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ग्लोबल वार्मिंग से कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे का खतरा
Noida
Updated Sun, 12 May 2013 05:30 AM IST
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नोएडा। पर्यावरण में बढ़ती कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा से पैदा ग्लोबल वार्मिंग के चलते देश में वर्षा की स्थितियां बदल रहीं हैं। आने वाले वर्षों में देश के वर्षा क्षेत्रों में और अधिक वर्षा जबकि मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्र (कृषि उत्पन्नता) में कम वर्षा होने का अनुमान है। अमेरिकी एजेंसी नासा के मौसम वैज्ञानिकों ने 14 क्लाइमेट मॉडलों और पिछले 140 वर्षों के आंकड़ों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। मानसून प्रणाली में आ रहे बदलाव से मौसम वैज्ञानिक चिंतित हैं।
गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर ग्रीन बेल्ट के एमडी विलियम लाऊ और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों द्वारा 3 मई को दी गई रिपोर्ट के अनुसार्र एिशयन मानसून रीजन में सीओटू और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। एक डिग्री फारनेहाइट तापमान की वृद्धि पर अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में 3.9 प्रतिशत वर्षा की बढ़ोतरी होगी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 1 प्रतिशत वर्षा की बढ़ोतरी होगी लेकिन मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों में 1.4 प्रतिशत वर्षा की कमी आ रही है। आईआईएमटी पुणे के मौसम वैज्ञानिक डॉ. कृष्णनन और एनसीआरएमएफ के डॉ. रंजीत सिंह ने भी इस रिपोर्ट का समर्थन किया है।
इन बदलावों का भारतीय मानसून पर भी अच्छा खासा असर पड़ रहा है। देश के मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में और कम वर्षा होगी। वहीं हिमाचल, उत्तराखंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश समेत महाराष्ट्र, उड़ीसा, केरल, गोवा जैसे तटीय क्षेत्रों और मध्यप्रदेश के कुछ भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा का स्तर बढ़ेगा। इससे कई पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
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धान, मक्का, जवार की फसल पर संकट के बादल
आईएमडी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. केेके सिंह ने बताया कि मानसून में मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों में कम वर्षा होने पर उत्तर में हरियाणा, पंजाब, यूपी, बिहार में धान, मक्का और सरसों की फसलों को नुकसान पहुंचेगा। वहीं, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक क्षेत्रों में धान के अलावा मूंग, मक्का, रागी, जवार, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों को नुकसान पहुंचने की प्रबल संभावना है।
पर्यावरण में सीओटू का प्रतिशत बढ़ा
वैज्ञानिक लाऊ के 14 माडलों से 140 वर्षों पर आधारित अध्ययन के अनुसार सीओटू की सघनता लगातार बढ़ी है। शुरुआत में जहां यह 240 पार्टिकल्स प्रति मिलियन थी। अब इसका स्तर 400 पार्टिकल्स प्रति मिलियन है। नासा के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट ‘अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन जनरल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशन के लिए स्वीकृत कर ली गई है।
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गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर ग्रीन बेल्ट के एमडी विलियम लाऊ और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों द्वारा 3 मई को दी गई रिपोर्ट के अनुसार्र एिशयन मानसून रीजन में सीओटू और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। एक डिग्री फारनेहाइट तापमान की वृद्धि पर अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में 3.9 प्रतिशत वर्षा की बढ़ोतरी होगी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 1 प्रतिशत वर्षा की बढ़ोतरी होगी लेकिन मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों में 1.4 प्रतिशत वर्षा की कमी आ रही है। आईआईएमटी पुणे के मौसम वैज्ञानिक डॉ. कृष्णनन और एनसीआरएमएफ के डॉ. रंजीत सिंह ने भी इस रिपोर्ट का समर्थन किया है।
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इन बदलावों का भारतीय मानसून पर भी अच्छा खासा असर पड़ रहा है। देश के मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में और कम वर्षा होगी। वहीं हिमाचल, उत्तराखंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश समेत महाराष्ट्र, उड़ीसा, केरल, गोवा जैसे तटीय क्षेत्रों और मध्यप्रदेश के कुछ भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा का स्तर बढ़ेगा। इससे कई पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
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धान, मक्का, जवार की फसल पर संकट के बादल
आईएमडी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. केेके सिंह ने बताया कि मानसून में मध्य स्तर वाले वर्षा क्षेत्रों में कम वर्षा होने पर उत्तर में हरियाणा, पंजाब, यूपी, बिहार में धान, मक्का और सरसों की फसलों को नुकसान पहुंचेगा। वहीं, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक क्षेत्रों में धान के अलावा मूंग, मक्का, रागी, जवार, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों को नुकसान पहुंचने की प्रबल संभावना है।
पर्यावरण में सीओटू का प्रतिशत बढ़ा
वैज्ञानिक लाऊ के 14 माडलों से 140 वर्षों पर आधारित अध्ययन के अनुसार सीओटू की सघनता लगातार बढ़ी है। शुरुआत में जहां यह 240 पार्टिकल्स प्रति मिलियन थी। अब इसका स्तर 400 पार्टिकल्स प्रति मिलियन है। नासा के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट ‘अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन जनरल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ में प्रकाशन के लिए स्वीकृत कर ली गई है।