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अतीत के झरोखे से- तांगे से किया था प्रचार
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बिहारीलाल का फाइल फोटो।
- फोटो : PILIBHIT
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बीसलपुर। मोहल्ला दुर्गाप्रसाद निवासी बिहारीलाल ने वर्ष 1957 में तांगे से प्रचार कर काफी कम खर्चे में चुनाव जीत लिया था। वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े थे। बिहारीलाल अब दुनिया में नहीं है। उनके चुनाव प्रचार को लोग आज भी याद करते हैं।
मोहल्ला दुर्गाप्रसाद निवासी महेंद्र कुमार ने बताया कि उनके पिता बिहारीलाल ने वर्ष 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ा था। उनका चुनाव निशान झोपड़ी था। उस समय बीसलपुर और पूरनपुर एक ही विधान सभा क्षेत्र में थे। क्षेत्र से विधायक की दो सीटें थी। एक आरक्षित और दूसरी अनारक्षित। उनके पिता आरक्षित सीट से चुनाव लड़े थे। महेंद्र कुमार बताते हैं कि पिता ने यह चुनाव 26 वर्ष की उम्र में लड़ा था। उस समय पार्टी पैसा नहीं देती थी। प्रत्याशी अपने और कार्यकर्ताओं के बलबूते पर ही चुनाव लड़ते थे। उस समय आज के दौर की तरह जातिवाद और धर्मवाद बिल्कुल नहीं था। उनके पिता ने तांगे से घूमकर अपने चुनाव का प्रचार किया था। नदी पार के गांव में जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था। वह गांव में केवल प्रधान के घर जाकर पूरे गांव वालों के वोट मांग लेते थे। उस समय विधायकों को 200 रुपये माहवार भत्ता मिलता था और सदन चलने के दौरान 10 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सदन भत्ता मिलता था। उस समय मतदाता जिस प्रत्याशी को वोट देने का वादा कर देता था, वह अपना वादा हर हालत में पूरा करता था। अब ऐसा नहीं है। उस समय एक गांव में एक ही बार जाना पड़ता था। अब तो एक गांव में कई कई बार जाना पड़ता है।
महेंद्र कुमार ने यह भी बताया कि वर्ष 1957 में विधान सभा और लोकसभा सीट का एक साथ चुनाव हुआ था। लोक सभा सीट से मोहन स्वरूप गंगवार उन्हीं की पार्टी से चुनाव लड़े थे। मोहन स्वरूप संपन्न प्रत्याशी थे, इसलिए चुनाव प्रचार के लिए एक जीप ले आए थे। बिहारीलाल ने अपना अधिकांश चुनाव प्रचार उन्हीं के साथ उनकी जीप पर बैठकर कर लिया था। उस समय सड़कें काफी खराब थीं, जिस कारण हर जगह जीप नहीं जा पाती थी। जहां जीप नहीं जा पाती थी, वहां प्रत्याशी तांगे से जाते थे। जरूरत पड़ने पर प्रत्याशी पैदल भी जाते थे। अब तो प्रत्याशी एक कदम भी पैदल चलना पसंद नहीं करता है। उस समय चुनाव प्रचार के दौरान जहां रात हो जाती थी, प्रत्याशी वहीं रुक जातेे थे। बिहारी लाल का पिछले वर्ष देहांत हो गया है, अब केवल उनकी सादगी भरी यादें शेष हैं।
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मोहल्ला दुर्गाप्रसाद निवासी महेंद्र कुमार ने बताया कि उनके पिता बिहारीलाल ने वर्ष 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ा था। उनका चुनाव निशान झोपड़ी था। उस समय बीसलपुर और पूरनपुर एक ही विधान सभा क्षेत्र में थे। क्षेत्र से विधायक की दो सीटें थी। एक आरक्षित और दूसरी अनारक्षित। उनके पिता आरक्षित सीट से चुनाव लड़े थे। महेंद्र कुमार बताते हैं कि पिता ने यह चुनाव 26 वर्ष की उम्र में लड़ा था। उस समय पार्टी पैसा नहीं देती थी। प्रत्याशी अपने और कार्यकर्ताओं के बलबूते पर ही चुनाव लड़ते थे। उस समय आज के दौर की तरह जातिवाद और धर्मवाद बिल्कुल नहीं था। उनके पिता ने तांगे से घूमकर अपने चुनाव का प्रचार किया था। नदी पार के गांव में जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था। वह गांव में केवल प्रधान के घर जाकर पूरे गांव वालों के वोट मांग लेते थे। उस समय विधायकों को 200 रुपये माहवार भत्ता मिलता था और सदन चलने के दौरान 10 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सदन भत्ता मिलता था। उस समय मतदाता जिस प्रत्याशी को वोट देने का वादा कर देता था, वह अपना वादा हर हालत में पूरा करता था। अब ऐसा नहीं है। उस समय एक गांव में एक ही बार जाना पड़ता था। अब तो एक गांव में कई कई बार जाना पड़ता है।
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महेंद्र कुमार ने यह भी बताया कि वर्ष 1957 में विधान सभा और लोकसभा सीट का एक साथ चुनाव हुआ था। लोक सभा सीट से मोहन स्वरूप गंगवार उन्हीं की पार्टी से चुनाव लड़े थे। मोहन स्वरूप संपन्न प्रत्याशी थे, इसलिए चुनाव प्रचार के लिए एक जीप ले आए थे। बिहारीलाल ने अपना अधिकांश चुनाव प्रचार उन्हीं के साथ उनकी जीप पर बैठकर कर लिया था। उस समय सड़कें काफी खराब थीं, जिस कारण हर जगह जीप नहीं जा पाती थी। जहां जीप नहीं जा पाती थी, वहां प्रत्याशी तांगे से जाते थे। जरूरत पड़ने पर प्रत्याशी पैदल भी जाते थे। अब तो प्रत्याशी एक कदम भी पैदल चलना पसंद नहीं करता है। उस समय चुनाव प्रचार के दौरान जहां रात हो जाती थी, प्रत्याशी वहीं रुक जातेे थे। बिहारी लाल का पिछले वर्ष देहांत हो गया है, अब केवल उनकी सादगी भरी यादें शेष हैं।
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