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यहां तो खुद वेंटिलेटर पर है जिला अस्पताल, सिर्फ दिखावे को लगी हैं ऑक्सीजन की पाइप लाइन
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sun, 13 Aug 2017 01:05 AM IST
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जिला अस्पताल में उपचार कराते मरीज।
- फोटो : अमर उजाला
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गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण करीब 40 बच्चों की जान चली गई। अस्पताल ही बच्चों की कब्रगाह बन गया। इस हादसे के बाद भी जिला स्वास्थ्य विभाग नहीं चेता है। अस्पताल में केवल मामूली बीमारियों के उपचार करने की क्षमता है।
गंभीर हालत में अपने नौनिहाल या किसी अन्य मरीजों को गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती करा रहे हैं तो जरा संभल जाएं। यहां आक्सीजन सप्लाई तो दूर, व्यवस्थाएं खुद वेंटिलेटर पर सांसें गिन रही हैं। दिखावे के लिए बिछी आक्सीजन की पाइप लाइन केवल मरीज को तसल्ली देने के लिए हैं। ऐसे में खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि जिला अस्पताल मरीजों की जान बचाने में कितना सक्षम है।
स्वाइन फ्लू के तीन केस और गोरखपुर हादसे के बाद भी स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए नींद नहीं टूटी है। देश-प्रदेश की सरकारें बड़े पैमाने पर बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं। अस्पतालों की व्यवस्थाएं मुकम्मल न होने से इलाज अधूरा है।
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अस्पताल के पुरुष-महिला वार्ड से लेकर बच्चा वार्ड का हाल बेहाल है। एक बेड पर दो-दो बच्चों का उपचार किया जा रहा है, लेकिन गंभीर अवस्था में ऑक्सीजन की व्यवस्था शून्य है। दिखावे के लिए लगी पाइप लाइन खुद ऑक्सीजन के लिए तरस रही है। हालात यह हैं कि मरीज की हालत गंभीर होते ही उसे तत्काल मेरठ, गाजियाबाद, दिल्ली के लिए रेफर करने में चिकित्सक नहीं हिचक रहे हैं।
इन बीमारियों में ऑक्सीजन की जरूरत
मुजफ्फरनगर। इन दिनों मच्छरों के प्रकोप के कारण बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक पीड़ित हैं। अस्पताल की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ गरिमा अग्रवाल ने बताया कि अनेक बीमारियों में बच्चों को आक्सीजन की जरूरत पड़ती है। इनमें दिमागी बुखार, वायरल मैनेजाइटिस, डेंगू की अंतिम स्टेज, जन्म के दौरान बच्चे के नहीं रोने पर, अस्थमा आदि के शिकार बच्चों की हालत बिगडऩे और शरीर के अंग काम न करने, लंग्स फेल होने पर बच्चों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ जाती है। अस्पताल में ऑक्सीजन की व्यवस्था सिलेंडर से होती है।
नौ सीएचसी-पीएचसी, 200 से ज्यादा उपकेंद्र
मुजफ्फरनगर। जनपद में लोगों को स्वास्थ सेवाएं मुहैया कराने के लिए जिला अस्पताल के अलावा नौ सीएचसी और पीएचसी हैं, जबकि 200 से ज्यादा उपकेंद्र बनाए गए हैं। इनके माध्यम से गांवों में प्राथमिक उपचार किया जाता है। खतौली, जानसठ, शाहपुर और चरथावल में सीएचसी बनी है, जबकि मोरना, पुरकाजी, मेघाखेड़ी, गालिबपुर, बुढ़ाना, बघरा आदि में पीएचसी स्थापित हैं। इनके अलावा भी जिले के करीब 498 में गांवों में प्राथमिक सेवा के लिए 200 से ज्यादा उपकेंद्र बनाए गए हैं। वहीं, अस्पताल की सभी ओपीडी में रोजाना 500 मरीज पहुंच रहे हैं।
अस्पताल में भर्ती मरीज:
अस्पताल में व्यवस्थाएं दुरुस्त कराई जा रही हैं। वायरल समेत बुखार के मरीजों की अलग से जांच हो रही है। ऑक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था के बारे में सीएमएस बता सकेंगे। बीमारियों से निपटने में विभाग पूरी तरह सक्रिय और मजबूत है -डॉ पीएस मिश्रा, सीएमओ, मुजफ्फरनगर।
अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई पाइप लाइन से नहीं होती है। जरूरत वाले मरीजों को सिलेंडर लगाकर ऑक्सीजन दी जाती है। अन्य व्यवस्थाओं को भी दुरुस्त किया जा रहा है। -डॉ पंकज अग्रवाल, सीएमएम, जिला अस्पताल।
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गंभीर हालत में अपने नौनिहाल या किसी अन्य मरीजों को गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती करा रहे हैं तो जरा संभल जाएं। यहां आक्सीजन सप्लाई तो दूर, व्यवस्थाएं खुद वेंटिलेटर पर सांसें गिन रही हैं। दिखावे के लिए बिछी आक्सीजन की पाइप लाइन केवल मरीज को तसल्ली देने के लिए हैं। ऐसे में खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि जिला अस्पताल मरीजों की जान बचाने में कितना सक्षम है।
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स्वाइन फ्लू के तीन केस और गोरखपुर हादसे के बाद भी स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए नींद नहीं टूटी है। देश-प्रदेश की सरकारें बड़े पैमाने पर बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं। अस्पतालों की व्यवस्थाएं मुकम्मल न होने से इलाज अधूरा है।
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अस्पताल के पुरुष-महिला वार्ड से लेकर बच्चा वार्ड का हाल बेहाल है। एक बेड पर दो-दो बच्चों का उपचार किया जा रहा है, लेकिन गंभीर अवस्था में ऑक्सीजन की व्यवस्था शून्य है। दिखावे के लिए लगी पाइप लाइन खुद ऑक्सीजन के लिए तरस रही है। हालात यह हैं कि मरीज की हालत गंभीर होते ही उसे तत्काल मेरठ, गाजियाबाद, दिल्ली के लिए रेफर करने में चिकित्सक नहीं हिचक रहे हैं।
इन बीमारियों में ऑक्सीजन की जरूरत
मुजफ्फरनगर। इन दिनों मच्छरों के प्रकोप के कारण बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक पीड़ित हैं। अस्पताल की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ गरिमा अग्रवाल ने बताया कि अनेक बीमारियों में बच्चों को आक्सीजन की जरूरत पड़ती है। इनमें दिमागी बुखार, वायरल मैनेजाइटिस, डेंगू की अंतिम स्टेज, जन्म के दौरान बच्चे के नहीं रोने पर, अस्थमा आदि के शिकार बच्चों की हालत बिगडऩे और शरीर के अंग काम न करने, लंग्स फेल होने पर बच्चों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ जाती है। अस्पताल में ऑक्सीजन की व्यवस्था सिलेंडर से होती है।
नौ सीएचसी-पीएचसी, 200 से ज्यादा उपकेंद्र
मुजफ्फरनगर। जनपद में लोगों को स्वास्थ सेवाएं मुहैया कराने के लिए जिला अस्पताल के अलावा नौ सीएचसी और पीएचसी हैं, जबकि 200 से ज्यादा उपकेंद्र बनाए गए हैं। इनके माध्यम से गांवों में प्राथमिक उपचार किया जाता है। खतौली, जानसठ, शाहपुर और चरथावल में सीएचसी बनी है, जबकि मोरना, पुरकाजी, मेघाखेड़ी, गालिबपुर, बुढ़ाना, बघरा आदि में पीएचसी स्थापित हैं। इनके अलावा भी जिले के करीब 498 में गांवों में प्राथमिक सेवा के लिए 200 से ज्यादा उपकेंद्र बनाए गए हैं। वहीं, अस्पताल की सभी ओपीडी में रोजाना 500 मरीज पहुंच रहे हैं।
अस्पताल में भर्ती मरीज:
अस्पताल में व्यवस्थाएं दुरुस्त कराई जा रही हैं। वायरल समेत बुखार के मरीजों की अलग से जांच हो रही है। ऑक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था के बारे में सीएमएस बता सकेंगे। बीमारियों से निपटने में विभाग पूरी तरह सक्रिय और मजबूत है -डॉ पीएस मिश्रा, सीएमओ, मुजफ्फरनगर।
अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई पाइप लाइन से नहीं होती है। जरूरत वाले मरीजों को सिलेंडर लगाकर ऑक्सीजन दी जाती है। अन्य व्यवस्थाओं को भी दुरुस्त किया जा रहा है। -डॉ पंकज अग्रवाल, सीएमएम, जिला अस्पताल।