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Muzaffarnagar News: दुर्घटना में आधे शरीर ने साथ छोड़ा, पर नहीं छोड़ा पढ़ाने का हौसला
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शिक्षिका ममता सैनी
मुजफ्फरनगर। साकेत कॉलोनी की रहने वाली ममता सैनी का 1999 में विशिष्ट बीटीसी के पहले बैच में सलेक्शन हुआ था। शादी के बाद घर परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए पढ़ाई को पूरा कर शिक्षक के ओहदे को हासिल किया।
वर्ष 2010 गांव रथेड़ी के प्राथमिक विद्यालय से लौटेते समय दुर्घटना की वजह से शरीर के 75 प्रतिशत नर्वस सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया। दो साल के इलाज के बाद चिकित्सकों ने साफ कर दिया कि व्हीलचेयर और फिजियोथेरेपी जीवन भर का सहारा है क्योंकि स्पाइनल कॉड इंजरी से शरीर के निचले हिस्से की नसें डैमेज हो गई हैं। इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और विद्यालय आने का रास्ता चुना।
इस हादसे के 15 साल बीत जाने के बाद आज भी फिजियोथेरपी और दवाओं के सहारे जीवन चल रहा है। एक्सीडेंट के दो साल बाद उन्होंने प्रार्थना पत्र के जरिए नगरक्षेत्र के कंपोजिट विद्यालय नसीरपुर में स्थानांतरण लिया और नियमित रूप से अपनी सेवाएं शुरू की। वह बताती हैं कि यह दौर काफी कठिन था और आज भी है क्योंकि व्हीलचेयर पर खुद को स्वीकार करना आसान नहीं है, लेकिन बच्चों या अन्य स्टॉफ के बीच खुद को सहज करने के लिए चेहरे पर मुस्कान लाकर आगे बढ़ती हूं। बच्चों को पढ़ाने के दौरान अब ऐसा अलग महसूस नहीं होता है क्योंकि उनको शिक्षा देने में समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता।
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वह बताती हैं कि 15 साल में पति अशोक सैनी ने मुझे संभाला और मेरे विद्यालय जाने के फैसले में भी साथ दिया। अभी चार महीने पहले वह भी छोड़कर चले गए हैं। बेटी एमबीबीएस और बेटा बीटेक की पढ़ाई कर रहा है। र
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वर्ष 2010 गांव रथेड़ी के प्राथमिक विद्यालय से लौटेते समय दुर्घटना की वजह से शरीर के 75 प्रतिशत नर्वस सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया। दो साल के इलाज के बाद चिकित्सकों ने साफ कर दिया कि व्हीलचेयर और फिजियोथेरेपी जीवन भर का सहारा है क्योंकि स्पाइनल कॉड इंजरी से शरीर के निचले हिस्से की नसें डैमेज हो गई हैं। इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और विद्यालय आने का रास्ता चुना।
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इस हादसे के 15 साल बीत जाने के बाद आज भी फिजियोथेरपी और दवाओं के सहारे जीवन चल रहा है। एक्सीडेंट के दो साल बाद उन्होंने प्रार्थना पत्र के जरिए नगरक्षेत्र के कंपोजिट विद्यालय नसीरपुर में स्थानांतरण लिया और नियमित रूप से अपनी सेवाएं शुरू की। वह बताती हैं कि यह दौर काफी कठिन था और आज भी है क्योंकि व्हीलचेयर पर खुद को स्वीकार करना आसान नहीं है, लेकिन बच्चों या अन्य स्टॉफ के बीच खुद को सहज करने के लिए चेहरे पर मुस्कान लाकर आगे बढ़ती हूं। बच्चों को पढ़ाने के दौरान अब ऐसा अलग महसूस नहीं होता है क्योंकि उनको शिक्षा देने में समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता।
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वह बताती हैं कि 15 साल में पति अशोक सैनी ने मुझे संभाला और मेरे विद्यालय जाने के फैसले में भी साथ दिया। अभी चार महीने पहले वह भी छोड़कर चले गए हैं। बेटी एमबीबीएस और बेटा बीटेक की पढ़ाई कर रहा है। र