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भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर विशेष:-
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मुजफ्फरनगर। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय की धर्म और देश सेवा की स्वर्णिम जीवन यात्रा को साहित्यकार पंडित सीताराम चतुर्वेदी ने अपनी कलम से सजाया था। वे महामना के निजी सचिव रहे और मुजफ्फरनगर में वेदपाठी भवन की स्थापना की। वाराणसी में मालवीय के साथ बीते समय की स्मृतियां जिले में भी बसी है।
शहर के पंचमुखी में स्थित वेदपाठी भवन में महामना मालवीय के व्यक्तित्व की अमिट यादें जुड़ी है। काशी में कई दशक तक उनके निजी सचिव रहे पंडित सीताराम चतुर्वेदी के साहित्य में मालवीय के जीवन चरित्र की खूबियों को संजोया गया है। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहने के बावजूद उन्होंने काशी में हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण कर अंग्रेजी हुकूमत में अतुलनीय संकल्प को पूरा किया था। सनातन धर्म और देश सेवा में आयु के 75 वर्ष बीत चुके थे। श्री मालवीय जीवन चरित्र समिति का गठन राजा ज्वाला प्रसाद के संरक्षण में किया गया। समिति अध्यक्ष रामनारायण मिश्र और वाचस्पति उपाध्याय ने महामना के निजी सचिव चतुर्वेदी को उनका जीवन ग्रंथ लिखने का दायित्व दिया। हालांकि उन दिनों चतुर्वेदी अस्वस्थ थे, लेकिन ईश्वरीय प्रेरणा से उन्होंने महामना के त्याग, परिश्रम, शिष्टाचार और देश प्रेम को अपने शब्दों में पिरोने का दृढ़ संकल्प लिया। पूरे भारत से मालवीय की जीवन यात्रा के अंशों को जुटाया गया। प्रोफेसर हरिकृष्ण दास मलकानी ने मदद की। नि:स्वार्थ भाव से चतुर्वेदी ने यह ग्रंथ हिंदी भाषा में लिखा। 5 जनवरी 1937 को काशी के हिंदू विश्वविद्यालय में महामना की जयंती महोत्सव मनाया गया, जिसमें चतुर्वेदी के ग्रंथ का लोकार्पण हुआ। उन यादगार क्षणों में पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा था कि हर जन्म में भारत मां की सेवा करना चाहूंगा, यही मेरी भगवान से प्रार्थना होगी। साहित्यकार चतुर्वेदी के पुत्र प्रियशील चतुर्वेदी बताते है कि महामना जैसे महापुरुष के जीवन को ग्रंथ रुप में प्रस्तुत करने का कार्य अमूल्य था। जीवन प्रयत्न साहित्यकार पंडित सीताराम चतुर्वेदी की यादों में मालवीय बसे रहे।
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शहर के पंचमुखी में स्थित वेदपाठी भवन में महामना मालवीय के व्यक्तित्व की अमिट यादें जुड़ी है। काशी में कई दशक तक उनके निजी सचिव रहे पंडित सीताराम चतुर्वेदी के साहित्य में मालवीय के जीवन चरित्र की खूबियों को संजोया गया है। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहने के बावजूद उन्होंने काशी में हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण कर अंग्रेजी हुकूमत में अतुलनीय संकल्प को पूरा किया था। सनातन धर्म और देश सेवा में आयु के 75 वर्ष बीत चुके थे। श्री मालवीय जीवन चरित्र समिति का गठन राजा ज्वाला प्रसाद के संरक्षण में किया गया। समिति अध्यक्ष रामनारायण मिश्र और वाचस्पति उपाध्याय ने महामना के निजी सचिव चतुर्वेदी को उनका जीवन ग्रंथ लिखने का दायित्व दिया। हालांकि उन दिनों चतुर्वेदी अस्वस्थ थे, लेकिन ईश्वरीय प्रेरणा से उन्होंने महामना के त्याग, परिश्रम, शिष्टाचार और देश प्रेम को अपने शब्दों में पिरोने का दृढ़ संकल्प लिया। पूरे भारत से मालवीय की जीवन यात्रा के अंशों को जुटाया गया। प्रोफेसर हरिकृष्ण दास मलकानी ने मदद की। नि:स्वार्थ भाव से चतुर्वेदी ने यह ग्रंथ हिंदी भाषा में लिखा। 5 जनवरी 1937 को काशी के हिंदू विश्वविद्यालय में महामना की जयंती महोत्सव मनाया गया, जिसमें चतुर्वेदी के ग्रंथ का लोकार्पण हुआ। उन यादगार क्षणों में पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा था कि हर जन्म में भारत मां की सेवा करना चाहूंगा, यही मेरी भगवान से प्रार्थना होगी। साहित्यकार चतुर्वेदी के पुत्र प्रियशील चतुर्वेदी बताते है कि महामना जैसे महापुरुष के जीवन को ग्रंथ रुप में प्रस्तुत करने का कार्य अमूल्य था। जीवन प्रयत्न साहित्यकार पंडित सीताराम चतुर्वेदी की यादों में मालवीय बसे रहे।
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