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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Pilibhit News ›   Began moorland improving Chinese rice cultivation was

दलदली भूमि में सुधार को शुरू  हुई थी चायनीज धान की खेती

Wed, 16 Mar 2016 11:28 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पीलीभीत
ब्यूरो/अमर उजाला, पीलीभीत Updated Wed, 16 Mar 2016 11:28 PM IST
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चायनीज (साठा) धान की खेती बंगाली विस्थापितों ने उस दलदली भूमि पर करना शुरू की थी जहां कोई अन्य फसल पैदा नहीं हो सकती थी। मामूली लागत और साल में दो बार धान पैदा होता देख तराई के अन्य किसानों ने इसकी पैदावार सामान्य भूमि पर भी शुरू कर दी। उधर, तराई में वाटर लेबिल गिरने की सुगबुगाहट ने किसानों की आंखें खोल दी हैं। तमाम किसानों ने खेतों में खड़ी चायनीज धान की पौध को नष्ट कर दिया है। 
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पूर्वी पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर तराई क्षेत्र में बंगाली समुदाय के लोग आकर बसे। कुछ को तो सरकार ने बसाया था, लेकिन शेष चोरी छिपे फर्जी दस्तावेजों के सहारे बस गए। यहां आकर उन्होंने रहने और खेती करने को उस भूमि पर कब्जा जमाया जो वर्षों से बेकार और दलदली पड़ी थी। इन बंगाली विस्थापितों ने परिवार का पेट पालने के लिए दो से तीन फिट तक दलदल में घुसकर भूमि को खेती योग्य बनाने के प्रयास किए। दलदल में खड़े खरपतवार को फावड़े से पलट दिया और चायनीज धान की पौध लगा दी। मेहनत रंग लाई तो इसकी पैदावार का दायरा बढ़ता गया। चायनीज धान से भूमि में काफी सुधार आया, तो सब्जी फसलें भी पैदा की जाने लगीं। उधर, कम लागत देख तराई के अन्य किसानों ने भी इसकी पैदावार करनी शुरू कर दी। साल दर साल इसका रकबा बढ़ता गया। 
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गिरते जलस्तर ने माथे 
पर डाली सिलवटें
साठा फसल में हर तीसरे दिन पानी की खपत होने से भूगर्भ जलस्तर नीचे खिसकने लगा तो किसानों के माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं। पंजाब प्रांत में साठा के उत्पादन पर लगी रोक और पानी की बड़ी मात्रा में खपत होते देख किसानों का चायनीज धान से मोहभंग होने लगा है। 
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भूमि की घटेगी उर्वरा शक्ति
ग्राम सेल्हा निवासी अशोक मंडल, महाराजपुर के पूर्व प्रधान अजीत मंडल, कंजिया सिंहपुर के आनंद सरकार का कहना है कि यह चायनीज धान मात्र दलदली भूमि पर ही लगाना चाहिए। शेष भूमि पर लगाने से पानी का लेबिल तो नीचे जाएगा ही, साथ ही जमीन की उर्वरा शक्ति भी घट जाएगी।
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