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वैद्य ईशानंद ने लालबहादुर शास्त्री के साथ जलाई थी आजादी की अलख

Sun, 08 Aug 2021 11:48 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 08 Aug 2021 11:48 PM IST
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Freedom Fighter Vaidya Ishanand
स्वतंत्रता सेनानी ईशानंद वैद्य की बिरालसी में स्थित समाधि पर मृर्ति। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
वैद्य ईशानंद ने लालबहादुर शास्त्री के साथ जलाई थी आजादी की अलख
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चरथावल (मुजफ्फरनगर)। फिरंगी हुकूमत में बिरालसी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वैद्य ईशानंद का पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा। उनके अतीत के संस्मरण युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करती है। नौ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन का नारा देने पर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। चार वर्ष तक कारावास में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया, लेकिन जेल में भी आजादी की मशाल बुझने नहीं दी। बिरालसी गुरुकुल में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सानिध्य में आर्य समाज से जुड़कर वे आंदोलनों से जुड़े रहे।
चरथावल-थानाभवन मुख्य मार्ग पर बसे बिरालसी गांव में किसान पूर्व प्रधान ठाकुर मूलराज सिंह के यहां जन्मे तीन पुत्रों में दूसरे नंबर के बेटे ईशानंद को वाराणसी में गुरुकुल में पढ़ाई के लिए भेजा गया। आर्य समाज से जुड़कर उन्होंने समाज सुधार की भूमिका निभाई। शास्त्री और आचार्य की उपाधि के बाद पीलीभीत से वैद्य की डिग्री हासिल की। बचपन से उनकी रगों में देशभक्ति की भावना रची बसी थी। पिता ने उनका विवाह कर दिया। प्रसव के दौरान उनकी पत्नी और नवजात का निधन हो गया। उनका जीवन पूरा संघर्षमय रहा। इसके बाद में उनकी नियुक्ति पंजाब के रायकोट गुरुकुल में प्राचार्य पद पर हुई। गुरुकुल बिरालसी में पांच रुपये की पगार पर लालबहादुर शास्त्री को लेकर आए।
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जेल में 21 दिन गांधी के साथ रहे उपवास
वर्ष 1938 में फिरंगी हुकूमत में सत्यार्थ प्रकाश पर पाबंदी आर्य युवकों को सहन नहीं हुई। 1938-39 में एक जत्था निजाम हैदराबाद गया। आर्य समाज सत्याग्रह में गिरफ्तार कर उन्हें वहां 10 महीने की कारावास की सजा मिली। 1940 में सत्याग्रह आंदोलन में वह आगरा कारागार में महात्मा गांधी के साथ 21 दिन के उपवास पर रहे। उनके परपौत्र अरविंद सिंह बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन में उनके पड़बाबा ने चार साल से ज्यादा जेल में काटी। वहां बीमार होने के बावजूद आजादी की बागडोर संभाले रखी। वर्ष 1946 में जेल से आने के बाद उनका निधन हो गया। उनके पूर्वजों ने खेत में उनकी याद में भव्य समाधि बनाकर प्रतिमा लगाई है।
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बहन की जुबां पर रहा वंदेमातरम् का उद्घोष
चरथावल। अमर सेनानी वैद्यराज ईशानंद की बहन ब्रह्मा देवी में देश को आजाद कराने का जज्बा कूट-कूटकर भरा था। आरएसएस कार्यकर्ता उदय पुंडीर बताते हैं कि उनकी जुबां पर हमेशा वंदेमातरम् का उद्घोष रहता था। असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने पर 21 मार्च 1941 को उन्हें तीन महीने की सजा दी गई। जीवन का हरपल उनका मकसद सिर्फ देश से गोरों को खदेड़ने का रहता था।
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