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गभिया सहराई में 44 लोगों की 60 लाख की फसल बर्बाद, मुआवजा भी मुश्किल

Fri, 29 Oct 2021 01:17 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 29 Oct 2021 01:17 AM IST
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कलक्ट्रेट में डीएम के पास फरियाद लेकर पहुंचे गांव गभिया सहराई के बाढ़ पीड़ित। - फोटो : PILIBHIT
पीलीभीत। पूर्वी पाकिस्तान से हिंदु बंगाली समुदाय के 124 परिवार को 1960 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने वहां हो रहे अत्याचार के चलते गभिया सहराई में बसाया गया था। केंद्र सरकार की ओर से सभी परिवार को कृषि भूमि भी दी गई। 1983 में 80 लोगों को दान में दी गई जमीन का पट्टा कर दिया गया। जबकि 44 लोग प्रशासन की लापरवाही का शिकार हो गए। इसके बाद वंचित लगातार पट्टा कराने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। 18 अक्तूबर की रात आई बाढ़ में इन लोगों की फसल बर्बाद हो गई। अब इन परिवारों का आरोप है कि प्रशासन ने मुआवजा देने के लिए सर्वे कराया तो इन 44 लोगों को सर्वे में छोड़ दिया गया। सब कुछ बर्बाद होने के बाद भी मुआवजा से वंचित रहे गए, तो बृहस्पतिवार को पीड़ा लेकर सभी डीएम दरबार पहुंचे। यहां भी सिर्फ आश्वासन ही मिला।
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कलीनगर तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत गभिया सहराई में 18 अक्तूबर को आई बाढ़ में लाखों रुपये की फसल बर्बाद गई। प्रशासन ने नुकसान हुई फसल का मुआवजा दिलाने के लिए आकलन शुरू कराया है। इसमें 44 लोग ऐसे लोग को छोड़ दिया गया है। जिनके पास जमीन तो है, मगर पट्टा न होने के कारण उन्हें सर्वे में शामिल नहीं किया गया। 19 लोग पांच-पांच एकड़ के मालिक है और 25 लोगों के पास केंद्र सरकार की ओर से दी गई एक-एक एकड़ कृषि भूमि है। बाढ़ ने सभी 44 लोगों के खेत में खड़ी धान की फसल को चौपट कर दिया। इससे किसान बेहाल है। अब सर्वे में इन लोगों को छोड़ दिया गया है। बृहस्पतिवार को सभी वंचित लोग डीएम से मिलने कलक्ट्रेट पहुंचे। डीएम से मिलकर जमीन का पट्टा कराने और बाढ़ में बर्बाद हुई फसल का मुआवजा दिलाने की मांग की। डीएम ने किसानों को मांग पत्र लेकर जांच कराने की बात कहीं है।
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इतनी जमीन को नहीं किया गया सर्वे में शामिल
वैसे तो 44 लोगों की जमीन को सर्वे में शामिल नहीं किया गया है। इनमें 19 लोगों की 95 एकड़ और 25 लोगों की 25 एकड़ फसल को मुआवजा के लिए शामिल नहीं किया गया। करीब 120 एकड़ में बर्बाद हुई फसल को मुआवजा के लिए छोड़ दिया गया है। 120 एकड़ में करीब 3000 क्विंटल धान की पैदावार होती है। जबकि शासन ने धान का समर्थन मूल्य 1940 रुपये प्रति क्विंटल की दर से रखा है। इसके अनुसार 58,20,000 रुपये की फसल बर्बाद हुई है। इसके बाद भी किसानों को पूरा नुकसान अलग की बात, लागत के अनुसार मुआवजा देने के लिए भी शामिल नहीं किया गया है।
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पांच हजार भाड़ा खर्च कर डीएम के पास फरियाद लेकर पहुंचे किसान
कलक्ट्रेट पहुंचे किसानों ने बताया कि जिला मुख्यालय 60 किलोमीटर दूर है। वाहनों की भी कोई सुविधा नहीं है। आवागमन में काफी दिक्कत होती है। बृहस्पतिवार को डीएम से मिलने के लिए पांच हजार में ट्रैक्टर ट्रॉली को किराए पर किया। इसके बाद डीएम से मिलने पहुंचे। यहां सिर्फ प्रार्थना पत्र लेकर डीएम ने जांच कराने का आश्वासन दिया है। बाढ़ के कारण पहले से ही आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। इसके बाद बार- बार किराया खर्चकर जिला मुख्यालय आने में काफी दिक्कत होती है।
सरकार ने जमीन देकर बसा तो दिया है। मगर अभी तक जमीन का पट्टा नहीं हो सका। इससे हर साल बाढ़ में फसल बर्बाद होने के बाद भी मुआवजा नहीं मिल रहा है। - विमल दास, ग्रामीण
बाढ़ से फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। मुआवजा के लिए सर्वे हो रहा है। पट्टा नहीं होने के कारण सर्वे में शामिल नहीं किया गया। आर्थिक तंगी से परेशान है। - विश्वनाथ मजुमदार
फसल बाढ़ में पूरी तरह बर्बाद हो गई है। सरकार ने मुआवजा देने का वादा किया था। इसके बाद भी शामिल नहीं किया गया। अब घर का खर्च चलाना मुश्किल होगा। - सुबरनो हलदर
सरकार ने बाढ़ से पीड़ित लोगों को राहत देने की बात कहीं थी। अब अधिकारी सर्वे में सौतेला व्यवहार कर रहे हैं। पट्टा कराने को कई बार चक्कर लगाए। अब मुआवजे से वंचित किया जा रहा। - नयन हलदर
शारदा नदी में बाढ़ ने गांव में तबाही मचा दी थी। घर और फसल दोनों बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए है। फसल खराब होने से पहले ही संकट है। अब मुआवजा नहीं दिया जा रहा। - गणेश चंद्र समद्दार

हर साल बारिश से तबाही का मंजर होता है। बाढ़ आने के दौरान अधिकारी आश्वासन देकर चले जाते हैं। इसके बाद पट्टा कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, मगर कोई ध्यान ही नहीं देता। - हजारी बाला
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