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Pilibhit News: जमीन और मुआवजे की गणित में उलझा चलतुआ गांव
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गांव चलतुआ का उच्च प्राथमिक विद्यालय। स्रोत ग्रामीण
पूरनपुर (पीलीभीत)। दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी में जंगल के अंदर बसे चलतुआ गांव के ग्रामीणों को बाहर बसाने की कवायद अभी अधूरी है। पूरनपुर तहसील के इस गांव में 308 परिवार हैं। ग्रामीणों को जंगल से बाहर बसाने के लिए वन और राजस्व विभाग की टीम सर्वे भी कर चुकी हैं। ग्रामीणों को दो हेक्टेयर जमीन या फिर 15 लाख रुपये मुआवजे के दो विकल्प दिए गए। मगर बात अभी बनी नहीं है।
थाना सेहरामऊ उत्तरी क्षेत्र का चलतुआ गांव दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में जंंगल के बीच बसा है। गांव में पहुंचने के लिए जंगल में चार किलोमीटर दूरी तय करनी पड़ती है। आवागमन के लिए सिर्फ पगडंडी है। गांव में उच्च प्राथमिक स्कूल है। मूलभूत सुविधाओं में बिजली, सड़कें, मोबाइल नेटवर्क आदि कुछ भी नहीं है।
चारों ओर जंगल से घिरे गांव में जंगली जानवरों का भय बना रहता है। तीन साल पहले खेत की रखवाली कर रहे बुजुर्ग को हाथी ने पटककर मार डाला था। पांच वर्ष से अधिक समय पहले मानव-वन्य जीव संघर्ष में ग्रामीणों ने बाघ को लाठियों से पीटकर मौत के घाट उतार दिया था।
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डीएम ने गठित की थी तीन सदस्यीय समिति
करीब एक वर्ष पहले गांव पहुंचे तत्कालीन डीएम संजय सिंह से ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं साझा की थीं। डीएम ने तीन सदस्यीय टीम गठित की। टीम में एसडीएम पूरनपुर, डीएफओ और एसडीओ वन विभाग को शामिल किया गया। गांव के लोगों को जंगल के बाहर बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई। गांव छोड़ने वालों को 15 लाख रुपये या दो हेक्टेयर जमीन देने का विकल्प दिया गया। 18 दिसंबर को गांव में एसडीएम अजीत प्रताप सिंह की मौजूदगी में बैठक भी हुई थी।
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302 परिवारों ने दी जमीन के बदले गांव छोड़ने की सहमति
गठित टीम के सर्वे में ग्रामीणों ने खुद ही गांव में न रहने की इच्छा जताई। कहा कि सरकार खेती के बदले खेती और रहने के लिए जमीन दे। बाद में राजस्व, वन और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सर्वे कर गांव के परिवारों और घरों का आंकड़ा जुटाया। गांव छोड़ने के बदले ग्रामीण मुआवजा या जमीन में कौन सा विकल्प चुनना चाहते हैं, इसकी जानकारी की। किशनपुर के रेंजर मोहम्मद अयूब हसन ने बताया कि सर्वे में गांव में 308 परिवार पाए गए। इनमें छह परिवारों ने विकल्प के रूप में 15 लाख रुपये और 302 परिवारों ने जमीन लेने पर सहमति दी। दो या तीन स्थानों पर संयुक्त रूप से बसने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट विभागीय अफसरों और एसडीएम को भेज दी गई।
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52 लोगों को पट्टा देकर बसाया गया था गांव में
चतलुआ गांव में दशकों पहले 52 लोगों को जमीन का पट्टा देकर बसाया गया था। उस समय वन्यजीवों की संख्या जंगल में कम थी। वन्यजीवों की संख्या बढ़ने पर वन्य जीव अक्सर गांव में आबादी में आ रहे हैं। फसलों की रखवाली करने में किसानों को रातभर जागना पड़ता है। वन्य जीवों के हमले से लोग दहशत में रहते हैं।
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सर्वे रिपोर्ट वन विभाग के अफसरों को भेज दी गई थी। गांव के लोगों की विकल्प चुनने के लिए फिर शीघ्र ही बैठक कराई जाएगी। ग्रामीणों की राय जानने के बाद फिर रिपोर्ट अफसरों को भेजी जाएगी। उच्च अफसरों के निर्देश मिलने पर अगली कार्रवाई होगी।
- अजीत प्रताप सिंह, एसडीएम पूरनपुर
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थाना सेहरामऊ उत्तरी क्षेत्र का चलतुआ गांव दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में जंंगल के बीच बसा है। गांव में पहुंचने के लिए जंगल में चार किलोमीटर दूरी तय करनी पड़ती है। आवागमन के लिए सिर्फ पगडंडी है। गांव में उच्च प्राथमिक स्कूल है। मूलभूत सुविधाओं में बिजली, सड़कें, मोबाइल नेटवर्क आदि कुछ भी नहीं है।
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चारों ओर जंगल से घिरे गांव में जंगली जानवरों का भय बना रहता है। तीन साल पहले खेत की रखवाली कर रहे बुजुर्ग को हाथी ने पटककर मार डाला था। पांच वर्ष से अधिक समय पहले मानव-वन्य जीव संघर्ष में ग्रामीणों ने बाघ को लाठियों से पीटकर मौत के घाट उतार दिया था।
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डीएम ने गठित की थी तीन सदस्यीय समिति
करीब एक वर्ष पहले गांव पहुंचे तत्कालीन डीएम संजय सिंह से ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं साझा की थीं। डीएम ने तीन सदस्यीय टीम गठित की। टीम में एसडीएम पूरनपुर, डीएफओ और एसडीओ वन विभाग को शामिल किया गया। गांव के लोगों को जंगल के बाहर बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई। गांव छोड़ने वालों को 15 लाख रुपये या दो हेक्टेयर जमीन देने का विकल्प दिया गया। 18 दिसंबर को गांव में एसडीएम अजीत प्रताप सिंह की मौजूदगी में बैठक भी हुई थी।
302 परिवारों ने दी जमीन के बदले गांव छोड़ने की सहमति
गठित टीम के सर्वे में ग्रामीणों ने खुद ही गांव में न रहने की इच्छा जताई। कहा कि सरकार खेती के बदले खेती और रहने के लिए जमीन दे। बाद में राजस्व, वन और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सर्वे कर गांव के परिवारों और घरों का आंकड़ा जुटाया। गांव छोड़ने के बदले ग्रामीण मुआवजा या जमीन में कौन सा विकल्प चुनना चाहते हैं, इसकी जानकारी की। किशनपुर के रेंजर मोहम्मद अयूब हसन ने बताया कि सर्वे में गांव में 308 परिवार पाए गए। इनमें छह परिवारों ने विकल्प के रूप में 15 लाख रुपये और 302 परिवारों ने जमीन लेने पर सहमति दी। दो या तीन स्थानों पर संयुक्त रूप से बसने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट विभागीय अफसरों और एसडीएम को भेज दी गई।
52 लोगों को पट्टा देकर बसाया गया था गांव में
चतलुआ गांव में दशकों पहले 52 लोगों को जमीन का पट्टा देकर बसाया गया था। उस समय वन्यजीवों की संख्या जंगल में कम थी। वन्यजीवों की संख्या बढ़ने पर वन्य जीव अक्सर गांव में आबादी में आ रहे हैं। फसलों की रखवाली करने में किसानों को रातभर जागना पड़ता है। वन्य जीवों के हमले से लोग दहशत में रहते हैं।
सर्वे रिपोर्ट वन विभाग के अफसरों को भेज दी गई थी। गांव के लोगों की विकल्प चुनने के लिए फिर शीघ्र ही बैठक कराई जाएगी। ग्रामीणों की राय जानने के बाद फिर रिपोर्ट अफसरों को भेजी जाएगी। उच्च अफसरों के निर्देश मिलने पर अगली कार्रवाई होगी।
- अजीत प्रताप सिंह, एसडीएम पूरनपुर