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अब जमीन मालिक को लेकर फंसा पेंच

Sat, 03 Jun 2017 06:35 PM IST
पीलीभ्ाीत ब्यूराो
पीलीभ्ाीत ब्यूराो Updated Sat, 03 Jun 2017 06:35 PM IST
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Now screwed over land grabber
गांव के लाोगाों से बात करते लाोग
असम हाईवे पर सरकारी जमीन पर बने सिद्धबाबा मंदिर को तोड़े जाने पर शुरू हुए विवाद को दस दिन बाद अफसरों ने पीछे के प्लाट मालिक से जमीन दान दिए जाने की बात कहकर सुलझाया था। प्रशासन के इस फैसले पर अब नया पेंच फंस गया है। मंदिर के लिए व्यापारी की ओर से दान दिए गए जमीन के टुकड़े को एक ग्रामीण ने अपनी बताते हुए एतराज कर दिया। व्यापारी पर भी सात साल से जमीन कब्जा करने का आरोप लगाया। विवाद सामने आने पर अफसरों ने ग्रामीण की बात को अनसुना कर दिया। जमीन की पैमाइश कराकर स्थिति स्पष्ट करने की जहमत नहीं उठाई गई। 
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23 मई को डीएम के निर्देश पर पूरनपुर गेट पुलिस चौकी के पास बने सिद्धबाबा मंदिर को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बताते हुए तोड़ दिया गया था। इसके बाद गांव के लोगों ने प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध करते हुए हाईवे जाम कर पुलिस पर पथराव और वाहनों में आगजनी की थी, जिसमें 12 लोग जेल भेजे गए थे। विहिप, हिजामं, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती के पदाधिकारियों के अनशन के आहवान पर प्रशासन ने मामले की सुलह कराई थी। इसमें पीछे के प्लाट स्वामी जिसकी मिलीभगत से मंदिर पर कार्रवाई के आरोप लग रहे थे, उसकी ओर से प्लाट में दान दिए जा रहे एक टुकड़े पर मंदिर निर्माण की सहमति बनी। इसको लेकर तय कार्यक्रम के तहत शनिवार को एसडीएम पूर्णिमा सिंह, सीओ सिटी निशांक शर्मा पुलिस एवं राजस्व टीम के साथ मौके पर पहुंचे। विहिप जिलाध्यक्ष अंबरीश मिश्रा, हिजामं जिलाध्यक्ष वेदप्रकाश शुक्ला समेत कई संगठनों के नेता और प्लाट मालिक सौरभ अग्रवाल भी साथ रहे। पहले दोनों के बीच जमीन कितनी मिलेगी, इस बात पर तल्खी होती रही। इसके बाद अफसरों ने दोनों से बातचीत कर 12 बाई 15 की जगह मंदिर को देने पर सहमति बनी। राजस्व टीम से अफसर नापजोख कराने में जुट गए। इस बीच बरहा गांव के निवासी सुरेश कुमार ने अपना दुखड़ा प्रशासन के सामने रखा। उनका कहना था कि जिस जमीन के हिस्से को मंदिर के नाम दान करने की बात व्यापारी ने कही है, वह व्यापारी की नही है। उक्त जमीन उसकी भाभी रेशमा के नाम दर्ज है और सात साल से इस पर व्यापारी ने कब्जा कर रखा है। इसके सुनने के बाद अफसरों ने जांच कराने के बजाए किसी तरह निपट रहे मंदिर विवाद को समाप्त कराने पर अधिक ध्यान दिया। शिकायत करने आए ग्रामीण को मौके से जाने की बात कह दी गई। अब सवाल है कि जब जमीन के मालिक को लेकर ही स्थिति स्पष्ट नहीं है, फिर प्रशासन मंदिर निर्माण को जगह का चिह्नीकरण कैसे कर सकता है? इसके अलावा मौके पर पहुंचे गांव के लोग भी दी गई जगह को लेकर असंतुष्ट दिखाई दिए। इधर प्लाट स्वामी सौरभ अग्रवाल ने जमीन को लेकर लग रहे आरोपों को गलत बताया है। 
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अफसरों के सामने ही भड़क गए लेखपाल 
एक तरफ अफसर ग्रामीण की बात को अनदेखा कर रहे थे। अब तक इसकी शिकायत न करने की बात कहकर खुद को बचाने का प्रयास किया जाता रहा। वहीं अफसरों के साथ आए लेखपाल ग्रामीण पर भड़क गए। उसको चुप कराने के लिए डांट दिया। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि कहीं न कहीं मामला प्रशासन तक पहले ही पहुंच चुका था। 
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नेता प्रशासन के साथ मिलकर लूटते रहे वाहवाही 
प्रशासन ही नहीं मौके पर पहुंचे कई संगठनों के नेताओं से भी ग्रामीण ने अपना दुखड़ा सुनाया। उनको अपनी व्यथा सुनाकर समाधान कराने की मांग की। अफसोस नेताओं ने भी उसको निराश कर दिया। सिर्फ अधिकारियों के साथ मिलकर मंदिर को जगह दिए जाने की बात पर ही वाहवाही लूटते रहे। 

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बवाल के बाद भी अफसरों ने नहीं लिया सबक 
मंदिर को तोड़ने के दौरान प्रशासनिक स्तर से बरती गई लापरवाही बवाल करा चुकी है। इसको अफसर स्वीकार भी कर चुके हैं। बवाल से कोई सबक नहीं लिया गया। मंदिर को दी गई जमीन को लेकर ग्रामीण के आरोप लगाए जाने पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। एसडीएम और राजस्व टीम की मौजूदगी होने पर भी इस बात पर कोई जांच नहीं की गई। आखिर दान में दिया जा रहा जमीन का टुकड़ा व्यापारी का है या फिर ग्रामीण का। जब जमीन के मालिक का ही पता नहीं, फिर यह कैसा समाधान?
 
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