज्यादा धान का रकबा कम हो गया है। पिछले साल रकबा 1.39 लाख हेक्टेयर था, लेकिन इस बार 134907 हेक्टेयर ही रह गया है। छोटे किसानों ने धान की खेती से बना ली है। दूसरी तरफ गन्ने का रकबा सात फीसदी तक बढ़ा है।
इस बार खाद, जिंक, खरपतवार नाशक, कीटनशाक दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हो गई है। यूरिया खाद को छोड़ दें तो सभी प्रकार की खादों के दाम बढ़ेे हैं। डीएपी के दाम 1200 रुपये से बढ़कर 1350 रुपये हो गए। सिंगल सुपर फास्फेट जिसका 50 किलो का बैग 360 से 370 का मिलता था इस बार 500 रुपये से ऊपर है। कीटनाशक दवाओं की कीमत प्रति लीटर 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई। 500 रुपये लीटर वाली दवा इस बार 650 रुपये लीटर है। पोटाश और अन्य फर्टिलाइजर काफी महंगे हो गए। दूसरी तरफ डीजल के दाम भी बढ़े हैं।
इन सबका असर धान की खेती पर सीधा असर डाल रहा है। सिर्फ रोपाई की लागत ही 20 फीसदी तक ज्यादा बैठ रही है। किसान मुबारक हुसैन बताते हैं कि इस बार तीन एकड़ कम धान लगा रहे हैं। हर चीज महंगी हो गई इसलिए गन्ना की फसल लगा दी। कजरी के विक्की बताते हैं कि हर साल 50 एकड़ धान लगाते थे इस बार ठेके की जमीन छोड़ दी। जादौंपुर खुर्द के भिखारी लाल कहते हैं तीन एकड़ जमीन है। धान लगाना मजबूरी है, लेकिन इस बार खर्चा ज्यादा आ रहा है। सुक्का सिंह ने इस बार सिर्फ खाने के लिए धान लगाया बाकी पर गन्ना लगा दिया।
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लागत ज्यादा मुनाफा कम
धान की लागत प्रति 20 हजार बैठ जाती है। उत्पादन उतना होता नहीं। दूसरी तरफ धान की फसल में बीमारियां बहुत लगती हैं। इसका भी असर पड़ा। बिक्री के समय अच्छी कीमत नहीं मिलती। हालांकि इस बार सरकार ने धान का समर्थन मूल्य सौ रुपये बढ़ा 2040 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया, लेकिन किसान इससे खुश नहीं हैं। यही वजह है किसानों ने गन्ने की फसल ज्यादा लगाई है। इस बार गन्ने का रकबा सात फीसदी तक बढ़ा है।
इस बार धान का रकबा थोड़ा कम हुआ है। पिछले साल जिले में 1.39 लाख हेक्टेयर धान की रकबा था। इस बार 134907 हेक्टेयर है। रकबा कम होने के तमाम कारण हो सकते हैं। उपज कम होना, लागत ज्यादा बैठना, बीमारियां ज्यादा लगती हैं एक ये भी कारण हो सकता है। -विनोद कुमार यादव, जिला कृषि अधिकारी
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इस बार खाद, जिंक, खरपतवार नाशक, कीटनशाक दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हो गई है। यूरिया खाद को छोड़ दें तो सभी प्रकार की खादों के दाम बढ़ेे हैं। डीएपी के दाम 1200 रुपये से बढ़कर 1350 रुपये हो गए। सिंगल सुपर फास्फेट जिसका 50 किलो का बैग 360 से 370 का मिलता था इस बार 500 रुपये से ऊपर है। कीटनाशक दवाओं की कीमत प्रति लीटर 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई। 500 रुपये लीटर वाली दवा इस बार 650 रुपये लीटर है। पोटाश और अन्य फर्टिलाइजर काफी महंगे हो गए। दूसरी तरफ डीजल के दाम भी बढ़े हैं।
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इन सबका असर धान की खेती पर सीधा असर डाल रहा है। सिर्फ रोपाई की लागत ही 20 फीसदी तक ज्यादा बैठ रही है। किसान मुबारक हुसैन बताते हैं कि इस बार तीन एकड़ कम धान लगा रहे हैं। हर चीज महंगी हो गई इसलिए गन्ना की फसल लगा दी। कजरी के विक्की बताते हैं कि हर साल 50 एकड़ धान लगाते थे इस बार ठेके की जमीन छोड़ दी। जादौंपुर खुर्द के भिखारी लाल कहते हैं तीन एकड़ जमीन है। धान लगाना मजबूरी है, लेकिन इस बार खर्चा ज्यादा आ रहा है। सुक्का सिंह ने इस बार सिर्फ खाने के लिए धान लगाया बाकी पर गन्ना लगा दिया।
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लागत ज्यादा मुनाफा कम
धान की लागत प्रति 20 हजार बैठ जाती है। उत्पादन उतना होता नहीं। दूसरी तरफ धान की फसल में बीमारियां बहुत लगती हैं। इसका भी असर पड़ा। बिक्री के समय अच्छी कीमत नहीं मिलती। हालांकि इस बार सरकार ने धान का समर्थन मूल्य सौ रुपये बढ़ा 2040 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया, लेकिन किसान इससे खुश नहीं हैं। यही वजह है किसानों ने गन्ने की फसल ज्यादा लगाई है। इस बार गन्ने का रकबा सात फीसदी तक बढ़ा है।
इस बार धान का रकबा थोड़ा कम हुआ है। पिछले साल जिले में 1.39 लाख हेक्टेयर धान की रकबा था। इस बार 134907 हेक्टेयर है। रकबा कम होने के तमाम कारण हो सकते हैं। उपज कम होना, लागत ज्यादा बैठना, बीमारियां ज्यादा लगती हैं एक ये भी कारण हो सकता है। -विनोद कुमार यादव, जिला कृषि अधिकारी