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कवाल कांड पर फैसला : सब बेचैन थे और कवाल था शांत
Sat, 09 Feb 2019 01:26 AM IST
Deepak Kausik
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Published by: Deepak Kausik
Updated Sat, 09 Feb 2019 01:26 AM IST
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कवाल कांड का फैसला आने के बाद विलाप करते दोषियों के परिजन।
- फोटो : अमर उजाला
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साढ़े पांच साल पहले देखे मंजर को भूलकर कवाल आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन हत्याकांड से जुड़ी खबरें ठिठकने को मजबूर कर देती हैं, जिन्हें सजा मिली वे तो अपने हैं ही, जो मारे गए वह भी गैर नहीं थे। शुक्रवार को गांव का हर शख्स दोहरे हत्याकांड में कोर्ट के फैसले को लेकर अधीर दिखा, लेकिन जिंदगी रौ में बहती रही। बस स्टैंड से लेकर गांव के भीतर तक चहल-पहल थी। घटनास्थल से गुजरते स्कूली बच्चों की भीड़ सब कुछ भूल जाने का आभास करा रही थी।
पानीपत-खटीमा राज्यमार्ग पर स्थित कवाल बस स्टैंड का माहौल देखकर अंदाज लगा पाना मुश्किल था कि यहीं पर कवाल कांड की सबसे बड़ी घटना हुई थी। फल, सब्जी, किराना, जूस की दुकानें आम दिनों की तरह खुली थी। बैंक की शाखा ग्राहकों से भरी थी। थोड़ा अंदर जाकर एक चाय की दुकान पर कुछ लोग बैठे नजर आए। इनकी बातों ने आज कवाल कांड में फैसले की तारीख होने का एहसास कराया। यह लोग सजा को लेकर चर्चा कर रहे थे, लेकिन खबरनवीशों को देखकर चुप हो गए।
थोड़ा ठहरकर नफीस अहमद कोर्ट के फैसले को लेकर सवाल करते हैं। अभी फैसला नहीं आने का पता लगने पर अबरार कहते हैं, कोर्ट ने दोषी ठहरा दिया, सजा होना तो पक्का है। बुजुर्ग फजलू कहते हैं कि अब क्या हो सकता है? एक घटना ने कई घरों को बर्बाद कर दिया, तभी पुलिस की एक जीप गांव के अंदर दाखिल होती है। थोड़ा आगे स्थित मस्जिद में लोग नमाज अदा करने के लिए जुट रहे हैं। पास में ही वह चौराहा है जहां सचिन और गौरव की हत्या हुई थी। नजदीक के खाली प्लाट में कुछ पुलिसकर्मी कुर्सियों पर बैठे हैं, कुछ चौराहे पर घूम रहे हैं।
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नमाज का समय होने के कारण आसपास की दुकानें बंद थी, लेकिन चौराहे से बुग्गियों, कारों, मोटरसाइकिलों और पैदल लोगों की खूब आवाजाही रही। करीब डेढ़ बजे स्कूलों की छुट्टी होती है और बच्चे शोर मचाते हुए इस चौराहे से गुजरते हैं। नमाज के बाद दुकानें भी खुल जाती हैं। कल्लू चायवाले की दुकान पर जमघट लग जाता है। लोग एक-दूसरे से फैसले पर बातचीत करते नजर आते हैं। नजदीक में सब्जी की दुकान पर भी खुली है।
पास ही में लगे चाट के ठेले पर कुछ बच्चे और युवा पानी-बताशों का स्वाद चखते दिखते हैं। चौराहे की रौनक देख यह अंदाज ही नहीं लग पाता कि साढ़े पांच साल पहले इसी स्थान पर वह वीभत्स कांड हुआ था, जिसकी गूंज पूरे देश से लेकर विदेश में सुनाई दी थी। पुलिस और मीडिया की मौजूदगी भी गांव वालों के लिए सामान्य बात हो गई है। दोनों का स्वागत वर्षों के परिचित की तरह किया जाता है।
रोजमर्रा के काम में लगा था सचिन का परिवार
मलिकपुरा। कवाल से निकलकर करीब ढाई किलोमीटर दूर मलिकपुरा मजरा पड़ता है। सचिन और गौरव यहां के ही रहने वाले थे। इनके परिवार के लोग 70 के दशक में मेरठ के गांव छुर्र से यहां आकर बसे थे। इसलिए मजरे की मूल आबादी से इनके घर अलग रजबहे के किनारे हैं। एसडीएम जानसठ विजय कुमार के नेतृत्व में पुलिस घर के बाहर तैनात मिला। परिवार के पुरुष सदस्य पास में ही स्थित कोल्हू में काम करते मिले। सचिन के पिता बिशन भैंसा-बुग्गी से चारा लेकर आए। फैसले के बारे में पूछने पर कहते हैं कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता। दोषियों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी।
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पानीपत-खटीमा राज्यमार्ग पर स्थित कवाल बस स्टैंड का माहौल देखकर अंदाज लगा पाना मुश्किल था कि यहीं पर कवाल कांड की सबसे बड़ी घटना हुई थी। फल, सब्जी, किराना, जूस की दुकानें आम दिनों की तरह खुली थी। बैंक की शाखा ग्राहकों से भरी थी। थोड़ा अंदर जाकर एक चाय की दुकान पर कुछ लोग बैठे नजर आए। इनकी बातों ने आज कवाल कांड में फैसले की तारीख होने का एहसास कराया। यह लोग सजा को लेकर चर्चा कर रहे थे, लेकिन खबरनवीशों को देखकर चुप हो गए।
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थोड़ा ठहरकर नफीस अहमद कोर्ट के फैसले को लेकर सवाल करते हैं। अभी फैसला नहीं आने का पता लगने पर अबरार कहते हैं, कोर्ट ने दोषी ठहरा दिया, सजा होना तो पक्का है। बुजुर्ग फजलू कहते हैं कि अब क्या हो सकता है? एक घटना ने कई घरों को बर्बाद कर दिया, तभी पुलिस की एक जीप गांव के अंदर दाखिल होती है। थोड़ा आगे स्थित मस्जिद में लोग नमाज अदा करने के लिए जुट रहे हैं। पास में ही वह चौराहा है जहां सचिन और गौरव की हत्या हुई थी। नजदीक के खाली प्लाट में कुछ पुलिसकर्मी कुर्सियों पर बैठे हैं, कुछ चौराहे पर घूम रहे हैं।
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नमाज का समय होने के कारण आसपास की दुकानें बंद थी, लेकिन चौराहे से बुग्गियों, कारों, मोटरसाइकिलों और पैदल लोगों की खूब आवाजाही रही। करीब डेढ़ बजे स्कूलों की छुट्टी होती है और बच्चे शोर मचाते हुए इस चौराहे से गुजरते हैं। नमाज के बाद दुकानें भी खुल जाती हैं। कल्लू चायवाले की दुकान पर जमघट लग जाता है। लोग एक-दूसरे से फैसले पर बातचीत करते नजर आते हैं। नजदीक में सब्जी की दुकान पर भी खुली है।
पास ही में लगे चाट के ठेले पर कुछ बच्चे और युवा पानी-बताशों का स्वाद चखते दिखते हैं। चौराहे की रौनक देख यह अंदाज ही नहीं लग पाता कि साढ़े पांच साल पहले इसी स्थान पर वह वीभत्स कांड हुआ था, जिसकी गूंज पूरे देश से लेकर विदेश में सुनाई दी थी। पुलिस और मीडिया की मौजूदगी भी गांव वालों के लिए सामान्य बात हो गई है। दोनों का स्वागत वर्षों के परिचित की तरह किया जाता है।
रोजमर्रा के काम में लगा था सचिन का परिवार
मलिकपुरा। कवाल से निकलकर करीब ढाई किलोमीटर दूर मलिकपुरा मजरा पड़ता है। सचिन और गौरव यहां के ही रहने वाले थे। इनके परिवार के लोग 70 के दशक में मेरठ के गांव छुर्र से यहां आकर बसे थे। इसलिए मजरे की मूल आबादी से इनके घर अलग रजबहे के किनारे हैं। एसडीएम जानसठ विजय कुमार के नेतृत्व में पुलिस घर के बाहर तैनात मिला। परिवार के पुरुष सदस्य पास में ही स्थित कोल्हू में काम करते मिले। सचिन के पिता बिशन भैंसा-बुग्गी से चारा लेकर आए। फैसले के बारे में पूछने पर कहते हैं कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता। दोषियों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी।