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Muzaffarnagar News: मन के नकारात्मक विचारों से होती है क्रोध की उत्पत्ति
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ब्रह्माकुमारीज राजयोग सेवाकेंद्र पर सत्संग का आयोजन किया गया
संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने कहा कि क्षणिक क्रोध या आवेश में मनुष्य कभी ना सुधरने वाली भूल कर बैठता है। क्रोध से मानसिक तनाव बढ़ता है। क्रोध से मनुष्य का विवेक नष्ट होता है। क्रोध के कारण मनोबल और आत्मबल कमजोर हो जाता है।
गांधीनगर में स्थानीय ब्रह्माकुमारीज राजयोग सेवाकेंद्र में आयोजित संत्सग में उन्होंने कहा कि मन में चलने वाले नकारात्मक विचार, शंका, कुशंका, ईष्र्या, घृणा, नफरत अभिमान के कारण ही क्रोध की उत्पति होती है। क्रोध हमारे शरीर में बीमारियों की भी जड़ है। क्रोध से ही आपस में संबंधों में कड़वाहट आती है। जीवन में अनिद्रा, अशांति आती है, तनाव बढ़ता है जिससे व्यक्ति नशा व्यसनों के अधीन हो जाता है। क्रोध मुक्ति के लिए सकारात्मक चिंतन होना चाहिए। सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
शिक्षिका विजयलक्ष्मी बहन ने राजयोग की महत्ता बताई। कहा कि राजयोग से ही हम अपने संस्कारों को सतोप्रधान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। क्रोध मुक्त और तनाव मुक्त रहने के लिए हमें रोजाना ईश्वर का चिंतन, गुणगान करना चाहिए। कार्यक्रम में सुनीता और प्रतीज्ञा आदि मौजूद रहे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने कहा कि क्षणिक क्रोध या आवेश में मनुष्य कभी ना सुधरने वाली भूल कर बैठता है। क्रोध से मानसिक तनाव बढ़ता है। क्रोध से मनुष्य का विवेक नष्ट होता है। क्रोध के कारण मनोबल और आत्मबल कमजोर हो जाता है।
गांधीनगर में स्थानीय ब्रह्माकुमारीज राजयोग सेवाकेंद्र में आयोजित संत्सग में उन्होंने कहा कि मन में चलने वाले नकारात्मक विचार, शंका, कुशंका, ईष्र्या, घृणा, नफरत अभिमान के कारण ही क्रोध की उत्पति होती है। क्रोध हमारे शरीर में बीमारियों की भी जड़ है। क्रोध से ही आपस में संबंधों में कड़वाहट आती है। जीवन में अनिद्रा, अशांति आती है, तनाव बढ़ता है जिससे व्यक्ति नशा व्यसनों के अधीन हो जाता है। क्रोध मुक्ति के लिए सकारात्मक चिंतन होना चाहिए। सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
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शिक्षिका विजयलक्ष्मी बहन ने राजयोग की महत्ता बताई। कहा कि राजयोग से ही हम अपने संस्कारों को सतोप्रधान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। क्रोध मुक्त और तनाव मुक्त रहने के लिए हमें रोजाना ईश्वर का चिंतन, गुणगान करना चाहिए। कार्यक्रम में सुनीता और प्रतीज्ञा आदि मौजूद रहे।
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