बचाने की जगह जंगल से बाहर भाग गए वनकर्मी
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बाघ के हमले में एक युवक के मारे जाने और दूसरे के घायल होने की घटना के बाद एक तरफ वन कर्मियों पर सुविधा शुल्क लेकर लकड़ी कटान को बढ़ावा देने का आरोप लगा है। वहीं घटना के दौरान बरती गई लापरवाही भी उजागर हो गई है। बताया जा रहा है कि एक युवक को जब बाघ ने हमला बोला तो उसे छुड़ाने के लिए वनकर्मियों कई ग्रामीणों को बुलाकर जंगल ले गए। महज लाठियों के साथ बाघ के पास पहुंचे तो उसने नेतराम पर भी हमला बोल दिया। वनकर्मी उसे बचाने की जगह वन कर्मी जंगल से बाहर भाग गए। जिला अस्पताल में हमले के बाद गंभीर हालत में भर्ती कराए घायल नेतराम के बेटे वेदप्रकाश ने बताया कि उसके पिता परिवारीजनों संग बैठे हुए थे। इस बीच एक युवक ने गांव आकर वहां मौजूद वनकर्मियों को बाघ के हमले में अपने साथी के मरने की बात बताई। इस पर पिता नेतराम के साथ दर्जन भर ग्रामीणों को मदद के लिए वनकर्मी अपने साथ जंगल ले गए। खास बात रही कि वनकर्मी बाघ के चंगुल से मारे गए युवक को छुड़ाने के लिए जंगल ग्रामीणों के साथ पहुंचे थे। वनकर्मियों को यह भली भांति पता भी था कि शिकार करने के बाद बाघ उसके पास किसी को आसानी से जाने नहीं देता। इसके बाद भी वनकर्मियों ने सूझबूझ से काम नहीं लिया। वन विभाग के वाचरों ने इसकी सूचना भी उच्चाधिकारियों को पहले देना मुनासिब नहीं समझा। न ही बाघ के संभावित हमले से बचने के लिए अथवा उसे भगाने के लिए पटाखा आदि ही अपने साथ ले गए। सिर्फ हाथ में डंडा लेकर ग्रामीणों को चलने को कह दिया गया। खुद भी उनके हाथ में डंडा ही था। घायल नेतराम के बेटे वेदप्रकाश का आरोप है कि उसके पिता पर बाघ का हमला होने के बाद ग्रामीणों ने तो बचाया, लेकिन बुलाकर साथ ले गए वनकर्मी जंगल से बाहर भाग खड़े हुए। उसने यह भी कहा कि 40 से 60 रुपये गठ्ठर के हिसाब से वनकर्मी लकड़ी कटान करने वालों से लेते हैं। यही कारण रहा कि हमले की सूचना मिलने के बाद वह ग्रामीणों को मदद के लिए बुलाने पहुंचे और आधी अधूरी तैयारी के साथ ले गए। वनकर्मियों की चूक के चलते घायल नेतराम जिंदगी मौत से जूझ रहा है।