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ध्रुवीकरण और सौहार्द के बीच जूझती सियासत

Sat, 09 Feb 2019 12:50 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 09 Feb 2019 12:50 AM IST
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ध्रुवीकरण और सौहार्द के बीच जूझती सियासत
ध्रुवीकरण और सौहार्द के बीच जूझती सियासत
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मुजफ्फरनगर। दंगे के बाद से ही यहां सियासत ध्रुवीकरण और सौहार्द के बीच जूझ रही है। कवाल कांड के बाद ध्रुवीकरण इतनी तेजी से बढ़ा कि सांप्रदायिक सौहार्द की बात करने वालों की आवाज मंद पड़ गई। भाईचारे की बात करने वाले नेता सियासत के भंवरजाल में फंस गए। कवाल में सचिन-गौरव की हत्या के मामले में आए निर्णय के बाद आपस में बनी खाई को पाटना और बड़ी चुनौती बन गया है।

1947 में जब देश का बंटवारा हुआ था और पूरे देश में हिंदू-मुस्लिमों के बीच फसाद हुए, ऐसे माहौल में भी मुजफ्फरनगर में कोई सांप्रदायिक संघर्ष नहीं हुआ। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली सहित बड़ी संख्या में लोग यहां से पाकिस्तान गए भी और वहां से भारत आए भी, लेकिन कोई विवाद नहीं हुआ। 27 अगस्त 2013 को कवाल की घटना के बाद ऐसी नजर लगी कि यहां समाज हिंदू-मुस्लिम में बंट गया। इसकी परिणति मुजफ्फरनगर और आसपास में दंगे हुए। 65 निर्दोष लोगों की जानें चली गई। सियासत में इस ध्रुवीकरण का सीधा लाभ भाजपा को हुआ। आपसी सौहार्द की बात करने वाले राजनीतिक दल कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद किनारे पर चले गए। दंगे के बाद खाई और बढ़ती चली गई। लोकसभा, जिला पंचायत, प्रधान और विधानसभा के चुनाव में ध्रुवीकरण को कोई रोक नहीं सका। दंगे के लगभग चार साल बाद कुछ संगठनों और राजनीतिक दलों ने आपसी सौहार्द की पहल शुरू की। बड़ी संख्या में दंगों के मुकदमों में आपसी सहमति पर समझौते कराए गए। सपा और रालोद नेताओं ने आपसी समझौते में अहम भूमिका निभाई। कवाल में हुई सचिन-गौरव की हत्या में भी समझौते का प्रयास किया गया, लेकिन सचिन के पिता रविंद्र ने न्यायालय पर ही विश्वास जताया। इस मामले में गवाहों की गवाही, मौके के सबूतों आदि के आधार पर आरोपियों को दोषी करार देने के बाद उम्रकैद की सजा सुनाई गई। आरोपियों के परिजन सचिन-गौरव से पहले हुई शाहनवाज की हत्या में इंसाफ मांग रहे हैं। न्यायालय का निर्णय लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आया है। इस निर्णय को सियासत अपनी तरीके से प्रयोग करेगी। भाजपा जहां इस मामले को लेकर ध्रुवीकरण कराने का प्रयास करेगी, वहीं सौहार्द की बात करने वाले भाईचारे को धार देंगे। भाईचारे की बात करने वाले सियासतदां के लिए जिले में साढे़ पांच साल से चली आ रही खाई को पाटना बड़ी चुनौती बन गया है। अब देखना यह होगा कि लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण बढे़गा या राजनीति भाईचारे की पटरी पर चढे़गी।
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