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डीएम-एसएसपी के तबादले ने डाला था आग में घी
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डीएम और एसएसपी के तबादले से बिगड़ा था माहौल
मुजफ्फरनगर। कवाल गांव में सरेआम सड़क पर सचिन और गौरव की हत्या के बाद पनपे आक्रोश को देखते हुए तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने आरोपियों की गिरफ्तारी को अभियान चलाया था। तत्कालीन सरकार के कुछ सपा नेताओं ने लखनऊ में दबाव बनाकर दोनो अफसरों का तबादला करा दिया। इससे एक वर्ग विशेष में यह संदेश गया कि सरकार आरोपियों को बचाने का काम कर रही है, जिसका पूरे जिले में रिएक्शन हुआ। माना गया था कि यदि दोनों अफसरों का तबादला न होता तो दंगे के हालात नहीं बनते।
27 अगस्त 2013 से पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि मुजफ्फरनगर में दंगा हो सकता है। तत्कालीन सपा सरकार की अदूरदर्शिता और जिले के एक वर्ग के सत्ता में हस्तक्षेप रखने वाले नेताओं की जल्दबाजी ने ये हालात पैदा किए। कवाल में घटना के बाद तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को कंट्रोल कर लिया था। पुलिस ने कवाल गांव को घेरकर आरोपियों के घरों में छापामारी और धरपकड़ शुरू कर दी थी। सत्ता में हस्तक्षेप रखने वाले जिले के कुछ सपा नेताओं ने लखनऊ में माहौल बनाया कि दोनों अधिकारी एक वर्ग विशेष का उत्पीड़न कर रहे हैं। शासन ने भी अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए दोनों अफसरों का उसी दिन तबादला कर दिया। इसका पूरे जिले में इतना रिएक्शन हुआ कि एक वर्ग में आक्रोश पनप गया, उसका पुलिस और सरकार दोनों से विश्वास उठ गया। यह अफवाह फैल गई कि सत्ताधारी नेताओं ने थाने में पहुंचकर सभी आरोपियों को छुड़ा दिया। यह आक्रोश पंचायत के रूप में फूटा और हालात इतने खराब हुए कि सरकार और प्रशासन सब फेल हो गए। जिले में दंगे में 65 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यदि डीएम और एसएसपी का तबादला न होता तो हो सकता था जिले में दंगा न होता।
दोनों अफसरों ने जीता था जनता का विश्वास
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड से कुछ दिन पहले ही ईद के दिन तावली गांव में एक व्यक्ति की मस्जिद के गेट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के दस मिनट के अंदर ही मौके पर पहुंचकर डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने स्थिति को कंट्रोल किया। आरोपी को गिरफ्तार किया और लोगों को शांत किया। आक्रोशित जनता को शांत करने में कई मुस्लिम नेताओं का भी सहयोग लिया। एक मायने में यह घटना कवाल की घटना से भी बड़ी थी, लेकिन अफसरों की सूझबूझ से काबू पा लिया गया। इन दोनो अफसरों ने अपने कार्यकाल में हालात को कभी भी बेकाबू नहीं होने दिया। इनके तबादले के बाद आए अफसर स्थिति को भांप ही नहीं सका।
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मुजफ्फरनगर। कवाल गांव में सरेआम सड़क पर सचिन और गौरव की हत्या के बाद पनपे आक्रोश को देखते हुए तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने आरोपियों की गिरफ्तारी को अभियान चलाया था। तत्कालीन सरकार के कुछ सपा नेताओं ने लखनऊ में दबाव बनाकर दोनो अफसरों का तबादला करा दिया। इससे एक वर्ग विशेष में यह संदेश गया कि सरकार आरोपियों को बचाने का काम कर रही है, जिसका पूरे जिले में रिएक्शन हुआ। माना गया था कि यदि दोनों अफसरों का तबादला न होता तो दंगे के हालात नहीं बनते।
27 अगस्त 2013 से पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि मुजफ्फरनगर में दंगा हो सकता है। तत्कालीन सपा सरकार की अदूरदर्शिता और जिले के एक वर्ग के सत्ता में हस्तक्षेप रखने वाले नेताओं की जल्दबाजी ने ये हालात पैदा किए। कवाल में घटना के बाद तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को कंट्रोल कर लिया था। पुलिस ने कवाल गांव को घेरकर आरोपियों के घरों में छापामारी और धरपकड़ शुरू कर दी थी। सत्ता में हस्तक्षेप रखने वाले जिले के कुछ सपा नेताओं ने लखनऊ में माहौल बनाया कि दोनों अधिकारी एक वर्ग विशेष का उत्पीड़न कर रहे हैं। शासन ने भी अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए दोनों अफसरों का उसी दिन तबादला कर दिया। इसका पूरे जिले में इतना रिएक्शन हुआ कि एक वर्ग में आक्रोश पनप गया, उसका पुलिस और सरकार दोनों से विश्वास उठ गया। यह अफवाह फैल गई कि सत्ताधारी नेताओं ने थाने में पहुंचकर सभी आरोपियों को छुड़ा दिया। यह आक्रोश पंचायत के रूप में फूटा और हालात इतने खराब हुए कि सरकार और प्रशासन सब फेल हो गए। जिले में दंगे में 65 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यदि डीएम और एसएसपी का तबादला न होता तो हो सकता था जिले में दंगा न होता।
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दोनों अफसरों ने जीता था जनता का विश्वास
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड से कुछ दिन पहले ही ईद के दिन तावली गांव में एक व्यक्ति की मस्जिद के गेट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के दस मिनट के अंदर ही मौके पर पहुंचकर डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने स्थिति को कंट्रोल किया। आरोपी को गिरफ्तार किया और लोगों को शांत किया। आक्रोशित जनता को शांत करने में कई मुस्लिम नेताओं का भी सहयोग लिया। एक मायने में यह घटना कवाल की घटना से भी बड़ी थी, लेकिन अफसरों की सूझबूझ से काबू पा लिया गया। इन दोनो अफसरों ने अपने कार्यकाल में हालात को कभी भी बेकाबू नहीं होने दिया। इनके तबादले के बाद आए अफसर स्थिति को भांप ही नहीं सका।
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