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किसानों के लिए भी फायदे मंद नहीं है चैनी
Updated Fri, 16 Mar 2018 10:04 AM IST
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किसानों के लिए भी फायदे मंद नहीं है चैनी
अधिक लागत पर मिलता है कम लाभ
मंडी व सरकारी योजनाएं भी नहीं होती लागू
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। यूं तो जिले में चैनी धान की फसल तेजी से बढ़ रही है लेकिन इसकी लागत एवं चैनी के बाद उगाई जाने वाली फसलों में इसके दुुष्प्रभावों को देखा जाए तो किसानों के लिए भी इसकी खेती फायदेमंद नहीं है। वहीं दूसरी ओर सामान्य फसल की अपेक्षा अधिक लागत आती है।
गर्मी के मौसम में उगाई जाने वाली चैनी धान की फसल जहां पर्यावरण और भूगर्भ के लिए खतरा बनती जा रही है, वहीं किसानों के लिए भी किसी की दृष्टि से लाभकारी नहीं है। कई ऐसे किसान हैं जो चैनी की फसल को नुकसानदायक मानते हैं लेकिन क्षेत्र एवं पास पड़ोसियों की देखा देखी चैनी की फसल लगा रहे हैं। चैनी की लागत और मुनाफे की बात करें तो कहने तो यह फसल 60 दिन की है लेकिन अमूमन 70 से 75 दिन में पक कर तैयार होती है। चूंकि इस फसल को लगातार पानी की जरूरत होती है। इसके लिए रोपाई से लेकर कटाई के पांच दिन पूर्व तक लगभग 20 प्रतिशत सिंचाई की जरूरत होती है। साथ ही बेमौसम की फसल होने के चलते कीट पतंगे व बीमारियों की रोकथाम के लिए भी दवाएं डालनी पड़ती है। इससे इस फसल में 15से 20 हजार रुपये प्रति एकड़ तक की लागत आती है, जबकि उत्पादन 22 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। वहीं मुख्य फसल में मात्र 12 से 15 हजार के खर्च पर 20 से 25 क्विंटल तक उत्पादन होता है। इसके स्थान पर यदि उड़द, मूंग अथवा मक्का की फसल उगाई जाती है तो उसमें इसमें मात्र पांच से आठ हजार रुपये में ही 15 से 20 हजार रुपये तक की आमदनी हो सकती है।
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प्रतिबंध को लेकर दायर की याचिका
साठा धान किसानों के लिए एक बडे़ घाट का सौदा है। इससे जल संकट के साथ पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। पानी की बढ़ती बर्बादी और रोग, कीट में इजाफा को देखते हुए साठा धान पर प्रतिबंध लगाने को हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। वहीं अब एनजीटी में भी शिकायत कर चैनी को प्रतिबंधित करने की मांग की है।
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मंजीत सिंह, जिला उपाध्यक्ष भाकियू
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किसानों के लिए भी फायदे मंद नहीं है चैनी
अधिक लागत पर मिलता है कम लाभ
मंडी व सरकारी योजनाएं भी नहीं होती लागू
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। यूं तो जिले में चैनी धान की फसल तेजी से बढ़ रही है लेकिन इसकी लागत एवं चैनी के बाद उगाई जाने वाली फसलों में इसके दुुष्प्रभावों को देखा जाए तो किसानों के लिए भी इसकी खेती फायदेमंद नहीं है। वहीं दूसरी ओर सामान्य फसल की अपेक्षा अधिक लागत आती है।
गर्मी के मौसम में उगाई जाने वाली चैनी धान की फसल जहां पर्यावरण और भूगर्भ के लिए खतरा बनती जा रही है, वहीं किसानों के लिए भी किसी की दृष्टि से लाभकारी नहीं है। कई ऐसे किसान हैं जो चैनी की फसल को नुकसानदायक मानते हैं लेकिन क्षेत्र एवं पास पड़ोसियों की देखा देखी चैनी की फसल लगा रहे हैं। चैनी की लागत और मुनाफे की बात करें तो कहने तो यह फसल 60 दिन की है लेकिन अमूमन 70 से 75 दिन में पक कर तैयार होती है। चूंकि इस फसल को लगातार पानी की जरूरत होती है। इसके लिए रोपाई से लेकर कटाई के पांच दिन पूर्व तक लगभग 20 प्रतिशत सिंचाई की जरूरत होती है। साथ ही बेमौसम की फसल होने के चलते कीट पतंगे व बीमारियों की रोकथाम के लिए भी दवाएं डालनी पड़ती है। इससे इस फसल में 15से 20 हजार रुपये प्रति एकड़ तक की लागत आती है, जबकि उत्पादन 22 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। वहीं मुख्य फसल में मात्र 12 से 15 हजार के खर्च पर 20 से 25 क्विंटल तक उत्पादन होता है। इसके स्थान पर यदि उड़द, मूंग अथवा मक्का की फसल उगाई जाती है तो उसमें इसमें मात्र पांच से आठ हजार रुपये में ही 15 से 20 हजार रुपये तक की आमदनी हो सकती है।
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प्रतिबंध को लेकर दायर की याचिका
साठा धान किसानों के लिए एक बडे़ घाट का सौदा है। इससे जल संकट के साथ पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। पानी की बढ़ती बर्बादी और रोग, कीट में इजाफा को देखते हुए साठा धान पर प्रतिबंध लगाने को हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। वहीं अब एनजीटी में भी शिकायत कर चैनी को प्रतिबंधित करने की मांग की है।
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मंजीत सिंह, जिला उपाध्यक्ष भाकियू