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फिर शुरू होगी पूजन के लिए कन्याओं की तलाश
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मुजफ्फरनगर। नवरात्र समाप्त होते ही एक बार फिर कन्याओं की कमी अखरेगी। नवरात्र व्रत तभी फलीभूत माना जाता है, जब आखिरी दिन नौ कन्याओं को भोजन कराकर पूजन किया जाता है, लेकिन नौ कन्याएं जुटाने में श्रद्घालुओं के पसीने छूट जाते हैं। दरअसल, जिले का लिंगानुपात आज भी प्रदेश से कम है। बीते नौ वर्षों में यह थोड़ा सुधरकर 904 पर आ गया है, लेकिन समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई आज भी जड़ जमाए है।
शनिवार को नवरात्र व्रत का समापन हो गया है। व्रत रखने वाले सभी श्रद्घालु कन्याओं को भोजन खिलाकर उनकी पूजा करते हैं। नौ कन्याओं का पूजन करना अनिवार्य होता है तभी नवरात्र के व्रत का अनुष्ठान पूरा माना जाता है। प्रत्येक नवरात्र व्रत के समापन पर श्रद्घालुओं को कन्याओं को ढूंढते तथा उन्हें भोजन कराने के लिए न्यौता देने में पसीना बहाना पड़ता है। शहर के कई मोहल्लों में तो कन्याएं मिलती भी नहीं हैं। दरअसल समाज में आज भी एक बड़ा तबका ऐसा है जिसमें कन्या के जन्म को सही नहीं माना जाता। परिवार में बेटी हो जाए तो खुशियां नहीं मनाई जाती। यही कारण है कि जनसंख्या में महिला-पुरुष के अनुपात में काफी अंतर है। इसमें बड़ा सुधार होता नजर नहीं आ रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले में बालक-बालिका का अनुपात एक हजार पुरुषों पर 889 बालिकाओं का था, जबकि प्रदेश में यह अनुपात एक हजार पुरुषों पर 912 का था। करीब नौ साल बीत जाने के बाद भी इस अंतर की खाई को बहुत ज्यादा पाटा नहीं जा सका है। लिंगानुपात में सुधार तो हुआ है, लेकिन प्रदेश के बराबर अभी भी नहीं पहुंच सका। वर्तमान में मुजफ्फरनगर जनपद का लिंगानुपात एक हजार बालकों पर 904 है। जब तक बालक-बालिकाओं की जनसंख्या का यह अंतर खत्म नहीं होगा, हर बार पूजन के लिए कन्याओं को लेकर मारामारी मची रहेगी।
जिले में लिंगानुपात में सुधार हुआ है। मगर, इसमें अभी और सुधार की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। भ्रूण जांच नहीं करने के लिए अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर सख्ती बरती जाती है। यदि कहीं शिकायत मिलती है तो कार्रवाई की जाती है। - डा. पीएस मिश्रा, सीएमओ।
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शनिवार को नवरात्र व्रत का समापन हो गया है। व्रत रखने वाले सभी श्रद्घालु कन्याओं को भोजन खिलाकर उनकी पूजा करते हैं। नौ कन्याओं का पूजन करना अनिवार्य होता है तभी नवरात्र के व्रत का अनुष्ठान पूरा माना जाता है। प्रत्येक नवरात्र व्रत के समापन पर श्रद्घालुओं को कन्याओं को ढूंढते तथा उन्हें भोजन कराने के लिए न्यौता देने में पसीना बहाना पड़ता है। शहर के कई मोहल्लों में तो कन्याएं मिलती भी नहीं हैं। दरअसल समाज में आज भी एक बड़ा तबका ऐसा है जिसमें कन्या के जन्म को सही नहीं माना जाता। परिवार में बेटी हो जाए तो खुशियां नहीं मनाई जाती। यही कारण है कि जनसंख्या में महिला-पुरुष के अनुपात में काफी अंतर है। इसमें बड़ा सुधार होता नजर नहीं आ रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले में बालक-बालिका का अनुपात एक हजार पुरुषों पर 889 बालिकाओं का था, जबकि प्रदेश में यह अनुपात एक हजार पुरुषों पर 912 का था। करीब नौ साल बीत जाने के बाद भी इस अंतर की खाई को बहुत ज्यादा पाटा नहीं जा सका है। लिंगानुपात में सुधार तो हुआ है, लेकिन प्रदेश के बराबर अभी भी नहीं पहुंच सका। वर्तमान में मुजफ्फरनगर जनपद का लिंगानुपात एक हजार बालकों पर 904 है। जब तक बालक-बालिकाओं की जनसंख्या का यह अंतर खत्म नहीं होगा, हर बार पूजन के लिए कन्याओं को लेकर मारामारी मची रहेगी।
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जिले में लिंगानुपात में सुधार हुआ है। मगर, इसमें अभी और सुधार की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। भ्रूण जांच नहीं करने के लिए अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर सख्ती बरती जाती है। यदि कहीं शिकायत मिलती है तो कार्रवाई की जाती है। - डा. पीएस मिश्रा, सीएमओ।
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