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भूख, बेचारगी और घर पहुंचने की छटपटाहट
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राजेश, लखनऊ।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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भूख, बेचारगी और घर पहुंचने की छटपटाहट
मुजफ्फरनगर। 20-25 दिन की मशक्कत के बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेन तो मिल गई, लेकिन सफर बेहद पीड़ादायक रहा। तीन दिन की यात्रा कर मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पहुंचे श्रमिकों के चेहरे से उत्साह नदारद था। भूख और बेचारगी के साथ ही हर कोई घर पहुंचने के लिए छटपटा रहा था। उन्हें अभी सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना है। घर कब पहुंचेंगे पता नहीं है। अब तक एक-दो जगह खाना मिल भी गया, आगे क्या होगा इसका अंदाजा भी नहीं। ट्रेन से उतरकर बसों में बैठते श्रमिकों की यह व्यथा बात करते ही फूट पड़ी।
महाराजगंज के बैजनाथ, जितेंद्र आदि अपने साथियों के साथ बस में बैठ तो गए, लेकिन सभी बेहद हड़बड़ाए हुए थे। उन्हें अंदाजा ही नहीं कि अभी कितनी दूर जाना है। साथी रामबृज साहनी बस चालक से पूछते हैं तो करीब 800 किलोमीटर सुनकर उनकी चिंता और बढ़ जाती है। राजू साहनी बताते हैं कि ट्रेन दौंड से बृहस्पतिवार को सवेरे आठ बजे चली थी, तभी उन्हें खाना मिला। करीब 51 घंटे के सफर में एक-दो जगह खाना और पानी मिल गया। उसी से काम चलाया। बच्चों के लिए तो कुछ लोगों ने बिस्कुट आदि सामान दे दिया था। अब यहां तक पहुंच गए हैं, आगे पता नहीं क्या होगा। लखनऊ के राजेश कुमार अपनी पत्नी बीना और चार तीन साल की बेटी के साथ बौखलाहट में इधर-उधर भटकते घूम रहे थे। उन्होंने बताया कि स्टेशन से उन्हें 18 नंबर बस में बैठने के लिए कहा गया, लेकिन चालक की सूची में उनका नाम ही नहीं। खाने में बारे में पूछते ही कहते हैं कि अब तक तो जैसे-तैसे काम चल गया, लेकिन आगे का पता नहीं। लखनऊ की करीब 500 किलोमीटर की दूरी सुनकर उनके होश उड़ जाते हैं। वह बताते हैं कि करीब 1500 किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं। अपने जिले में पहुंचेंगे तो वहां भी क्वारंटीन होना होगा। न पास में पैसे बचे हैं और न ही रोजगार का कोई ठिकाना रहा। एक बार किसी तरह घर पहुंच जाएं, फिर जिले से बाहर जाने की सोचेंगे भी नहीं।
अपने ही देश में शरणार्थी बन गए
मुजफ्फरनगर। ट्रेन से आए उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के युवक व्यवस्थाओं में कमियों को लेकर आक्रोशित हो उठे । उन्होंने आरोप लगाया कि रास्ते में उन्हें खाना नहीं मिला। मुजफ्फरनगर में भी तक उनका नंबर आया पैकेट खत्म हो गए। हालांकि तीन बजे भोजन मिल गया, लेकिन उन्हें शाम तक भी बस नहीं मिल पाई। मनदीप सिंह, तीरथ सिंह, बहादुर सिंह एवं विक्रम सिंह पुलिस के रवैये से बेहद खफा दिखे। उन्होंने बताया कि पुलिस सहानुभूति दर्शाने के बजाए उन्हें दुत्कारती रही। अपने ही देश में हम शरणार्थी बने धक्के खा रहे हैं।
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मुजफ्फरनगर। 20-25 दिन की मशक्कत के बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेन तो मिल गई, लेकिन सफर बेहद पीड़ादायक रहा। तीन दिन की यात्रा कर मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पहुंचे श्रमिकों के चेहरे से उत्साह नदारद था। भूख और बेचारगी के साथ ही हर कोई घर पहुंचने के लिए छटपटा रहा था। उन्हें अभी सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना है। घर कब पहुंचेंगे पता नहीं है। अब तक एक-दो जगह खाना मिल भी गया, आगे क्या होगा इसका अंदाजा भी नहीं। ट्रेन से उतरकर बसों में बैठते श्रमिकों की यह व्यथा बात करते ही फूट पड़ी।
महाराजगंज के बैजनाथ, जितेंद्र आदि अपने साथियों के साथ बस में बैठ तो गए, लेकिन सभी बेहद हड़बड़ाए हुए थे। उन्हें अंदाजा ही नहीं कि अभी कितनी दूर जाना है। साथी रामबृज साहनी बस चालक से पूछते हैं तो करीब 800 किलोमीटर सुनकर उनकी चिंता और बढ़ जाती है। राजू साहनी बताते हैं कि ट्रेन दौंड से बृहस्पतिवार को सवेरे आठ बजे चली थी, तभी उन्हें खाना मिला। करीब 51 घंटे के सफर में एक-दो जगह खाना और पानी मिल गया। उसी से काम चलाया। बच्चों के लिए तो कुछ लोगों ने बिस्कुट आदि सामान दे दिया था। अब यहां तक पहुंच गए हैं, आगे पता नहीं क्या होगा। लखनऊ के राजेश कुमार अपनी पत्नी बीना और चार तीन साल की बेटी के साथ बौखलाहट में इधर-उधर भटकते घूम रहे थे। उन्होंने बताया कि स्टेशन से उन्हें 18 नंबर बस में बैठने के लिए कहा गया, लेकिन चालक की सूची में उनका नाम ही नहीं। खाने में बारे में पूछते ही कहते हैं कि अब तक तो जैसे-तैसे काम चल गया, लेकिन आगे का पता नहीं। लखनऊ की करीब 500 किलोमीटर की दूरी सुनकर उनके होश उड़ जाते हैं। वह बताते हैं कि करीब 1500 किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं। अपने जिले में पहुंचेंगे तो वहां भी क्वारंटीन होना होगा। न पास में पैसे बचे हैं और न ही रोजगार का कोई ठिकाना रहा। एक बार किसी तरह घर पहुंच जाएं, फिर जिले से बाहर जाने की सोचेंगे भी नहीं।
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अपने ही देश में शरणार्थी बन गए
मुजफ्फरनगर। ट्रेन से आए उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के युवक व्यवस्थाओं में कमियों को लेकर आक्रोशित हो उठे । उन्होंने आरोप लगाया कि रास्ते में उन्हें खाना नहीं मिला। मुजफ्फरनगर में भी तक उनका नंबर आया पैकेट खत्म हो गए। हालांकि तीन बजे भोजन मिल गया, लेकिन उन्हें शाम तक भी बस नहीं मिल पाई। मनदीप सिंह, तीरथ सिंह, बहादुर सिंह एवं विक्रम सिंह पुलिस के रवैये से बेहद खफा दिखे। उन्होंने बताया कि पुलिस सहानुभूति दर्शाने के बजाए उन्हें दुत्कारती रही। अपने ही देश में हम शरणार्थी बने धक्के खा रहे हैं।

बीना, लखनऊ।- फोटो : MUZAFFARNAGAR

रामबृज साहनी, महाराजगंज।- फोटो : MUZAFFARNAGAR

श्रमिक स्पेशल...बस नहीं मिलने से स्टेशन के बाहर खड़े रुद्रप्रयाग के युवक।- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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