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बदलते परिवेश में गुम हो रही प्यारी गौरैया
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गौरैया की फोटो
- फोटो : BIJNOR
मुजफ्फरनगर। वक्त की तब्दीली में पशु पक्षी प्रेमी चिड़ियों की चहचाहट सुनने को तरस गए हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटान, मोबाइल टावरों से निकलने वाली खतरनाक विकिरणों, प्रकृति के दोहन से गौरैया विलुप्त होती जा रही हैं। सवेरे को चिड़ियों का शोर नहीं मिलने से पक्षी प्रेमी आहत हैं। विश्व गौरैया दिवस पर चिड़ियों के बचाने की पहल की जाती है, लेकिन वन विभाग की उदासीनता के चलते कोई इनकी सुरक्षा के कोई माकूल बंदोबस्त नहीं हो पाता है।
गौरैया के लिए बालकनी में घोंसला
लाला जगदीश प्रसाद सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज की जीव विज्ञान प्रवक्ता वंदना शर्मा बताती है कि उन्हें पढ़ाई के दौरान ही पक्षियों से खासा लगाव है। बकौल उनके मोबाइल टावरों की हानिकारक विकिरणों से पक्षियों का अंत होने पर चिंतित थी। मां से पूछा ऐसा क्या करूं, जो गौरैया कभी गुम नहीं हों। इस पर मां ने बालकनी में जगह बनाकर घोसला रखा और पौधे लगाए। प्रतिदिन दाना डाला और पानी भरा। पहले चिड़िया फुदकनी शुरू हुई। फिर इनका यहीं ठिकाना बनता गया। चिड़ियों की प्यारी आवाज चूं चूं सुनने लगी। उन्हें आज भी गौरैया से लगाव है। हर किसी पक्षियों को बचाने का संकल्प लेना आवश्यक है।
विलुप्त हो गए गौरैया के आशियानें
ज्ञानामाजरा निवासी समाजसेवी डॉ. कंवरपाल कहते हैं गंगा जमुना दोआब की भूमि पर तीन दशक पहले गौरेया की गूंज हर किसी को गांव में जगाती थी। लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ से चिड़िया विलुप्त होती जा रही हैं। कड़ियों के मकान उनके लिए माकूल ठिकाना माना जाता है। गांवों में पक्के मकान बढ़ने से दिक्कत आई। पहले कोई पक्षियों के लिए पौष्टिक आहार बाजरा, तो कोई चावल और गेहूं के दाने डालता था। लेकिन अब बेरुखी से कारण पक्षियों की कमी खलती है।
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लाल रंग की चिड़िया देख मन होता था प्रफुल्लित
चरथावल में मेडिकल कारोबारी पशु पक्षी प्रेमी अनिल कंसल बताते हैं कि वह नित्य प्रति दाना डालकर उनकी सुरक्षा के प्रयास करते हैं। कई साल पहले लाल रंग की चिड़िया काफी संख्या में उनकी छतों पर नजर आती है, तो अनायास ही उनका मन प्रफुल्लित हो उठता था। दुर्भाग्य है कि वन विभाग पक्षियों के संरक्षण के प्रति बेपरवाह है। विभाग चिडिय़ों के बचाव के लिए कोई सार्थक पहल नहीं करता।
खरपतवार को कीटनाशक दवाएं बना रही जहरीला
फसलों में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग बढ़ रहा है। चिड़िया जहरीले खरपतवार को आहार के रूप में प्रयोग करती हैं। जिससे उनकी प्रजनन क्षमता कम हो रही है। मोबाइल टावरों की किरणें भी पक्षियों के लिए खतरा है। जंगलों में कटान और पक्षियों के लिए मुफीद माने जाने वाले आवासों की कमी भी पक्षियों के विलुप्त होने के कारण है। - प्रोफेसर डॉ. डीके सिंह, पशुपालन विभाग कृषि विज्ञान केंद्र
कैसे करें बचाव
पक्षियों को बचाने के लिए जागरूक कार्यक्रम हों
घरों में चिड़ियों को संरक्षित करने के लिए प्रयास हों
आंगन और छतों पर में पक्षियों के लिए दाना पानी डालें
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गौरैया के लिए बालकनी में घोंसला
लाला जगदीश प्रसाद सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज की जीव विज्ञान प्रवक्ता वंदना शर्मा बताती है कि उन्हें पढ़ाई के दौरान ही पक्षियों से खासा लगाव है। बकौल उनके मोबाइल टावरों की हानिकारक विकिरणों से पक्षियों का अंत होने पर चिंतित थी। मां से पूछा ऐसा क्या करूं, जो गौरैया कभी गुम नहीं हों। इस पर मां ने बालकनी में जगह बनाकर घोसला रखा और पौधे लगाए। प्रतिदिन दाना डाला और पानी भरा। पहले चिड़िया फुदकनी शुरू हुई। फिर इनका यहीं ठिकाना बनता गया। चिड़ियों की प्यारी आवाज चूं चूं सुनने लगी। उन्हें आज भी गौरैया से लगाव है। हर किसी पक्षियों को बचाने का संकल्प लेना आवश्यक है।
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विलुप्त हो गए गौरैया के आशियानें
ज्ञानामाजरा निवासी समाजसेवी डॉ. कंवरपाल कहते हैं गंगा जमुना दोआब की भूमि पर तीन दशक पहले गौरेया की गूंज हर किसी को गांव में जगाती थी। लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ से चिड़िया विलुप्त होती जा रही हैं। कड़ियों के मकान उनके लिए माकूल ठिकाना माना जाता है। गांवों में पक्के मकान बढ़ने से दिक्कत आई। पहले कोई पक्षियों के लिए पौष्टिक आहार बाजरा, तो कोई चावल और गेहूं के दाने डालता था। लेकिन अब बेरुखी से कारण पक्षियों की कमी खलती है।
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लाल रंग की चिड़िया देख मन होता था प्रफुल्लित
चरथावल में मेडिकल कारोबारी पशु पक्षी प्रेमी अनिल कंसल बताते हैं कि वह नित्य प्रति दाना डालकर उनकी सुरक्षा के प्रयास करते हैं। कई साल पहले लाल रंग की चिड़िया काफी संख्या में उनकी छतों पर नजर आती है, तो अनायास ही उनका मन प्रफुल्लित हो उठता था। दुर्भाग्य है कि वन विभाग पक्षियों के संरक्षण के प्रति बेपरवाह है। विभाग चिडिय़ों के बचाव के लिए कोई सार्थक पहल नहीं करता।
खरपतवार को कीटनाशक दवाएं बना रही जहरीला
फसलों में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग बढ़ रहा है। चिड़िया जहरीले खरपतवार को आहार के रूप में प्रयोग करती हैं। जिससे उनकी प्रजनन क्षमता कम हो रही है। मोबाइल टावरों की किरणें भी पक्षियों के लिए खतरा है। जंगलों में कटान और पक्षियों के लिए मुफीद माने जाने वाले आवासों की कमी भी पक्षियों के विलुप्त होने के कारण है। - प्रोफेसर डॉ. डीके सिंह, पशुपालन विभाग कृषि विज्ञान केंद्र
कैसे करें बचाव
पक्षियों को बचाने के लिए जागरूक कार्यक्रम हों
घरों में चिड़ियों को संरक्षित करने के लिए प्रयास हों
आंगन और छतों पर में पक्षियों के लिए दाना पानी डालें