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आखिर कब तक खतरा बना रहेगा खेतों में घूम रहा बाघ का कुनबा
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,पीलीभीत
Updated Thu, 02 Aug 2018 11:58 PM IST
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जंगल से दूर अमरिया तहसील क्षेत्र के गन्ने के खेतों में घूम रहे बाघ और बाघिन की समस्या का महकमा छह साल बीतने के बाद भी कोई समाधान नहीं कर सका है। वन विभाग के अधिकारियों की ओर से बनाई गई तमाम रणनीतियां सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रह गई हैं। खेंतों पर काम करने जा रहे किसान और मजदूरों पर लगातार हो रहे हमले और इस पर कार्रवाई के नाम पर विभागीय स्तर से बरती जा रही लापरवाही के चलते अब ग्रामीणों में आक्रोश भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
बृहस्पतिवार को बरा मझलिया गांव में पड़िया को निवाला बनाने के बाद किसान रामऔतार को हमला कर घायल करने की घटना के बाद इसकी एक वानगी भी देखने को मिली। ग्रामीणों ने हमले की सूचना तुरंत ही स्थानीय वन कर्मियों से लेकर अधिकारियों तक दी। आरोप है कि इसके बावजूद कोई भी वन विभाग का कर्मचारी मौके पर पहुंचा ही नहीं। घायल को अस्पताल पहुंचाने के बाद मौके पर जमा हुए कुछ ग्रामीणों ने इसको लेकर वन विभाग के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए प्रदर्शन भी किया। ग्रामीण लालाराम ने कहा कि वन महकमा ग्रामीणों की जान से खिलवाड़ करने पर उतारू है। घटना के बाद मौके पर किसी भी कर्मचारी-अधिकारी का न पहुंचना, उनकी संजीदगी को बयां करता है। यहां तक कि प्रशासन का भी कोई अधिकारी सुधि लेने नहीं आया। सालों से बनी इस समस्या के समाधान के बजाए सिर्फ निगरानी को कुछ टीमें लगा दी गई हैं। खास बात यह है कि ये टीमें भी औपचारिक कार्रवाई तक सीमित है।
तीन साल में 23 लोग गवां चुके जान
बाघ के हमलों में तीन अक्तूबर 2016 से जिले के अब तक करीब 23 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसमें 11 लोगों की मौत जंगल के भीतर हुई जिसके कारण उनको नियमानुसार मुआवजा नहीं मिल सका। बकाया के परिवार वालों को आर्थिक मदद के तौर पर महकमें की ओर से पांच-पांच लाख रुपये दिए गए थे। इसके अलावा घायलों को एक-एक लाख रुपये आर्थिक मदद दी गई है। बीते साल मृतक व घायलों के परिजनों को 67 लाख रुपये अनुदान राशि दी गई थी।
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46 पालतु पशुओं को बनाया निवाला
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में बाघ और तेेंदुए 14 पशुओं को और 2017-18 में 32 पालतु पशुओं को निवाला बना चुके हैं। उक्त पालतु पशुओं के स्वामियों को वन विभाग की ओर से 1,70,500 रुपये की आर्थिक मदद दी गई।
अवैध कटान और आवाजाही हमलों की वजह
वन्यजीवों के हमलों की बढ़ती संख्या के पीछे अहम वजह के तौर पर एक्सपर्ट जंगल का घटता दायरा, अवैध कटान और जंगल में बढ़ती आवाजाही को मान रहे हैं। तराई टाइगर प्रोजेक्ट के प्रभारी पीपी पांडे का कहना है कि जंगल में इंसान की आवाजाही बढ़ी है। अवैध कटान से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जंगल के पास गन्ने की खेती ने समस्या बढ़ा दी है।
डूंडा गांव में भी खेत में दिखा बाघ
घुंघचाई। गढ़ा रेंज के जंगल से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित डूंडा गांव में भी बृहस्पतिवार शाम बाघ ने अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। गांव निवासी 40 वर्षीय देव सिंह ने बताया कि वह अपने खेत को देखने के लिए गए थे। शाम करीब सात बजे खेत पर पहुंचे तो पास के ही गन्ने के खेत से बाघ दहाड़ लगाता हुआ बाहर निकला जिसके बाद किसान ने भाग कर खुद को बचाया। शोर पर ग्रामीण जमा हुए और पटाखे दागे, जिस पर बाघ दुबारा गन्ने में चला गया। इसकी सूचना वन विभाग के कर्मचारियों को दी गई, लेकिन कोई मौके पर नहीं पहुंचा। ग्रामीणों ने बताया कि करीब एक सप्ताह से बाघ गांव में चहलकदमी कर रहा है।
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बृहस्पतिवार को बरा मझलिया गांव में पड़िया को निवाला बनाने के बाद किसान रामऔतार को हमला कर घायल करने की घटना के बाद इसकी एक वानगी भी देखने को मिली। ग्रामीणों ने हमले की सूचना तुरंत ही स्थानीय वन कर्मियों से लेकर अधिकारियों तक दी। आरोप है कि इसके बावजूद कोई भी वन विभाग का कर्मचारी मौके पर पहुंचा ही नहीं। घायल को अस्पताल पहुंचाने के बाद मौके पर जमा हुए कुछ ग्रामीणों ने इसको लेकर वन विभाग के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए प्रदर्शन भी किया। ग्रामीण लालाराम ने कहा कि वन महकमा ग्रामीणों की जान से खिलवाड़ करने पर उतारू है। घटना के बाद मौके पर किसी भी कर्मचारी-अधिकारी का न पहुंचना, उनकी संजीदगी को बयां करता है। यहां तक कि प्रशासन का भी कोई अधिकारी सुधि लेने नहीं आया। सालों से बनी इस समस्या के समाधान के बजाए सिर्फ निगरानी को कुछ टीमें लगा दी गई हैं। खास बात यह है कि ये टीमें भी औपचारिक कार्रवाई तक सीमित है।
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तीन साल में 23 लोग गवां चुके जान
बाघ के हमलों में तीन अक्तूबर 2016 से जिले के अब तक करीब 23 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसमें 11 लोगों की मौत जंगल के भीतर हुई जिसके कारण उनको नियमानुसार मुआवजा नहीं मिल सका। बकाया के परिवार वालों को आर्थिक मदद के तौर पर महकमें की ओर से पांच-पांच लाख रुपये दिए गए थे। इसके अलावा घायलों को एक-एक लाख रुपये आर्थिक मदद दी गई है। बीते साल मृतक व घायलों के परिजनों को 67 लाख रुपये अनुदान राशि दी गई थी।
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46 पालतु पशुओं को बनाया निवाला
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में बाघ और तेेंदुए 14 पशुओं को और 2017-18 में 32 पालतु पशुओं को निवाला बना चुके हैं। उक्त पालतु पशुओं के स्वामियों को वन विभाग की ओर से 1,70,500 रुपये की आर्थिक मदद दी गई।
अवैध कटान और आवाजाही हमलों की वजह
वन्यजीवों के हमलों की बढ़ती संख्या के पीछे अहम वजह के तौर पर एक्सपर्ट जंगल का घटता दायरा, अवैध कटान और जंगल में बढ़ती आवाजाही को मान रहे हैं। तराई टाइगर प्रोजेक्ट के प्रभारी पीपी पांडे का कहना है कि जंगल में इंसान की आवाजाही बढ़ी है। अवैध कटान से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जंगल के पास गन्ने की खेती ने समस्या बढ़ा दी है।
डूंडा गांव में भी खेत में दिखा बाघ
घुंघचाई। गढ़ा रेंज के जंगल से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित डूंडा गांव में भी बृहस्पतिवार शाम बाघ ने अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। गांव निवासी 40 वर्षीय देव सिंह ने बताया कि वह अपने खेत को देखने के लिए गए थे। शाम करीब सात बजे खेत पर पहुंचे तो पास के ही गन्ने के खेत से बाघ दहाड़ लगाता हुआ बाहर निकला जिसके बाद किसान ने भाग कर खुद को बचाया। शोर पर ग्रामीण जमा हुए और पटाखे दागे, जिस पर बाघ दुबारा गन्ने में चला गया। इसकी सूचना वन विभाग के कर्मचारियों को दी गई, लेकिन कोई मौके पर नहीं पहुंचा। ग्रामीणों ने बताया कि करीब एक सप्ताह से बाघ गांव में चहलकदमी कर रहा है।