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मां मंशादेवी करती हैं भक्तों की मन्नत पूरी
Updated Sat, 23 Sep 2017 01:27 AM IST
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मंशा देवी पूर्ण करती हैं मन की मुराद
रतनपुरी/मुजफ्फरनगर।
रतनपुरी स्थित मां मंशा देवी का मंदिर विशेष स्थान रखता है। यहां मंशा देवी की मूर्ति जमीन से प्रकट हुई थी, जिसके बाद गांव वालों ने मंदिर की स्थापना कराई। मान्यता है कि मंदिर में मां के दर्शन करने और प्रसाद चढ़ाने पर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती हैं।
मां मंशा देवी मंदिर का 45 वर्ष पुराना इतिहास है। बताते हैं कि गांव के किसान रुमाल सिंह और शंभू पुत्र मामराज खेत में हल चला रहे थे, तभी खेत से उनका हल जमीन में किसी वस्तु से टकरा गया। हल रोककर देखा तो उन्हें मंशा देवी माता की पत्थर की मूर्ति जमीन में दबी मिली। दोनों भाइयों ने मूर्ति को तो निकाल लिया, लेकिन हल चलाना जारी रखा। खेत में हल चलाने पर दोनों के परिवारों को बाद में नुकसान उठाना पड़ा। गांव में सूचना फैली तो तांता लग गया, तब ग्राम प्रधान धूम सिंह, नाहर सिंह, दयानंद पंडित, जगदीश हाथी, मेघा ठाकुर, बुद्ध सिंह हवलदार आदि ने लोगों की मदद से भवन बनाकर उसमें मूर्ति को विराजमान कराया, तभी से यहां नवरात्र के बाद पड़ने वाली चतुर्दशी को मेला लगना शुरू हो गया। नवरात्र के दिनों में यहां पर मुजफ्फरनगर, मेरठ, सरधना, शामली, कैराना समेत दूरदराज के श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। पुजारी का कार्य पंडित सोमदत्त शर्मा बताते हैं कि नवरात्र के दिनों में मंदिर में काफी भीड़ रहती है। मां के दर्शन कर दुखी, पीड़ितों और रोगियों को राहत मिलती है।
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रतनपुरी/मुजफ्फरनगर।
रतनपुरी स्थित मां मंशा देवी का मंदिर विशेष स्थान रखता है। यहां मंशा देवी की मूर्ति जमीन से प्रकट हुई थी, जिसके बाद गांव वालों ने मंदिर की स्थापना कराई। मान्यता है कि मंदिर में मां के दर्शन करने और प्रसाद चढ़ाने पर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती हैं।
मां मंशा देवी मंदिर का 45 वर्ष पुराना इतिहास है। बताते हैं कि गांव के किसान रुमाल सिंह और शंभू पुत्र मामराज खेत में हल चला रहे थे, तभी खेत से उनका हल जमीन में किसी वस्तु से टकरा गया। हल रोककर देखा तो उन्हें मंशा देवी माता की पत्थर की मूर्ति जमीन में दबी मिली। दोनों भाइयों ने मूर्ति को तो निकाल लिया, लेकिन हल चलाना जारी रखा। खेत में हल चलाने पर दोनों के परिवारों को बाद में नुकसान उठाना पड़ा। गांव में सूचना फैली तो तांता लग गया, तब ग्राम प्रधान धूम सिंह, नाहर सिंह, दयानंद पंडित, जगदीश हाथी, मेघा ठाकुर, बुद्ध सिंह हवलदार आदि ने लोगों की मदद से भवन बनाकर उसमें मूर्ति को विराजमान कराया, तभी से यहां नवरात्र के बाद पड़ने वाली चतुर्दशी को मेला लगना शुरू हो गया। नवरात्र के दिनों में यहां पर मुजफ्फरनगर, मेरठ, सरधना, शामली, कैराना समेत दूरदराज के श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। पुजारी का कार्य पंडित सोमदत्त शर्मा बताते हैं कि नवरात्र के दिनों में मंदिर में काफी भीड़ रहती है। मां के दर्शन कर दुखी, पीड़ितों और रोगियों को राहत मिलती है।
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