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बच्चों के लिए लिखने और बचकाना लिखने में फर्क
Updated Mon, 20 Nov 2017 01:22 AM IST
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मुजफ्फरनगर (मुजफ्फरनगर)।
नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक बाल साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि बच्चों के लिए लिखने और बचकाना लिखने में फर्क है। आज हमारे सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बच्चों के मन में स्थापित किए जाने की चुनौती है।
एसडी डिग्री कॉलेज में सरोकार-2017 के अंतर्गत नए दौर में हिंदी बाल साहित्य की चुनौतियां विषय पर व्याख्यान हुआ। मुख्य अतिथि पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि आज हम बच्चों की पत्रिकाओं में इनकी सामग्री के प्रति संवेदनशील नहीं है। हम गैर जिम्मेदाराना रुप से बाल साहित्य परोस रहे हैं। वर्तमान शिक्षा पद्धति एकालाप पैदा कर रही है। अच्छा बाल साहित्य इस एकालाप को तोड़ता है। इस दौर में समय की चुनौतियां तार्किक और वैज्ञानिक हो गई हैं, लेकिन संपादक बाल साहित्य पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। बच्चा जो चाहता है वह हम नहीं दे रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बाल साहित्य का उपभोक्ता उसका खरीदार नहीं है।
वरिष्ठ साहित्यकार बृजेश मिश्र ने कहा कि आज बच्चों के सामने इलेक्ट्रानिक मीडिया बड़ी चुनौती है। बच्चों को अश्लीलता परोसी जा रही है और देश के कर्णधार चुप हैं। सुशीला शर्मा, विश्वरतन ने विचार रखे। संचालन अमित धर्मसिंह ने किया। संयोजक रोहित कौशिक ने आभार जताया। इस दौरान बच्चों ने प्रदर्शनी भी लगाई। प्रबोद्ध नारायण गौड़, डॉ एससी वार्ष्णेय, मनोज धीमान, जेपी सविता, डॉ एसएन चौहान, हरपाल सिंह, नेमपाल प्रजापति, मनु स्वामी, परमेंद्र सिंह, महेश गौतम, चंद्रकांत कौशिक, सुशीला जोशी, डॉ पुष्पलता, मोहित कौशिक आदि शामिल हुए।
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नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक बाल साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि बच्चों के लिए लिखने और बचकाना लिखने में फर्क है। आज हमारे सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बच्चों के मन में स्थापित किए जाने की चुनौती है।
एसडी डिग्री कॉलेज में सरोकार-2017 के अंतर्गत नए दौर में हिंदी बाल साहित्य की चुनौतियां विषय पर व्याख्यान हुआ। मुख्य अतिथि पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि आज हम बच्चों की पत्रिकाओं में इनकी सामग्री के प्रति संवेदनशील नहीं है। हम गैर जिम्मेदाराना रुप से बाल साहित्य परोस रहे हैं। वर्तमान शिक्षा पद्धति एकालाप पैदा कर रही है। अच्छा बाल साहित्य इस एकालाप को तोड़ता है। इस दौर में समय की चुनौतियां तार्किक और वैज्ञानिक हो गई हैं, लेकिन संपादक बाल साहित्य पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। बच्चा जो चाहता है वह हम नहीं दे रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बाल साहित्य का उपभोक्ता उसका खरीदार नहीं है।
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वरिष्ठ साहित्यकार बृजेश मिश्र ने कहा कि आज बच्चों के सामने इलेक्ट्रानिक मीडिया बड़ी चुनौती है। बच्चों को अश्लीलता परोसी जा रही है और देश के कर्णधार चुप हैं। सुशीला शर्मा, विश्वरतन ने विचार रखे। संचालन अमित धर्मसिंह ने किया। संयोजक रोहित कौशिक ने आभार जताया। इस दौरान बच्चों ने प्रदर्शनी भी लगाई। प्रबोद्ध नारायण गौड़, डॉ एससी वार्ष्णेय, मनोज धीमान, जेपी सविता, डॉ एसएन चौहान, हरपाल सिंह, नेमपाल प्रजापति, मनु स्वामी, परमेंद्र सिंह, महेश गौतम, चंद्रकांत कौशिक, सुशीला जोशी, डॉ पुष्पलता, मोहित कौशिक आदि शामिल हुए।
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