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जांच रिपोर्ट के चार साल बाद हुई बर्खास्तगी

Wed, 30 Dec 2020 12:38 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 30 Dec 2020 12:38 AM IST
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It took only four years to investigate against the clerk
लिपिक के खिलाफ जांच करने में ही लगे चार साल
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मुजफ्फरनगर। लचर व्यवस्था के चलते आठ करोड़ हजम करने वाला समाज कल्याण विभाग का लिपिक सात साल तक विभाग में नौकरी करता रहा। चार साल उसकी जांच में लगे और जांच रिपोर्ट दाखिल होने के बाद चार साल उस पर बर्खास्तगी की कार्रवाई में लगे। यही नहीं नौकरी भी अपने गृह जनपद में की।
समाज कल्याण विभाग में अपना पहचान पत्र लगाकर बैंक जिला समाज कल्याण अधिकारी के नाम से खाता खोलकर आठ करोड़ स्वयं हजम करने वाले लिपिक अनिल वर्मा का पर्दाफाश 19 जून 2012 में हुआ था। सिविल लाइन थाने में मुकदमा दर्ज होने के तीन माह बाद वह जेल चला गया था। लगभग एक साल जेल में रहने के बाद वह बाहर आया और निदेशालय में सेटिंग के चलते बहाल हो गया। निदेशक समाज कल्याण ने उसकी जांच 19 सितंबर 2012 को संयुक्त निदेशक समाज कल्याण मेरठ को सौंप दी। जांच अधिकारी ने आठ अप्रैल 2016 को अपनी जांच अपर निदेशक समाज कल्याण मेरठ को दी, इन्होंने अपनी संस्तुति करते हुए जांच रिपोर्ट पांच माह बाद निदेशक को भेजी। निदेशालय में जांच रिपोर्ट चार साल तक पड़ी रही। इस जांच रिपोर्ट में अनिल वर्मा को घोटाले का दोषी माना गया था। अनिल वर्मा इस बीच अपने गृह जनपद बिजनौर में नौकरी करते रहे। 24 दिसंबर 2020 को इस जांच रिपोर्ट के आधार पर अनिल वर्मा बर्खास्त हुए।
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रिंकू पर हमले का आरोपी यहीं पर लिपिक
मुजफ्फरनगर। रिंकू सिंह राही पर दो हमले हुए थे, इसमें पहली बार जो हमला हुआ उसका मुख्य आरोपी लिपिक इमरान था। इमरान घोटाला खुलने पर सस्पेंड हो गया था। वर्ष 2012 में जब यह बहाल हुआ तो इसे आगरा पोस्टिंग दी गई। समाज कल्याण में सेटिंग का आलम यह था कि यह आगरा नहीं गया और ट्रांसफर शामली करा लिया। शामली में नौकरी करते हुए इसने समाज कल्याण अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार किया, जिसकी शिकायत डीएम से हुई। डीएम शामली ने निदेशक को पत्र लिखा तो उपनिदेशक मुरादाबाद को जांच सौंपी गई। इनकी अभी जांच चल रही और इस बीच ये एक साल से मुजफ्फरनगर में ही नौकरी कर रहे हैं। अब जांच एसआईटी ने शुरू की है तो सभी घोटालेबाजों में हड़कंप मचा है। गहनता से जांच हुई तो कोई आरोपी बच नहीं पाएगा।
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