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पेपर और गुड़ उद्योग में देश में पहले नंबर पर
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पेपर और गुड़ उद्योग में देश में पहले नंबर पर
तरक्की के 34 साल----
गुड़ और पेपर ने दिलाई जिले को नई पहचान
दोनों उद्योग में देश में पहले नंबर पर मुजफ्फरनगर
उद्योगों से जिले में एक लाख लोगों को रोजगार
चीनी, लोहा उद्योग में भी जिले की खास पहचान
(फोटो समाचार)
संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। पेपर और गुड़ उद्योग ने मुजफ्फरनगर को नई पहचान दिलाई है। इन उद्योग में जिला देश में पहले स्थान पर है। पेपर मिलों, कोल्हुओं, लोहा उद्योग और चीनी उद्योग से जिले में एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। उद्योगों ने बीते 34 सालों में ही अधिक तरक्की की है। इस तरक्की का अमर उजाला साक्षी है। तीन दशक पहले खत्म हुआ खांडसारी उद्योग भी एक बार फिर खड़े होने की कोशिश कर रहा है।
पेपर उद्योग में लगातार तरक्की
मुजफ्फरनगर में पेपर उद्योग की शुरूआत 1974 में हुई, सबसे पहले यहां अग्रवाल पेपर मिल लगी। इसके बाद खुराना और सुपर पेपर मिल की स्थापना हुई। 1990 तक पेपर उद्योग में कोई खास तरक्की नहीं हुई, लेकिन इसके बाद यह उद्योग बढ़ता गया। शुरू में प्रारंभ हुई पेपर मिलें तो बंद हो गई, लेकिन आधुनिक मशीनों के साथ नई पेपर मिल लग गई। पेपर उद्योग से जुड़े पंकज अग्रवाल बताते हैं कि इस समय हम पूरे देश में नंबर एक पर है। जिले में 32 पेपर मिले हैं। इन पेपर मिलों में वेस्ट मैटीरियल से पेपर बनाया जा रहा है। पेपर मिलों की एक साल में 15 लाख टन पेपर बनाने की क्षमता है। देश में छोटी पेपर मिल की शुरूआत इसी जिले से हुई। पेपर उद्योग से जिले में परोक्ष रूप से 15 हजार और अपरोक्ष रूप से 40 हजार लोग रोजगार पा रहे हैं।
गुड़ उद्योग में देश में सबसे आगे
गुड़ उद्योग में मुजफ्फरनगर जिला देश में शुरू से ही नंबर एक पर है। इसे दूसरा कोई जिला आज तक पछाड़ नहीं पाया है। पूरे देश में गुड़ की सप्लाई यहीं से होती है। जिले में ग्रामीण क्षेत्र में करीब साढे़ तीन हजार कोल्हू गुड़ बनाते हैं। इन कोल्हुओं पर 50 हजार लोगों को रोजगार मिला है। इसी के चलते प्रदेश सरकार ने गुड़ को एक जनपद एक उत्पाद में शामिल किया है। एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी यहीं पर है। इसी के साथ चीनी उद्योग में जिला अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आठ चीनी मिलों में यहां गन्ना सप्लाई होता है। चीनी मिलों में भी लगभग दस हजार लोग रोजगार पा रहे हैं।
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लोहा उद्योग रही है पहचान
मुजफ्फरनगर। बीते 34 सालों में यहां लोहा उद्योग काफी बढ़ा है। 1980 के दशक में यहां केवल रेनबो, अरिहंत, यूपी स्टील, पालीवाल लोहा मिल थी। ये फैक्टरी तो बंद होती चली गई, इनमें आज केवल यूपी स्टील बची है। 1985 के बाद यहां लोहा फैक्टरी बड़ी संख्या में लगनी शुरू हुई। 1990 से 2005 तक लोहा उद्योग यहां फला फूला। यहां लोहा और स्टील की फैक्टरी की संख्या 100 से ऊपर पहुंच गई थी। इस समय भी 50 से अधिक लोहा फैक्टरी कार्यरत है। इनमें रोलिंग मिलों की हालत तो ठीक है, लेकिन इंगट कारखानों के सामने समस्या है। कुल मिलाकर लोहा उद्योग में यहां दस हजार से अधिक लोग रोजगार पा रहे हैं।
खांडसारी उद्योग एक बार फिर शुरू हुआ
मुजफ्फरनगर। चीनी मिलों की संख्या बढ़ने के बाद तीन दशक पहले खांडसारी उद्योग यहां पूरी तरह मृत प्राय हो गया था। इस बार इस उद्योग में फिर से जान पड़ती दिखाई दे रही है। 26 क्रेशर इस बार राब और खांड बना रहे हैं। इस उद्योग को चीनी मिलों के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
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तरक्की के 34 साल----
गुड़ और पेपर ने दिलाई जिले को नई पहचान
दोनों उद्योग में देश में पहले नंबर पर मुजफ्फरनगर
उद्योगों से जिले में एक लाख लोगों को रोजगार
चीनी, लोहा उद्योग में भी जिले की खास पहचान
(फोटो समाचार)
संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। पेपर और गुड़ उद्योग ने मुजफ्फरनगर को नई पहचान दिलाई है। इन उद्योग में जिला देश में पहले स्थान पर है। पेपर मिलों, कोल्हुओं, लोहा उद्योग और चीनी उद्योग से जिले में एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। उद्योगों ने बीते 34 सालों में ही अधिक तरक्की की है। इस तरक्की का अमर उजाला साक्षी है। तीन दशक पहले खत्म हुआ खांडसारी उद्योग भी एक बार फिर खड़े होने की कोशिश कर रहा है।
पेपर उद्योग में लगातार तरक्की
मुजफ्फरनगर में पेपर उद्योग की शुरूआत 1974 में हुई, सबसे पहले यहां अग्रवाल पेपर मिल लगी। इसके बाद खुराना और सुपर पेपर मिल की स्थापना हुई। 1990 तक पेपर उद्योग में कोई खास तरक्की नहीं हुई, लेकिन इसके बाद यह उद्योग बढ़ता गया। शुरू में प्रारंभ हुई पेपर मिलें तो बंद हो गई, लेकिन आधुनिक मशीनों के साथ नई पेपर मिल लग गई। पेपर उद्योग से जुड़े पंकज अग्रवाल बताते हैं कि इस समय हम पूरे देश में नंबर एक पर है। जिले में 32 पेपर मिले हैं। इन पेपर मिलों में वेस्ट मैटीरियल से पेपर बनाया जा रहा है। पेपर मिलों की एक साल में 15 लाख टन पेपर बनाने की क्षमता है। देश में छोटी पेपर मिल की शुरूआत इसी जिले से हुई। पेपर उद्योग से जिले में परोक्ष रूप से 15 हजार और अपरोक्ष रूप से 40 हजार लोग रोजगार पा रहे हैं।
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गुड़ उद्योग में देश में सबसे आगे
गुड़ उद्योग में मुजफ्फरनगर जिला देश में शुरू से ही नंबर एक पर है। इसे दूसरा कोई जिला आज तक पछाड़ नहीं पाया है। पूरे देश में गुड़ की सप्लाई यहीं से होती है। जिले में ग्रामीण क्षेत्र में करीब साढे़ तीन हजार कोल्हू गुड़ बनाते हैं। इन कोल्हुओं पर 50 हजार लोगों को रोजगार मिला है। इसी के चलते प्रदेश सरकार ने गुड़ को एक जनपद एक उत्पाद में शामिल किया है। एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी यहीं पर है। इसी के साथ चीनी उद्योग में जिला अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आठ चीनी मिलों में यहां गन्ना सप्लाई होता है। चीनी मिलों में भी लगभग दस हजार लोग रोजगार पा रहे हैं।
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लोहा उद्योग रही है पहचान
मुजफ्फरनगर। बीते 34 सालों में यहां लोहा उद्योग काफी बढ़ा है। 1980 के दशक में यहां केवल रेनबो, अरिहंत, यूपी स्टील, पालीवाल लोहा मिल थी। ये फैक्टरी तो बंद होती चली गई, इनमें आज केवल यूपी स्टील बची है। 1985 के बाद यहां लोहा फैक्टरी बड़ी संख्या में लगनी शुरू हुई। 1990 से 2005 तक लोहा उद्योग यहां फला फूला। यहां लोहा और स्टील की फैक्टरी की संख्या 100 से ऊपर पहुंच गई थी। इस समय भी 50 से अधिक लोहा फैक्टरी कार्यरत है। इनमें रोलिंग मिलों की हालत तो ठीक है, लेकिन इंगट कारखानों के सामने समस्या है। कुल मिलाकर लोहा उद्योग में यहां दस हजार से अधिक लोग रोजगार पा रहे हैं।
खांडसारी उद्योग एक बार फिर शुरू हुआ
मुजफ्फरनगर। चीनी मिलों की संख्या बढ़ने के बाद तीन दशक पहले खांडसारी उद्योग यहां पूरी तरह मृत प्राय हो गया था। इस बार इस उद्योग में फिर से जान पड़ती दिखाई दे रही है। 26 क्रेशर इस बार राब और खांड बना रहे हैं। इस उद्योग को चीनी मिलों के विकल्प के रूप में देखा जाता है।