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संक्रमण जिंदगी पर कितना पड़ेगा भारी, एंटीबॉडी जांच कराकर पता कर रहे लोग
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पीलीभीत। कोरोना महामारी की तीसरी लहर की आशंका अब लोगों में डर पैदा कर रही है। संक्रमण की चपेट से आने से बचेंगे या नहीं, इसका पता लगाने के लिए लोग एंटीबॉडी की जांच कराने को बेताब हैं। स्वास्थ्य विभाग के जांच से मना करने पर लोग निजी पैथोलॉजी में पहुंचकर एंटीबॉडी की जांच के लिए सैंपल दे रहे हैं। इसके नतीजे भी चौंकाने वाले मिलने की बात चिकित्सक कह रहे हैं। उनका कहना है कि संक्रमित रहे लोगों में कम जबकि वैक्सीन लगवाने वालों में हाईस्कोर एंटीबॉडी मिल रही है।
तीसरी लहर में बच्चों के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका दुनिया भर के विशेषज्ञ जता रहे हैं। माना जा रहा है कि वायरस परिजन से घर में पहुंचेगा और बच्चों पर कहर बरपाएगा। हालांकि, सही स्थिति तीसरी लहर आने पर ही पता चलेगी। यह असमंजस ही एंटीबॉडी की जांच कराने की वजह बन रहा है। कोरोना वैक्सीन लगवा चुके लोग भी इसमें पीछे नहीं हैं। निजी पैथोलॉजी में एंटीबॉडी की जांच कराने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पैथोलॉजिस्ट के मुताबिक, ज्यादातर उच्च वर्ग के लोग जांच कराने पहुंच रहे हैं। हालांकि, अभी तक कितने लोगों ने जांच कराई, इसकी कोई संयुक्त रिपोर्ट नहीं बनी है। मगर 70 फीसदी से लोगों में ज्यादा एंटीबॉडी मिल रही है। बताया कि जिन मरीजों में खांसी और बुखार के लक्षण मिल रहे हैं, उनमें भी कोरोना के खिलाफ अच्छी एंटीबॉडी पाई जा रही है। निजी पैथोलॉजी में करीब 800 से 900 रुपये में कोरोना एंटीबॉडी की जांच हो रही है। स्वास्थ्य विभाग इसकी जांच नहीं कर रहा है। जबकि उनके पास मशीन भी उपलब्ध है। लेकिन अब जैसे-जैसे संक्रमण कम हो रहा है, वैसे वैसे लोग लापरवाह होते जा रहे है। अधिकांश लोगों ने मास्क और सामाजिक दूरी का पालन करना छोड़ दिया। पैथोलॉजी लैब वालों का कहना है पहले तो एक दिन में कम से कम दस लोग आ रहे थे, लेकिन अब स्थिति सुधारने लगी, तो सप्ताह भर में दस लोग जांच को पहुंच रहे हैं।
जिला अस्पताल में धूल फांक रही मशीन
कोरोना संक्रमण की पहली लहर शुरू होने के बाद सांसद वरुण गांधी ने जिला अस्पताल को ट्रूनेट मशीन के साथ एंटीबॉडी की जांच करने वाली मशीन भी उपलब्ध कराई थी। ताकि लोगों की जांच हो सके, लेकिन तकनीकी कमी के चलते वह चालू नहीं की गई है और न ही उसे चालू करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की ओर से कोई कदम उठाया गया। ऐसे में सांसद की ओर से दी गई लाखों रुपये की मशीन कबाड़ बनी हुई धूल फांक रही है। जिसका जनता को लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उच्च वर्ग के लोगों तो प्राइवेट लैब में जाकर अपनी जांच करा ले रहे हैं, लेकिन माध्यम वर्गीय लोग आर्थिक स्थिति के कारण जांच नहीं करा पा रहे हैं।
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जो वैक्सीन लगवा चुके वे सर्वाधिक सुरक्षित
एंटीबॉडी जांच में पता चला है कि जो संक्रमित रहे है और नियमानुसार तरीके से उन्होंने वैक्सीन लगवाई है, उनमें एंटीबॉडी का स्कोर करीब तीन से पांच सौ तक मिल रहा है। जो संक्रमित हुए, अब स्वस्थ हैं पर वैक्सीन नहीं लगवाई उनमें एंटीबॉडी सामान्य 3.5 टाइटर यानी करीब 75 से सौ तक के स्कोर पर है।
व्यक्ति में दो प्रकार की बनती है एंटीबॉडी
आईएमए अध्यक्ष डॉ. पीयूष अग्रवाल ने बताया कि शरीर की इम्युनिटी बैक्टीरिया और वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। एंटीबॉडी विशेष तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर का बचाव करता है। एक एंटीबॉडी आईजीएम (इम्युनोग्लोबिन एम) टाइप और दूसरी आईजीजी (इम्युनोग्लोबिन जी) होती है। बैक्टीरिया या वायरस के हमले के चार से पांच दिन में शरीर आईजीएम का निर्माण करता है। करीब 14 दिन बाद आईजीजी का निर्माण होता है।
अपनी तक नहीं मिली जांच रिपोर्ट
कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए जनपद में 22 जुलाई को सीरो सर्वे कराया गया था। जिसमें 744 लोगों के सैंपल लेकर परीक्षण के लिए मेरठ मेडिकल कॉलेज भेजे गए थे। इनमें 25 गांव के लोग शामिल थे। जिनमें 18 साल से नीचे के बच्चे, कोरोना का टीका लगवा चुके लोग और सामान्य लोगों के सैंपल भेज गए थे। ताकि जिले में संक्रमण की स्थिति और एंटीबॉडी का पता चल सके। लेकिन 14 दिन बाद भी सीरो सर्वे की रिपोर्ट नहीं मिल सकी है।
जिला अस्पताल में एंटीबॉडी की जांच करने वाली मशीन तो उपलब्ध है। किन्हीं कारणों के चलते वह शुरू नहीं हो सकी है। लोग एंटीबॉडी जांच कराने के लिए संपर्क कर रहे हैं, लेकिन इस संबंध में शासन से कोई दिशा-निर्देश नहीं है। सीरो सर्विलांस कराया गया था। जिसकी रिपोर्ट जिले पर अभी नहीं आ सकी है। - डॉ. सीमा अग्रवाल, सीएमओ
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तीसरी लहर में बच्चों के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका दुनिया भर के विशेषज्ञ जता रहे हैं। माना जा रहा है कि वायरस परिजन से घर में पहुंचेगा और बच्चों पर कहर बरपाएगा। हालांकि, सही स्थिति तीसरी लहर आने पर ही पता चलेगी। यह असमंजस ही एंटीबॉडी की जांच कराने की वजह बन रहा है। कोरोना वैक्सीन लगवा चुके लोग भी इसमें पीछे नहीं हैं। निजी पैथोलॉजी में एंटीबॉडी की जांच कराने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पैथोलॉजिस्ट के मुताबिक, ज्यादातर उच्च वर्ग के लोग जांच कराने पहुंच रहे हैं। हालांकि, अभी तक कितने लोगों ने जांच कराई, इसकी कोई संयुक्त रिपोर्ट नहीं बनी है। मगर 70 फीसदी से लोगों में ज्यादा एंटीबॉडी मिल रही है। बताया कि जिन मरीजों में खांसी और बुखार के लक्षण मिल रहे हैं, उनमें भी कोरोना के खिलाफ अच्छी एंटीबॉडी पाई जा रही है। निजी पैथोलॉजी में करीब 800 से 900 रुपये में कोरोना एंटीबॉडी की जांच हो रही है। स्वास्थ्य विभाग इसकी जांच नहीं कर रहा है। जबकि उनके पास मशीन भी उपलब्ध है। लेकिन अब जैसे-जैसे संक्रमण कम हो रहा है, वैसे वैसे लोग लापरवाह होते जा रहे है। अधिकांश लोगों ने मास्क और सामाजिक दूरी का पालन करना छोड़ दिया। पैथोलॉजी लैब वालों का कहना है पहले तो एक दिन में कम से कम दस लोग आ रहे थे, लेकिन अब स्थिति सुधारने लगी, तो सप्ताह भर में दस लोग जांच को पहुंच रहे हैं।
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जिला अस्पताल में धूल फांक रही मशीन
कोरोना संक्रमण की पहली लहर शुरू होने के बाद सांसद वरुण गांधी ने जिला अस्पताल को ट्रूनेट मशीन के साथ एंटीबॉडी की जांच करने वाली मशीन भी उपलब्ध कराई थी। ताकि लोगों की जांच हो सके, लेकिन तकनीकी कमी के चलते वह चालू नहीं की गई है और न ही उसे चालू करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की ओर से कोई कदम उठाया गया। ऐसे में सांसद की ओर से दी गई लाखों रुपये की मशीन कबाड़ बनी हुई धूल फांक रही है। जिसका जनता को लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उच्च वर्ग के लोगों तो प्राइवेट लैब में जाकर अपनी जांच करा ले रहे हैं, लेकिन माध्यम वर्गीय लोग आर्थिक स्थिति के कारण जांच नहीं करा पा रहे हैं।
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जो वैक्सीन लगवा चुके वे सर्वाधिक सुरक्षित
एंटीबॉडी जांच में पता चला है कि जो संक्रमित रहे है और नियमानुसार तरीके से उन्होंने वैक्सीन लगवाई है, उनमें एंटीबॉडी का स्कोर करीब तीन से पांच सौ तक मिल रहा है। जो संक्रमित हुए, अब स्वस्थ हैं पर वैक्सीन नहीं लगवाई उनमें एंटीबॉडी सामान्य 3.5 टाइटर यानी करीब 75 से सौ तक के स्कोर पर है।
व्यक्ति में दो प्रकार की बनती है एंटीबॉडी
आईएमए अध्यक्ष डॉ. पीयूष अग्रवाल ने बताया कि शरीर की इम्युनिटी बैक्टीरिया और वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। एंटीबॉडी विशेष तरह का प्रोटीन होता है, जो शरीर का बचाव करता है। एक एंटीबॉडी आईजीएम (इम्युनोग्लोबिन एम) टाइप और दूसरी आईजीजी (इम्युनोग्लोबिन जी) होती है। बैक्टीरिया या वायरस के हमले के चार से पांच दिन में शरीर आईजीएम का निर्माण करता है। करीब 14 दिन बाद आईजीजी का निर्माण होता है।
अपनी तक नहीं मिली जांच रिपोर्ट
कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए जनपद में 22 जुलाई को सीरो सर्वे कराया गया था। जिसमें 744 लोगों के सैंपल लेकर परीक्षण के लिए मेरठ मेडिकल कॉलेज भेजे गए थे। इनमें 25 गांव के लोग शामिल थे। जिनमें 18 साल से नीचे के बच्चे, कोरोना का टीका लगवा चुके लोग और सामान्य लोगों के सैंपल भेज गए थे। ताकि जिले में संक्रमण की स्थिति और एंटीबॉडी का पता चल सके। लेकिन 14 दिन बाद भी सीरो सर्वे की रिपोर्ट नहीं मिल सकी है।
जिला अस्पताल में एंटीबॉडी की जांच करने वाली मशीन तो उपलब्ध है। किन्हीं कारणों के चलते वह शुरू नहीं हो सकी है। लोग एंटीबॉडी जांच कराने के लिए संपर्क कर रहे हैं, लेकिन इस संबंध में शासन से कोई दिशा-निर्देश नहीं है। सीरो सर्विलांस कराया गया था। जिसकी रिपोर्ट जिले पर अभी नहीं आ सकी है। - डॉ. सीमा अग्रवाल, सीएमओ