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Pilibhit News: बाघों के गढ़ में बढ़ रहा गिद्धों का कुनबा
Sat, 02 Sep 2023 11:40 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
Updated Sat, 02 Sep 2023 11:40 PM IST
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पीलीभीत। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की दहाड़ के बीच ही अब गिद्धों के झुंड भी लोगों को दिखाई देने लगे हैं। तीन-चार साल में अब यहां गिद्धों का बसेरा होने लगा है। इनकी संख्या में साल दर साल इजाफा होने से वन अधिकारियों की ओर से भी उनके संरक्षण पर जोर दिया जाने लगा है।
पशुओं के शव ठिकाने लगाने के लिए प्रकृति ने गिद्धों के रूप में सफाई कर्मी दिए। ये गांवों के बाहर पेड़ों पर झुंड के रूप में रहते थे। धीरे-धीरे जब माहौल बदला तो ये विलुप्त होते चले गए। एक समय ऐसा आया कि लोगों की नजर से गिद्ध पूरी तरह दूर हो गए। किताबों में ही गिद्ध लोगों को दिख रहे थे। विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे गिद्धों को लेकर फिर से संरक्षण का काम शुरू किया गया। संरक्षण पर जो काम हुआ उसका परिणाम पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भी दिखाई देने लगा है।
यहां बाघ और तेंदुआ सहित अन्य वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई तो हरीपुर और बराही रेंज में गिद्धों के कुनबे में भी वृद्धि होना सामने आया है। दोनों ही रेंजों में गिद्धों की खासी संख्या दिख रही है। इनको और संरक्षण देने की जरूरत है। दरअसल जंगल में गिद्धों को भोजन के साथ ही रहने के लिए अनुकूल माहौल मिल रहा है। उनका पेट बाघों और तेंदुओं के शिकार के अवशेष से भर जाता है।
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संख्या में कमी का यह रहा था मुख्य कारण
डायक्लोफ़ेनाक के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिद्ध की संख्या में 97 प्रतिशत से अधिक कमी को महसूस किया गया है। जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष रूप से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में तीस वर्ष पूर्व गिद्धों की संख्या जहां हजारों में थी, जो आज घटकर मात्र दो सौ से ढाई सौ के मध्य रह गई है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में गिद्ध मुख्य रूप से हरीपुर व बराही रेंज में पाए जाते हैं ।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में पाये जाने वाली सात प्रजातियों में चार यहां की स्थानीय प्रजातियां हैं जबकि तीन प्रजातियां यहां हिमालय वह दक्षिणी क्षेत्रों से प्रवास पर आती हैं। यहां की चारों स्थानीय प्रजातियां वैश्विक महत्व की हैं अर्थात ग्लोबली थ्रेटेन हैं।
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इनकी संख्या है अधिक
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में व्हाइट रम्प वल्चर की संख्या सबसे अधिक है। जो यहां सबसे अधिक घोंसलों का निर्माण करता है। आकार में सबसे बड़ा हिमालयन वल्चर है, जो कि यहां पर हिमालय से प्रवास पर आता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के किनारे नार्थ खीरी के वनों में बसी हुई गौढ़ियां इनके खाने की व्यवस्था का मुख्य स्थान है।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में गिद्ध संरक्षण की अपार संभावनाएं हैं, हम जागरूकता अभियान एवं नियमित सर्वेक्षण करके इसकी संख्या को आसानी के साथ बढ़ा सकते हैं। इसके लिए उनकी संस्था की ओर से हर साल कार्यक्रम भी किया जाता है। बीच बीच में भी गांव वालों के साथ गोष्ठी कर जागरुक किया जाता है। -अख्तर मियां खान, अध्यक्ष, टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी
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गिद्ध दिवस पर आज सभी रेंजों में जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। टाइगर रिजर्व की बराही रेंज के फैजुल्लागंज में इनकी संख्या बढ़ी है। साथ ही हरीपुर रेंज में शारदा नदी किनारे भी इनके घोंसले काफी संख्या में देखे जा रहे हैं। हर साल 15 से 20 गिद्ध बढ़ रहे हैं। - नवीन खंडेलवाल, डीडी- पीलीभीत टाइगर रिजर्व
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पशुओं के शव ठिकाने लगाने के लिए प्रकृति ने गिद्धों के रूप में सफाई कर्मी दिए। ये गांवों के बाहर पेड़ों पर झुंड के रूप में रहते थे। धीरे-धीरे जब माहौल बदला तो ये विलुप्त होते चले गए। एक समय ऐसा आया कि लोगों की नजर से गिद्ध पूरी तरह दूर हो गए। किताबों में ही गिद्ध लोगों को दिख रहे थे। विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे गिद्धों को लेकर फिर से संरक्षण का काम शुरू किया गया। संरक्षण पर जो काम हुआ उसका परिणाम पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भी दिखाई देने लगा है।
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यहां बाघ और तेंदुआ सहित अन्य वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई तो हरीपुर और बराही रेंज में गिद्धों के कुनबे में भी वृद्धि होना सामने आया है। दोनों ही रेंजों में गिद्धों की खासी संख्या दिख रही है। इनको और संरक्षण देने की जरूरत है। दरअसल जंगल में गिद्धों को भोजन के साथ ही रहने के लिए अनुकूल माहौल मिल रहा है। उनका पेट बाघों और तेंदुओं के शिकार के अवशेष से भर जाता है।
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संख्या में कमी का यह रहा था मुख्य कारण
डायक्लोफ़ेनाक के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिद्ध की संख्या में 97 प्रतिशत से अधिक कमी को महसूस किया गया है। जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष रूप से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में तीस वर्ष पूर्व गिद्धों की संख्या जहां हजारों में थी, जो आज घटकर मात्र दो सौ से ढाई सौ के मध्य रह गई है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में गिद्ध मुख्य रूप से हरीपुर व बराही रेंज में पाए जाते हैं ।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में पाये जाने वाली सात प्रजातियों में चार यहां की स्थानीय प्रजातियां हैं जबकि तीन प्रजातियां यहां हिमालय वह दक्षिणी क्षेत्रों से प्रवास पर आती हैं। यहां की चारों स्थानीय प्रजातियां वैश्विक महत्व की हैं अर्थात ग्लोबली थ्रेटेन हैं।
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इनकी संख्या है अधिक
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में व्हाइट रम्प वल्चर की संख्या सबसे अधिक है। जो यहां सबसे अधिक घोंसलों का निर्माण करता है। आकार में सबसे बड़ा हिमालयन वल्चर है, जो कि यहां पर हिमालय से प्रवास पर आता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के किनारे नार्थ खीरी के वनों में बसी हुई गौढ़ियां इनके खाने की व्यवस्था का मुख्य स्थान है।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में गिद्ध संरक्षण की अपार संभावनाएं हैं, हम जागरूकता अभियान एवं नियमित सर्वेक्षण करके इसकी संख्या को आसानी के साथ बढ़ा सकते हैं। इसके लिए उनकी संस्था की ओर से हर साल कार्यक्रम भी किया जाता है। बीच बीच में भी गांव वालों के साथ गोष्ठी कर जागरुक किया जाता है। -अख्तर मियां खान, अध्यक्ष, टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी
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गिद्ध दिवस पर आज सभी रेंजों में जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। टाइगर रिजर्व की बराही रेंज के फैजुल्लागंज में इनकी संख्या बढ़ी है। साथ ही हरीपुर रेंज में शारदा नदी किनारे भी इनके घोंसले काफी संख्या में देखे जा रहे हैं। हर साल 15 से 20 गिद्ध बढ़ रहे हैं। - नवीन खंडेलवाल, डीडी- पीलीभीत टाइगर रिजर्व