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मुजफ्फरनगर: कुपोषण के खिलाफ जंग पर भारी पड़ रही परिवार की जिम्मेदारी

Tue, 12 Jan 2021 04:56 PM IST
कुमार संभव अरुण चट्ठा, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
अरुण चट्ठा, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: कुमार संभव Updated Tue, 12 Jan 2021 04:56 PM IST
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सार
  • घर चलाने की जिम्मेदारी के बीच परिवार नहीं दे पा रहे बच्चों और महिलाओं पर ध्यान
  • 30 लाख की आबादी वाले समृद्ध इलाके मुजफ्फरनगर में भी हैं कुपोषित बच्चे
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battle against malnutrition become tough in front of Family responsibilites in Muzaffarnagar uttar pradesh
कुपोषण से मुजफ्फरनगर बेहाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

  • केस- 1: मुजफ्फरनगर शहर से सटे कमल नगर इलाके में चार वर्षीय युवराज के पिता एक टेलीकॉम कंपनी में काम करते हैं। शहर में पक्का मकान और घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं है, लेकिन बच्चा कुपोषण के चपेट में है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता चंद्रावती ने बताया कि पुष्टाहार दिया जा रहा है लेकिन परिवार उसे इलाज के लिए भर्ती कराने को तैयार नहीं है। युवराज की मां का कहना है कि अगर बच्चे को एनआरसी में भर्ती करा देंगे तो खाना कौन बनाएगा। पति सुबह काम पर निकल जाते हैं, उसके बाद घर का काम काज संभालना होता है। इसलिए भर्ती नहीं करा सके।
  • केस-2: कूकड़ा गांव के मोहम्मद जरीफ का चार वर्षीय बेटा उजैफ कुपोषण की चपेट में हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मीनाक्षी के साथ जब हम पहुंचे तो गोद में बच्चे को लिए मां सलमा बोलती हैं, अब तक इसकी तबीयत ठीक है। उन्हें लगा कि हम एनआरसी में भर्ती कराने को कहेंगे, लेकिन जब हमने बताया कि हम भर्ती कराने के लिए नहीं आए हैं तो सलमा कहने लगीं कि हमारे पति हरियाणा में भट्टे पर मजदूरी करते हैं। अगर इसे लेकर जाएं तो घर का कामकाज कौन देखेगा।

कृषि के लिए यूपी के समृद्ध इलाकों में शुमार मुजफ्फरनगर जिले में भी कुपोषण का निशान पाए जाते हैं। 30 लाख की आबादी वाले जिले के नौ ब्लॉकों और 704 गांवों में कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चे हैं। इलाके का सामाजिक तानाबाना और परिवार की जिम्मेदारी कुपोषण से लड़ाई पर भारी पड़ रहा है। बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं लेकिन न कोई खुलकर बात करने को तैयार है और न इलाज कराने की मंशा दिखती है। कमला नगर क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकत्री चंद्रावती अपने क्षेत्र के 250 परिवार की जिम्मेदारी संभालती हैं। वर्ष 2017 में इनके इलाके में 11 अतिकुपोषित बच्चे थे, जिनकी संख्या वर्ष 2018 में घटकर नौ और 2019 में तीन हो गई लेकिन अब दो वर्षों से तीन से नीचे नहीं आ रही है। अपने घर से ही आंगनबाड़ी केंद्र चला रही चंद्रावती कहती है कि मेरा लक्ष्य होता है तो गर्भ से लेकर प्रसव के बाद करीब 300 दिन तक सतत निगरानी रखी जाए, लेकिन जब किसी के घर में ज्यादा जाती हूं तो लोग एतराज करने लगते हैं।

काश हर कोई समझ ले अपनी जिम्मेदारी
वर्ष 2015 में मुजफ्फरनगर जिला अस्पताल में दस बेड का पोषण एवं पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) शुरू हुआ। जब हम एनआरसी पहुंचे तो दो बच्चे भर्ती थे और आठ बेड खाली पड़े थे। मौके पर मौजूद चिकित्सक ने हमें वह पत्र दिखाया जो दस दिन पहले ही उन्होंने सीएमओ को कुपोषित बच्चों को सेंटर में भर्ती कराने के संबंध में लिखा था। जिसमें लिखा गया कि अगर ओपीडी व आंगनबाड़ी से नियमित बच्चे आएं तो प्रतिवर्ष 300 से 350 बच्चों को कुपोषण से बाहर निकाला जा सकता है। बीते छह वर्ष में सिर्फ 2019 में ही 244  बच्चे यहां से स्वस्थ होकर निकले। बाकी वर्षों में सेंटर की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हुआ।

मिलकर प्रयास जरूरी...

कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को जीतना है तो चौतरफा प्रयास जरूरी हैं। 25 फीसदी मामलों में देखा गया है कि बच्चों के बीच उम्र का अंतर बेहद कम होता है। मां स्वस्थ नहीं होती है तो बच्चा कुपोषित होना का खतरा रहता है। कुपोषण पर जीत के लिए महिलाओं को भी जागरूक करना होगा । उन्हें यह समझना होगा कि दो बच्चों के बीच तीन साल का अंतर जरूरी है। - डॉ. आरती ननदवार, इंचार्ज, पोषण एवं पुनर्वास केंद्र


जिले में पांच प्रतिशत से अधिक कुपोषित

  • जिले में पांच वर्ष तक की आयु के 242832 बच्चे।
  • विभाग ने शून्य से पांच वर्ष तक 220908 यानी 90.97 प्रतिशत का वजन किया ।
  • 10582 बच्चे कुपोषित और 1816 बच्चे अतिकुपोषित मिले।
  • 5.61 प्रतिशत बच्चों को जांच के बाद कुपोषण की श्रेणी में माना गया।

महिलाओं में खून की कमी
तीन वर्षों में 95 महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हुई। हालांकि साल दर साल सुधार आया है। इन मौतों के पीछे एक बड़ा कारण एनीमिक होना भी माना गया। एक से 12 महीने तक के बच्चों ने बीते तीन वर्षों में जान गवाई हैं। इनके पीछे भी गर्भावस्था में महिला के एनीमिक होने को माना गया, जिससे नवजात कुपोषित पैदा हुए।

जिले में इतनी एनीमिक महिलाएं

वर्ष महिलाएं
2017-18 2776
2019-20 2903
अक्तूबर 2020 तक 791

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