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भाजपा की हार से हाईकमान तक हलचलश, संगठन के जिम्मेदार नेताओं पर गाज गिरना तय
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 02 Dec 2017 11:17 PM IST
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निकाय चुनाव 2017
- फोटो : अमर उजाला
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नगर पालिकाध्यक्ष पद के चुनाव में हार से हुई पार्टी की किरकिरी के बाद भाजपा में हाईकमान तक हलचल मची हुई है। किस स्तर पर कहां-कहां चूक हुई, सभी बिंदुओं की समीक्षा शुरू हो गई है। हार के लिए जिम्मेदार संगठन के कई बड़े नेताओं पर गाज गिरनी तय मानी जा रही है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए जिले की दोनों पालिकाओं में हार से पार्टी के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
निकाय चुनाव में सूबे में केसरिया की लहर के बावजूद जिले में मुजफ्फरनगर और खतौली पालिकाध्यक्ष पद पर भाजपा प्रत्याशियों की करारी हार से पार्टी सकते में है। कांग्रेस से मिली पराजय को पचा पाना हाईकमान के लिए मुश्किल हो रहा है। सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रदेश अध्यक्ष डॉ महेंद्र पांडेय तक सभी में शहरी निकायों में भाजपा की कामयाबी की भले ही खुशियां हों, लेकिन मुजफ्फरनगर में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन पर चिंता की लकीरें हैं।
भाजपा प्रत्याशी सुधाराज शर्मा के चुनाव में किस स्तर पर प्रबंधन की कमी रही, पार्टी के बड़े नेताओं में उदासीनता की क्या वजह बनी, जैसे सवाल बहस का मुद्दा बने हैं। चुनाव में आरएसएस की धारदार रणनीति भी दिखाई नहीं दी, जिसकी वजह से पार्टी संगठन अलग-थलग रहा। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जैसा मैनेजमेंट बनाने में पार्टी पूरी तरह नाकाम रही। सात सितंबर 2013 के दंगे के बाद मुजफ्फरनगर भाजपा के लिए राजनीति की धुरी बन गया था, मगर पालिकाध्यक्ष पद के चुनाव में सबकुछ धराशायी हो गया।
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जिले में सांसद से लेकर एमएलए तक सभी भाजपा के हैं, फिर भी सुधाराज शर्मा को ऐसी पार्टी से शिकस्त मिली, जो प्रदेश में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। बड़ा सवाल यह है कि भाजपा अपने वोटबैंक को बिखरने से क्यों नहीं रोक पाई। वैश्य, पंजाबी, अतिपिछड़े वोटों की जिन नेताओं पर जिम्मेदारी थी, उन्होंने आखिर क्या किया? भाजपा का गढ़ माने जाने वाले गांधी कॉलोनी, नईमंडी, रामपुरी, इंदिरा कालोनी, आनंदपुरी, केवलपुरी, साकेत और ब्रह्मपुरी से कांग्रेस को बड़ी संख्या में वोट मिले।
यही वजह है कि पहले चरण से पीछे हो गई भाजपा अंत तक बढ़त नहीं बना पाई। प्रत्याशी सुधाराज और उनके पति अरविंद राज शर्मा खुद ही प्रचार के लिए भागदौड़ करते रहे। भाजपा की पूरी जिला कार्यकारिणी सिर्फ कुछ ही मौकों पर नजर आई। टिकट चयन में हुए बवाल से पहले ही पार्टी के कई बड़े नेता तटस्थ हो गए थे, जिसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा।
हाईकमान ने जिले में भाजपा की नाकामी पर समीक्षा शुरू कर दी है। निकाय चुनाव में प्रभारी बनाए गए नेताओं से फीडबैक लिया गया है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव की अग्निपरीक्षा को देखते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हार के जिम्मेदार नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों पर गाज गिराने की तैयारी कर ली है।
निकाय चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं होने पर जिले का कोई भी नेता कुछ बोलने को तैयार नहीं है। दबी जुबान से एक-दूसरे पर नाकामी का ठीकरा फोड़ रहे हैं। जिलाध्यक्ष रुपेंद्र सैनी का कहना है कि राजनीति में हार-जीत होती रहती हैं। पिछले निकाय चुनाव में भाजपा के तीन अध्यक्ष चुने गए थे। अबकी बार भी तीन प्रत्याशी जीते हैं।
नीचे कमल, ऊपर पंजा
मुजफ्फरनगर। पालिका चुनाव में वोटों का ऐसा समीकरण उलट-पुलट हुआ कि प्रत्याशियों को समझ नहीं आ रहा। शहर के 50 वार्डों की मतगणना के बाद साफ हो गया कि मतदाताओं ने भाजपा के वार्ड सदस्यों को वोट दिया, मगर चेयरमैन के लिए उनकी पसंद कांग्रेस बन गई। वार्डों में भाजपा के करीब 18 सभासद चुने गए हैं, इन वार्डों में भी भाजपा के चेयरमैन प्रत्याशी सुधाराज शर्मा को उतने वोट नहीं मिले, जितने कांग्रेस की अंजू अग्रवाल को मिले।
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निकाय चुनाव में सूबे में केसरिया की लहर के बावजूद जिले में मुजफ्फरनगर और खतौली पालिकाध्यक्ष पद पर भाजपा प्रत्याशियों की करारी हार से पार्टी सकते में है। कांग्रेस से मिली पराजय को पचा पाना हाईकमान के लिए मुश्किल हो रहा है। सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रदेश अध्यक्ष डॉ महेंद्र पांडेय तक सभी में शहरी निकायों में भाजपा की कामयाबी की भले ही खुशियां हों, लेकिन मुजफ्फरनगर में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन पर चिंता की लकीरें हैं।
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भाजपा प्रत्याशी सुधाराज शर्मा के चुनाव में किस स्तर पर प्रबंधन की कमी रही, पार्टी के बड़े नेताओं में उदासीनता की क्या वजह बनी, जैसे सवाल बहस का मुद्दा बने हैं। चुनाव में आरएसएस की धारदार रणनीति भी दिखाई नहीं दी, जिसकी वजह से पार्टी संगठन अलग-थलग रहा। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जैसा मैनेजमेंट बनाने में पार्टी पूरी तरह नाकाम रही। सात सितंबर 2013 के दंगे के बाद मुजफ्फरनगर भाजपा के लिए राजनीति की धुरी बन गया था, मगर पालिकाध्यक्ष पद के चुनाव में सबकुछ धराशायी हो गया।
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जिले में सांसद से लेकर एमएलए तक सभी भाजपा के हैं, फिर भी सुधाराज शर्मा को ऐसी पार्टी से शिकस्त मिली, जो प्रदेश में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। बड़ा सवाल यह है कि भाजपा अपने वोटबैंक को बिखरने से क्यों नहीं रोक पाई। वैश्य, पंजाबी, अतिपिछड़े वोटों की जिन नेताओं पर जिम्मेदारी थी, उन्होंने आखिर क्या किया? भाजपा का गढ़ माने जाने वाले गांधी कॉलोनी, नईमंडी, रामपुरी, इंदिरा कालोनी, आनंदपुरी, केवलपुरी, साकेत और ब्रह्मपुरी से कांग्रेस को बड़ी संख्या में वोट मिले।
यही वजह है कि पहले चरण से पीछे हो गई भाजपा अंत तक बढ़त नहीं बना पाई। प्रत्याशी सुधाराज और उनके पति अरविंद राज शर्मा खुद ही प्रचार के लिए भागदौड़ करते रहे। भाजपा की पूरी जिला कार्यकारिणी सिर्फ कुछ ही मौकों पर नजर आई। टिकट चयन में हुए बवाल से पहले ही पार्टी के कई बड़े नेता तटस्थ हो गए थे, जिसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा।
हाईकमान ने जिले में भाजपा की नाकामी पर समीक्षा शुरू कर दी है। निकाय चुनाव में प्रभारी बनाए गए नेताओं से फीडबैक लिया गया है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव की अग्निपरीक्षा को देखते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हार के जिम्मेदार नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों पर गाज गिराने की तैयारी कर ली है।
निकाय चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं होने पर जिले का कोई भी नेता कुछ बोलने को तैयार नहीं है। दबी जुबान से एक-दूसरे पर नाकामी का ठीकरा फोड़ रहे हैं। जिलाध्यक्ष रुपेंद्र सैनी का कहना है कि राजनीति में हार-जीत होती रहती हैं। पिछले निकाय चुनाव में भाजपा के तीन अध्यक्ष चुने गए थे। अबकी बार भी तीन प्रत्याशी जीते हैं।
नीचे कमल, ऊपर पंजा
मुजफ्फरनगर। पालिका चुनाव में वोटों का ऐसा समीकरण उलट-पुलट हुआ कि प्रत्याशियों को समझ नहीं आ रहा। शहर के 50 वार्डों की मतगणना के बाद साफ हो गया कि मतदाताओं ने भाजपा के वार्ड सदस्यों को वोट दिया, मगर चेयरमैन के लिए उनकी पसंद कांग्रेस बन गई। वार्डों में भाजपा के करीब 18 सभासद चुने गए हैं, इन वार्डों में भी भाजपा के चेयरमैन प्रत्याशी सुधाराज शर्मा को उतने वोट नहीं मिले, जितने कांग्रेस की अंजू अग्रवाल को मिले।