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आम आदमी को भनक नहीं लगा और बिक गईं नकली किताबें
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आम आदमी को भनक नहीं लगा और बिक गईं नकली किताबें
मुजफ्फरनगर। एनसीईआरटी की किताबों का लाखों का व्यापार हो गया और किसी को भनक तक भी नहीं लगी। ग्रामीण अंचल के छोटे दुकानदार इस बात को लेकर सशंकित जरूर रहे कि इस बार एनसीईआरटी की किताबों में भी कमीशन मिल गया। मेरठ में 35 करोड़ की फर्जी एनसीईआरटी की पुस्तकें बरामद होने पर जिले के दुकानदारों में भी खलबली है। उन्हें भी लग रहा है कि इस बार कुछ बड़े दुकानदारों ने इन किताबों पर कमीशन क्यों दिया।
जिले में किताबों की छपाई का काम तो होता नहीं है, लेकिन पब्लिक स्कूलों में बच्चों की रिकार्ड संख्या होने के कारण एनसीईआरटी की किताबों की डिमांड अधिक रहती है। किताबों का लाखों का व्यापार दो-तीन महीने में हो जाता है। इस बार शुरू में यहां एनसीईआरटी की किताबें कम रही, लेकिन बाद में अचानक डिमांड पूरी हो गई। आम आदमी असली-नकली का कोई भेद ही नहीं समझ पाया। थोक दुकानदारों ने छोटे दुकानदारों और इन दुकानदारों ने ग्राहकों तक ये किताबें आसानी से पहुंचा दी। कुछ बड़े स्कूलों की जो दुकानें तय हैं, उन पर भी किताबें धड़ाधड़ बिक गई। ग्रामीण अंचल के छोटे दुकानदारों को इस बार यह संशय जरूर हुआ कि पहली बार उन्हें एनसीईआरटी की किताबों पर भी दस प्रतिशत कमीशन मिल गया। अमूमन इन किताबों पर निर्धारित मूल्य में कभी कोई छूट नहीं मिलती थी। ऐसे दुकानदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि व्यापार तो बड़ा हुआ है, लेकिन आम आदमी को भनक ही नहीं लग पाई कि हम असली किताब खरीद रहे हैं या नकली खरीद रहे हैं। प्रभारी डीआईओएस ललित मोहन गुप्ता का कहना है कि अभी तक जनपद में जांच के कोई आदेश नहीं आए हैं, जो आदेश आएगा उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई होगी। किसी ने फर्जी किताबें मिलने की शिकायत भी नहीं की है। शिकायत मिलती तो जांच कर कार्रवाई कराई जाएगी।
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मुजफ्फरनगर। एनसीईआरटी की किताबों का लाखों का व्यापार हो गया और किसी को भनक तक भी नहीं लगी। ग्रामीण अंचल के छोटे दुकानदार इस बात को लेकर सशंकित जरूर रहे कि इस बार एनसीईआरटी की किताबों में भी कमीशन मिल गया। मेरठ में 35 करोड़ की फर्जी एनसीईआरटी की पुस्तकें बरामद होने पर जिले के दुकानदारों में भी खलबली है। उन्हें भी लग रहा है कि इस बार कुछ बड़े दुकानदारों ने इन किताबों पर कमीशन क्यों दिया।
जिले में किताबों की छपाई का काम तो होता नहीं है, लेकिन पब्लिक स्कूलों में बच्चों की रिकार्ड संख्या होने के कारण एनसीईआरटी की किताबों की डिमांड अधिक रहती है। किताबों का लाखों का व्यापार दो-तीन महीने में हो जाता है। इस बार शुरू में यहां एनसीईआरटी की किताबें कम रही, लेकिन बाद में अचानक डिमांड पूरी हो गई। आम आदमी असली-नकली का कोई भेद ही नहीं समझ पाया। थोक दुकानदारों ने छोटे दुकानदारों और इन दुकानदारों ने ग्राहकों तक ये किताबें आसानी से पहुंचा दी। कुछ बड़े स्कूलों की जो दुकानें तय हैं, उन पर भी किताबें धड़ाधड़ बिक गई। ग्रामीण अंचल के छोटे दुकानदारों को इस बार यह संशय जरूर हुआ कि पहली बार उन्हें एनसीईआरटी की किताबों पर भी दस प्रतिशत कमीशन मिल गया। अमूमन इन किताबों पर निर्धारित मूल्य में कभी कोई छूट नहीं मिलती थी। ऐसे दुकानदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि व्यापार तो बड़ा हुआ है, लेकिन आम आदमी को भनक ही नहीं लग पाई कि हम असली किताब खरीद रहे हैं या नकली खरीद रहे हैं। प्रभारी डीआईओएस ललित मोहन गुप्ता का कहना है कि अभी तक जनपद में जांच के कोई आदेश नहीं आए हैं, जो आदेश आएगा उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई होगी। किसी ने फर्जी किताबें मिलने की शिकायत भी नहीं की है। शिकायत मिलती तो जांच कर कार्रवाई कराई जाएगी।
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