{"_id":"5eff685c8ebc3e42db6b09ac","slug":"crime-pilibhit-news-bly41147968","type":"story","status":"publish","title_hn":"पीलीभीत में भी दबिश के दौरान कई बार पुलिस पर हो चुके हैं हमले","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पीलीभीत में भी दबिश के दौरान कई बार पुलिस पर हो चुके हैं हमले
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पीलीभीत। कानपुर में दबिश देने गई पुलिस टीम पर हमला करने की घटना ने पूरे प्रदेश में खलबली मचा दी है। कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। जनपद में इस तरह की दुखद घटना तो नहीं हुई। मगर गोकशी और कच्ची शराब पकड़ने को दी गई दबिश में पुलिस पर हमले कई बार हुए हैं।
आपराधिक तौर पर जनपद में कोई बड़ा गिरोह सक्रिय नहीं है, लेकिन नेपाल और उत्तराखंड की सीमा से सटा होने पर जिले में गोकशी और कच्ची शराब का धंधा बड़े पैमाने पर है। कुछ पुलिसकर्मियों की इसमें मिलीभगत भी रहती है। वहीं नेताओं का संरक्षण प्राप्त होने पर इस धंधे में शामिल अपराधी बेखौफ रहते हैं। अभी बीते माह ही बीसलपुर में पुलिस ने गोकशी की सूचना पर दबिश दी। इस पर गोमांस तस्करों ने पुलिस पर गोली चला दी थी। इसके अलावा बिलसंडा, बरखेड़ा में भी पुलिस पर गोली चलाई जा चुकी है। पूरनपुर में भी गोकशी का बड़ा धंधा हैं। वहां पर भी पुलिस पर हमले की फेहरिस्त कम नहीं है। बीते साल बरेली के तस्करों को जब पुलिस ने घेरा तो उन्होंने टनकपुर हाईवे पर शहर के बीचोंबीच छतरी चौराहा पर पुलिस पार्टी पर गोली चला दी थी। हजारा, सेहरामऊ गजरौला समेत अन्य थानों में कच्ची शराब पकड़ने गई पुलिस पर हमला बोल दिया गया था। पुलिस की गाड़ी पर पथराव, फायरिंग तक की गई थी।
हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी पर उठते रहे हैं सवाल
इन तमाम घटनाओं के बीच अपराधी की निगरानी और शिकंजा कसने में लापरवाही बरती जाती है। जनपद के समस्त थानों में हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी का दावा किया जाता है। मगर ये सब सिर्फ कागजों में ही चलता है। असल में पुलिस हिस्ट्रीशीटर को पहचान भी नहीं पाता और कागजों में निगरानी चलती रहती है। ऐसे में कई मामले में पूर्व में सामने आए तो थाना पुलिस की फजीहत भी हुई थी।
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कुछ सिपाही अपराधियों से करते हैं दोस्ताना
अपराधियों के बेखौफ होने के पीछे कहीं न कहीं संरक्षण अहम वजह होता है। जनपद में भी कई बार अपराधियों पर कभी राजनैतिक तो कभी खाकी का संरक्षण होना पाया गया है। निचले स्तर पर कुछ पुलिसकर्मियों का अपराधियों संग उठना बैठना, दोस्ती निभाना भी कई बार अपराधी के हौसले बढ़ा जाता है।
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आपराधिक तौर पर जनपद में कोई बड़ा गिरोह सक्रिय नहीं है, लेकिन नेपाल और उत्तराखंड की सीमा से सटा होने पर जिले में गोकशी और कच्ची शराब का धंधा बड़े पैमाने पर है। कुछ पुलिसकर्मियों की इसमें मिलीभगत भी रहती है। वहीं नेताओं का संरक्षण प्राप्त होने पर इस धंधे में शामिल अपराधी बेखौफ रहते हैं। अभी बीते माह ही बीसलपुर में पुलिस ने गोकशी की सूचना पर दबिश दी। इस पर गोमांस तस्करों ने पुलिस पर गोली चला दी थी। इसके अलावा बिलसंडा, बरखेड़ा में भी पुलिस पर गोली चलाई जा चुकी है। पूरनपुर में भी गोकशी का बड़ा धंधा हैं। वहां पर भी पुलिस पर हमले की फेहरिस्त कम नहीं है। बीते साल बरेली के तस्करों को जब पुलिस ने घेरा तो उन्होंने टनकपुर हाईवे पर शहर के बीचोंबीच छतरी चौराहा पर पुलिस पार्टी पर गोली चला दी थी। हजारा, सेहरामऊ गजरौला समेत अन्य थानों में कच्ची शराब पकड़ने गई पुलिस पर हमला बोल दिया गया था। पुलिस की गाड़ी पर पथराव, फायरिंग तक की गई थी।
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हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी पर उठते रहे हैं सवाल
इन तमाम घटनाओं के बीच अपराधी की निगरानी और शिकंजा कसने में लापरवाही बरती जाती है। जनपद के समस्त थानों में हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी का दावा किया जाता है। मगर ये सब सिर्फ कागजों में ही चलता है। असल में पुलिस हिस्ट्रीशीटर को पहचान भी नहीं पाता और कागजों में निगरानी चलती रहती है। ऐसे में कई मामले में पूर्व में सामने आए तो थाना पुलिस की फजीहत भी हुई थी।
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कुछ सिपाही अपराधियों से करते हैं दोस्ताना
अपराधियों के बेखौफ होने के पीछे कहीं न कहीं संरक्षण अहम वजह होता है। जनपद में भी कई बार अपराधियों पर कभी राजनैतिक तो कभी खाकी का संरक्षण होना पाया गया है। निचले स्तर पर कुछ पुलिसकर्मियों का अपराधियों संग उठना बैठना, दोस्ती निभाना भी कई बार अपराधी के हौसले बढ़ा जाता है।