सिर्फ आपकों नहीं, मछलियों को भी होती है 'टेंशन'
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अपना ‘घर’ छूटने के बाद मछलियां टेंशन में आ जाती हैं और घबराहट में वह छटपटाते हुए जिंदगी की आस में संघर्ष करती हैं। पानी से निकालने के बाद मछलियों का शरीर जान बचाने केलिए संघर्ष में इतना रसायन छोड़ता है कि उनका स्वाद ही बिगड़ जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो जिंदा देखकर ताजी मछली लोग इन्हें समझते जरूर हैं लेकिन स्वाद में यह बर्फ वाली मृत मछली से बेहतर नहीं होतीं।
सेहत के लिए लाभकारी होने केअलावा मछली के तेल से बनी दवा हृदय के लिए कारगर है लेकिन शायद कम लोग जानते हैं कि मछलियों का टेंशन हर उत्पाद को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उत्तर प्रदेश के मत्स्य विभाग ने इस पर व्यापक शोध किया है।
मछली का प्रोटीन हो जाता है खत्म
विभाग अब सरकार की ओर से प्रतिबंधित मछलियों के संबंध में जागरुकता के साथ-साथ इस पहलू पर भी लोगों को अवगत करा रहा है कि वह बासी मछलियां न खरीदें।
शोध के मुताबिक जान बचाने केलिए जब मछलियां फड़फड़ाती हैं तो मांसपेशियों में लेक्टिक एसिड जमा होने लगता है और प्रोटीन की मात्रा भी लगातार कम होने लगती है। इससे मछली की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
मत्स्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर एनएस रहमानी ने बताया कि सबसे उचित तो यह है कि मछली को पानी से निकालते ही बर्फ में रख दिया जाए। जल्दी से जल्दी उसको प्रयोग में लाया जाए। क्योंकि जब मछली का प्रोटीन ही खत्म हो जाएगा तो उसमें कोई ताकत नहीं बचेगी।
डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि प्रदेश में सवा लाख एकड़ में मछली का पालन हो रहा है। यहां आमतौर पर कतला, रोहू, नयन, कामन कार्प और शॉल मछलियों की पैदावार ज्यादा है।