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हमारे गीतों में समाज की पीड़ा छलकनी चाहिए : राजन

Sun, 29 Nov 2020 11:42 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 29 Nov 2020 11:42 PM IST
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Our songs should spill the suffering of society: Rajan
राजेंद्र राजन। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
हमारे गीतों में समाज की पीड़ा छलकनी चाहिए : राजन
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मुजफ्फरनगर। देश के जाने-माने गीतकार राजेंद्र राजन कहते हैं कि साहित्य एक औषधि है, जो कि हृदय की रुग्णता को दूर करके उसे विकासोन्मुखी वातावरण प्रदान करती है। हमारे गीतों में समाज की पीड़ा उसका यथार्थ होना चाहिए, तभी वह गीत आम जनमानस को छू पाते हैं।

मैं रात-रात भर जगा तुम्हें भुलाने के लिए, मैं पात-पात झर गया, वसंत लाने के लिए। काव्य गोष्ठियो में गीतकार राजेंद्र राजन की ये पंक्तियां जरूर सुनी जाती हैं। श्रृंगार रस के देश के ये बड़े गीतकार मुजफ्फरनगर में वाणी के कार्यक्रम में आए तो उनसे बातचीत की। राजन कहते हैं कि उनके अधिकतम गीत श्रृंगार रस पर है। वह आम आदमी की भावनाओं से जुड़ने का प्रयास करते हैं। उनका गीत-केवल दो गीत लिखे मैने, इक गीत तुम्हारे मिलने का, इक गीत तुम्हारे खोने का। हमारी अनुभूतियों को गहराइयों तक ले जाता है। गीत के माध्यम से वह भावनाओं को किस तरह सामने लाते हैं यह कला उन्हीं के पास है। उनका गीत- मैं लिपटकर तुम्हें, स्वप्न के गांव की, इक नदी में नहाता रहा रात भर, कोई था भी नहीं जिंदगी की जिसे, मैं कहानी सुनाता रहा रात भर। अपने गीतों में वह सामाजिक हालात पर भी लिखना नहीं चूकते। उनका गीत- भाईचारे, सच्चाई का सुंदर संसार कहां होगा, इंसानों में ही प्यार नहीं गीतों में प्यार कहां होगा। राजेंद्र राजन कहते हैं कि सभी गीतों के मूल में पीड़ा नहीं होती है, कुछ सुखद अहसासों की अभिव्यक्ति भी हैं। सामान्यत: जिंदगी का असली रूप यही है जिसमें हजार पल टूटने के हैं तो दो पल जुड़ने के हैं। मंचों पर कविता की स्थिति पर वह कहते हैं कि सकारात्मक मूल्यों का हरास हुआ है। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह है कि धैर्य की कमी हुई है, जो जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है।
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