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दूधली की ऐतिहासिक म्हाड़ी पर नहीं लगेगा मेला
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दूधली के ऐतिहासिक म्हाड़ी, जहां बार नहीं लगेगा मेला
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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दूधली की ऐतिहासिक म्हाड़ी पर नहीं लगेगा मेला
चरथावल। दूधली की ऐतिहासिक म्हाड़ी पर आज (बुधवार) से लगने वाला तीन दिवसीय मेला नहीं लगेगा। इतिहास में दूसरी बार मेले पर कोरोना का साया रहेगा। प्रदेश के आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को इस बार भी गोगा म्हाड़ी पर दर्शन नहीं करने का मलाल रहेगा।
कोविड़ महामारी की बंदिश में धार्मिक परंपराएं और त्योहार-उत्सवों का उल्लास प्रभावित हुआ है। गांव के बुजुर्ग पूर्व प्रधान डॉ. महेंद्र सिंह एवं सेवानिवृत्त कोर्ट नाजिर सुबोध कुमार शर्मा का कहना है दूधली में स्थापित जाहरवीर गोगा म्हाड़ी की प्रसिद्धि उत्तर भारत में राजस्थान के बागड़ के बाद मानी जाती हैं। मान्यता है करीब पांच सौ साल पहले इस गांव के मजरे मरूवा आलमगीरपुर निवासी किसान भक्त की मन्नत पूरी हुई, तो वह आस्था में वशीभूत होकर अपने यहां जन्मे बछेरे को पैदल बागड़ (राजस्थान) में जाहरवीर को अर्पित करने पहुंच गया। जाहरवीर को खुद प्रकट होने पर ही उसने बछेरा भेंट करने का संकल्प लिया था। बताया जाता है भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर जाहरवीर ने बागड़ में खुद प्रकट होकर बछेरा लिया और भक्त किसान को गांव में म्हाड़ी बनाने को पांच ईट प्रदान की थी। बुजुर्ग रामपाल सिंह बताते हैं कि उस वक्त गोगा ने किसान को वचन दिया था कि यदि ईट कहीं भी रख दोंगे, तो वहां से उठेगी नहीं। रास्ते में किसान गोगा के वादे को भूल गया और थकावट के कारण दूधली में हुक्का गुड़गुड़ाने की खातिर ईट की चादर वहीं रख दी। उसके बाद वहां से ईंट नहीं उठी और वहीं म्हाड़ी बनानी पड़ी थी। इस बार मेले कि तिथि आठ सितंबर नियत थी। इस बार भी उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान आदि के लाखों श्रद्धालुओं को मेले और म्हाड़ी पर नतमस्तक नहीं होने के कारण मायूसी मिलेगी।
गांव के लोग चढ़ाएंगे प्रसाद
ग्राम प्रधान शोभित पुंडीर का कहना है इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. वीरपाल निर्वाल द्वारा म्हाड़ी के कपाट खोलकर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा को जीवित रखा जाएगा। गांव के विभिन्न मोहल्लों से चरणबद्ध तरीके से लोग सिर्फ प्रसाद चढ़ाने की रस्म निभाएंगे।
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घर पर रहकर करें जाहरवीर की पूजा
दयानंद इंटर कॉलेज के शिक्षक सोहनवीर सिंह के मुताबिक म्हाड़ी की मान्यता पूरे भारत में है। गांव में हर परिवार में मेले से कई दिन पहले उत्सव सा नजारा रहता था। कोविड से बचाव के कारण मेले नहीं लगना अच्छा कदम है। ग्रामीण श्रद्धालु घर में रहकर जाहरवीर की आराधना करें।
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चरथावल। दूधली की ऐतिहासिक म्हाड़ी पर आज (बुधवार) से लगने वाला तीन दिवसीय मेला नहीं लगेगा। इतिहास में दूसरी बार मेले पर कोरोना का साया रहेगा। प्रदेश के आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को इस बार भी गोगा म्हाड़ी पर दर्शन नहीं करने का मलाल रहेगा।
कोविड़ महामारी की बंदिश में धार्मिक परंपराएं और त्योहार-उत्सवों का उल्लास प्रभावित हुआ है। गांव के बुजुर्ग पूर्व प्रधान डॉ. महेंद्र सिंह एवं सेवानिवृत्त कोर्ट नाजिर सुबोध कुमार शर्मा का कहना है दूधली में स्थापित जाहरवीर गोगा म्हाड़ी की प्रसिद्धि उत्तर भारत में राजस्थान के बागड़ के बाद मानी जाती हैं। मान्यता है करीब पांच सौ साल पहले इस गांव के मजरे मरूवा आलमगीरपुर निवासी किसान भक्त की मन्नत पूरी हुई, तो वह आस्था में वशीभूत होकर अपने यहां जन्मे बछेरे को पैदल बागड़ (राजस्थान) में जाहरवीर को अर्पित करने पहुंच गया। जाहरवीर को खुद प्रकट होने पर ही उसने बछेरा भेंट करने का संकल्प लिया था। बताया जाता है भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर जाहरवीर ने बागड़ में खुद प्रकट होकर बछेरा लिया और भक्त किसान को गांव में म्हाड़ी बनाने को पांच ईट प्रदान की थी। बुजुर्ग रामपाल सिंह बताते हैं कि उस वक्त गोगा ने किसान को वचन दिया था कि यदि ईट कहीं भी रख दोंगे, तो वहां से उठेगी नहीं। रास्ते में किसान गोगा के वादे को भूल गया और थकावट के कारण दूधली में हुक्का गुड़गुड़ाने की खातिर ईट की चादर वहीं रख दी। उसके बाद वहां से ईंट नहीं उठी और वहीं म्हाड़ी बनानी पड़ी थी। इस बार मेले कि तिथि आठ सितंबर नियत थी। इस बार भी उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान आदि के लाखों श्रद्धालुओं को मेले और म्हाड़ी पर नतमस्तक नहीं होने के कारण मायूसी मिलेगी।
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गांव के लोग चढ़ाएंगे प्रसाद
ग्राम प्रधान शोभित पुंडीर का कहना है इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. वीरपाल निर्वाल द्वारा म्हाड़ी के कपाट खोलकर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा को जीवित रखा जाएगा। गांव के विभिन्न मोहल्लों से चरणबद्ध तरीके से लोग सिर्फ प्रसाद चढ़ाने की रस्म निभाएंगे।
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घर पर रहकर करें जाहरवीर की पूजा
दयानंद इंटर कॉलेज के शिक्षक सोहनवीर सिंह के मुताबिक म्हाड़ी की मान्यता पूरे भारत में है। गांव में हर परिवार में मेले से कई दिन पहले उत्सव सा नजारा रहता था। कोविड से बचाव के कारण मेले नहीं लगना अच्छा कदम है। ग्रामीण श्रद्धालु घर में रहकर जाहरवीर की आराधना करें।