फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Muzaffarnagar News ›   Special in the country when 43 years of emergency

नहीं भूलता नसबंदी कांड का खौफनाक मंजर, पुलिस फायरिंग में मारे गए थे 42 लोग 

Mon, 25 Jun 2018 12:29 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/मुजफ्फरनगर
ब्यूरो, अमर उजाला/मुजफ्फरनगर Updated Mon, 25 Jun 2018 12:29 AM IST
विज्ञापन
Special in the country when 43 years of emergency
नसबंदी के विरोध में हुई गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में बना शहीद चौक। - फोटो : अमर उजाला
आपातकाल के दौरान नसबंदी कांड से देश की सियासत में भूचाल आ गया था। शहर में खालापार में 18 अक्तूबर 1976 को नसबंदी का विरोध कर रहे नागरिकों पर पुलिस प्रशासन ने फायरिंग की, जिसमें 42 बेगुनाहों की मौत हुई थी। मृतकों की स्मृति में यहां शहीद चौक बना हुआ है।
विज्ञापन


हालांकि 42 साल बाद भी इस घटना की जांच रिपोर्ट सामने नहीं आ पाई। 21 माह रहे आपातकाल मेें हुए इस खौफनाक मंजर को लोग आज भी नहीं भूले हैं। 26 जून 1975 को तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की संस्तुति पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने धारा 352 के आधीन आपातकाल की घोषणा कर दी थी। 
विज्ञापन


आपातकाल में एक तरफ देश राजनैतिक संकट से जूझ रहा था, उधर नसबंदी अभियान के विरोध में भी गुस्सा बढ़ने लगा। शहर के खालापार में नसबंदी के खिलाफ एकजुट नागरिकों पर फायरिंग कर दी गई। मृतकों की स्मृति में शहीद चौक बना है, जहां शिलापट पर 25 शहीदों के नाम अंकित है।
विज्ञापन
विज्ञापन


फक्करशाह चौक पर 17 मृतकों के नाम दिए गए है। नसबंदी कांड प्रदेश और देश की सुर्खियां बना था। उस घटना को याद कर अभी भी लोग सिहर उठते है। कस्सावान निवासी अनीस अहमद बताते है कि आपातकाल के वक्त नसबंदी अभियान से डर कर लोग जंगल में छिपते थे।

सरकारी अमले ने जिला अस्पताल और सोल्जर्स बोर्ड में कैंप लगा रखे थे। घटना के दिन बुजुर्गों और जवानों को जबरदस्ती पकड़ कर कैंप में ले जाया जा रहा था, जिसकी वजह से आक्रोश भड़का। 

खालापार के इरशाद बाबा बताते है कि उस वक्त मेरी 15 साल थी। फायरिंग की आवाज सुन कर हम डर गए। लोग सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। कांग्रेस के कार्यवाहक जिलाध्यक्ष मौहम्मद तारिक कुरैशी बताते है कि फायरिंग के निशान आज भी उनके मकान पर है।

कस्सावान के मोहम्मद इजहार अहमद ने कहा कि वह अपने पिता सईद के साथ विरोध कर रही भीड़ में मौजूद थे। निहत्थे लोगों पर पुलिस प्रशासन ने फायरिंग कर दी। चारों ओर लाशें बिखरी थीं।

आपातकाल में हाजी इकबाल अहमद भी जेल गए 
खतौली। आपातकाल में खतौली के मोहल्ला मिट्ठूलाल के रहने वाले हाजी इकबाल अहमद भी जेल गए थे। इमरजेंसी में हाजी ने नगर के ही रहने वाले छह साथियों के साथ एक साल की सजा काटी थी। जिनमें से चार साथियों की मौत हो चुकी है। हाजी इकबाल अहमद का नगर की मशहूर बिददीवाड़ा मार्केट में जूतों का बड़ा शोरूम है। सरकार की ओर से आज उनको 15 हजार प्रतिमाह पेंशन मिलती है। 

हाजी इकबाल अहमद बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये के चलते 25 जून 1975 की देर रात से इमरजेंसी लगा दी गई थी। उनको नौ जुलाई 1975 को सरकारी अस्पताल से पुलिस ने उठाया था। उस वक्त उनके साथ मोहल्ला तगान निवासी लाला सेवाराम सतप्रकाश, मोहल्ला काजियान निवासी इरशाद टेलर, मोहल्ला काजियान निवासी नूर इलाही, मोहल्ला ढाकन चौक निवासी शरीफ, मोहल्ला मिटठूलाल के कल्लू ठेकेदार, फजूल रहमान, अमीरचंद पंजाबी जेल गए थे।

पुलिस ने उनके विरुद्ध डीआईआर और मीसा में मुकदमा दर्जकर जिला कारागार भेज दिया था। उन्होंने एक साल तक अपने साथियों के साथ जेल काटी थी। 2006 से सरकार ने इमरजेंसी में जेल जाने वालों को 500 रुपये पेंशन देनी शुरू की थी। पेंशन योजना लागू होने से पूर्व उनके साथी कल्लू ठेकेदार, फजूल रहमान व लाला सेवाराम सतप्रकाश की मौत हो चुकी थी। साथी अमीरचंद पंजाबी ने एक वर्ष तक पेंशन का लाभ लिया, इसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। हाजी इकबाल अहमद को आज सरकार की ओर से 15 हजार रुपये पेंशन मिलती है। 

कारागार में मशहूर हो गई थी रेडियो झूठिस्तान 
चरथावल। एफएम रेडियो आज जैसे श्रोताओं को आरजे की आवाज और बातों का अंदाज लुभाता है, वैसे ही आपातकाल में डॉ. मुस्तफा की व्यंग से घिरी खबरें सुनने को जेल में लोकतंत्र सेनानी जुटते थे। सियासत पर टिप्पणियां इतनी पसंद की गई कि उन्हें रेडियो झूठिस्तान के नाम से ख्याति मिल गई। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह तक उन्हें कार्यक्रम में व्यंगात्मक खबरें सुनते थे। 

करीब चार दशक पूर्व इमरजेंसी के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये की याद आते ही कस्बे के मोहल्ला शेखजादगान पूर्वी के डॉ. मुस्तफा सिहर उठते हैं। उन्हें 25 जून 1975 को आपातकाल के दौरान प्रशासन ने मैन बाजार से उठाकर जेल भेजा था। बकौल उनके डीएवी कॉलेज में छात्र नेता होने के कारण प्रशासन के निशाने पर आ गए।

लोकतंत्र की हत्या करने आरोप लगाते हुए उन्होंने तानाशाही फैसले पर सरकार का विरोध करने का बीड़ा उठा लिया। गुपचुप मीटिंग करने के दौरान 13 जुलाई 1975 को उन्हें डीआईआर के तहत कारागार मुजफ्फरनगर में बंद कर दिया। ब्लॉक से एक मात्र जेल में बंद मुस्तफा द्वारा जेल के सैकड़ों लोकतंत्र सेनानियों की मंडली को देश-विदेश एवं वक्त से जुड़ी खबरों को व्यगंात्मक अंदाज में प्रस्तुत करने का अंदाज भाता था। 

सियासत पर टिप्पणियां तो गय्यूर अली खां, शिवराज सिंह, पूर्व विधायक नंदराम, चंदन सिंह, सईद मुर्तजा आदि को खूब लुभाती थी। उस दौर में नसबंदी का दौर था, तो उन्होंने ...अभी अभी ताजा खबर से पता चला है कि संजय गांधी ने कहा कि मैं चाहता हूं कि 12 साल से 70 साल तक उम्र का कोई व्यक्ति नसबंदी से छूट नहीं जाए, इस पर जेल में बंद लोगों ने गुस्से का इजहार किया है... प्रस्तुत की, तो बंदी लोटपोट हो जाया करते थे।


इमरजेंसी के दौरान करीब साढ़े तीन महीने जेल में बंद रहने के दौरान उन्होंने जुल्म की दास्तां शेयर की। डॉ. मुस्तफा बताते है पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह भी उन्हें अनेक कार्यक्रमों में रेडियो झूठिस्तान के नाम से पुकारते अलग अंदाज में प्रस्तुत करने को कहा करते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed