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आरएसएस की परेड में गूंजते थे नवाब की बनाई बांसुरी के सुर
Thu, 03 Dec 2020 01:33 AM IST
बरेली ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
Published by: बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 03 Dec 2020 01:33 AM IST
सार
- आलीशान घर को छोड़ खपरैलनुमा घर को बनाया हुआ था कर्मस्थली
- देश के अलावा अमेरिका, फ्रांस और श्रीलंका तक पहुंचाई बांसुरी
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नवाब अहमद (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
विस्तार
बांसुरी बनाने में ही नहीं, बांसुरी बजाने में भी महारत हासिल थी नवाब अहमद को
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पीलीभीत। शहर के लाल रोड मोहल्ला बशीर खां के उस खपरैलनुमा घर में आज सन्नाटा पसरा था, वहां न तो बांसुरी बनने की खटपट सुनाई दे रही थी और न ही बांसुरी के सुर ही बिखर रहे थे। आलीशान घर से सटा यह खपरैलनुमा घर मशहूर बांसुरी कारीगर नवाब अहमद की कर्मस्थली है। जहां वह दिन-रात बांसुरी को बेहतर से बेहतर बनाने की कला साधना में जुटे रहते थे। बांसुरी कारीगर नवाब तो दुनिया से रुखसत हो गए, मगर उनकी रुखसती पर हर उस शख्स की आंखें नम हैं, जिनकी कानों में उनकी बांसुरी ने कभी मधुर सुर घोले थे। इसी खपरैलनुमा घर में बनी बांसुरियों ने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बनाई। आरएसएस की होने वाली परेड में भी उन्हीं की बनाई बांसुरी के सुर गूंजते हैं।
यूं तो संगीत में कई वाद्य यंत्र हैं, मगर बांसुरी का स्थान अलग ही है। जहां एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रिक वाद्य यंत्र हैं, वहीं एक बांस से बनी बांसुरी अपनी अलग पहचान रखती है। मिलन केे सुखद अहसास और वियोग की टीस बयां करने वाली बांसुरी बनाने की शुरूआत करीब 125 साल पहले नत्था शेख ने की थी। नत्था शेख के बाद कारोबार को उनके बेटे अब्दुल नबी ने संभाला।
अब्दुल नबी के बाद उनके बेटों इदरीश नबी, खुर्शीद अहमद, नवाब अहमद, इरशाद अहमद, शमशाद अहमद, इकबाल अहमद, इकरार नबी और गुलजार नबी ने संभाला। नवाब अहमद ने नबी एंड संस फर्म बनाकर बांसुरी को विदेशों तक पहुंचाया। वक्त के साथ नवाब अहमद ने बांसुरी बनाने में इस हद तक महारत हासिल कर ली कि उनकी बनाई बांसुरी को लेने मशहूर बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार उनके घर तक आ पहुंचे। उनकी बनाई बांसुरी के कायल सिर्फ पंडित रोनू मजूमदार ही नहीं थे, बल्कि प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया, राजेश प्रसन्ना और ऋषभ प्रसन्ना भी दीवाने थे।
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यूं तो संगीत में कई वाद्य यंत्र हैं, मगर बांसुरी का स्थान अलग ही है। जहां एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रिक वाद्य यंत्र हैं, वहीं एक बांस से बनी बांसुरी अपनी अलग पहचान रखती है। मिलन केे सुखद अहसास और वियोग की टीस बयां करने वाली बांसुरी बनाने की शुरूआत करीब 125 साल पहले नत्था शेख ने की थी। नत्था शेख के बाद कारोबार को उनके बेटे अब्दुल नबी ने संभाला।
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अब्दुल नबी के बाद उनके बेटों इदरीश नबी, खुर्शीद अहमद, नवाब अहमद, इरशाद अहमद, शमशाद अहमद, इकबाल अहमद, इकरार नबी और गुलजार नबी ने संभाला। नवाब अहमद ने नबी एंड संस फर्म बनाकर बांसुरी को विदेशों तक पहुंचाया। वक्त के साथ नवाब अहमद ने बांसुरी बनाने में इस हद तक महारत हासिल कर ली कि उनकी बनाई बांसुरी को लेने मशहूर बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार उनके घर तक आ पहुंचे। उनकी बनाई बांसुरी के कायल सिर्फ पंडित रोनू मजूमदार ही नहीं थे, बल्कि प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया, राजेश प्रसन्ना और ऋषभ प्रसन्ना भी दीवाने थे।
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