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थोड़ा दें ध्यान तो गुड़ को मिलेगा मुकाम
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थोड़ा दें ध्यान तो गुड़ को मिलेगा मुकाम
मुजफ्फरनगर। औषधीय गुणों से भरपूर गुड़ को कोल्हू संचालकों को थोड़ी सी लापरवाही दूषित कर देती है। उसे चमकदार दिखाने के लिए फिटकरी, हानिकारक रंग और केमिकल का प्रयोग किया जा रहा है। साथ ही साफ-सफाई का ध्यान भी नहीं रखा जाता। यदि इस दिशा में सुधार हो जाए और गुड़ बनाने की प्रक्रिया में पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल हो तो गुड़ अपने पहले जैसे मुकाम को हासिल कर सकेगा।
गुड़ महोत्सव में श्रीराम कॉलेज की बायो टेक्नालॉजी विभाग द्वारा एक टेस्टिंग लैब बनाई गई है। यहां कुछ किसानों ने कोल्हुओं पर बनवाए गए या बाजार से खरीदे गए गुड़ की जांच कराई। अब तक 15 सैंपल की जांच हुई। लैब का संचालन कर रहे एसोसिएट प्रोफेसर डा. सौरभ जैन ने बताया कि दो सैंपल में मिलेनियल येलो कलर पाया गया। एक में पेस्टीसाइड के अंश मिले। कोल्हू संचालकों से बात करने पर पता लगा कि गुड़ बनाने की प्रक्रिया में फिटकरी, रसायनिक रंगों, सल्फर आदि का प्रयोग किया जा रहा है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बाजार से मंगाए गए गुड़ के चार सैंपल में वैक्टीरिया की जांच की गई। इसमें एक में इकोलाई, सेल्मोनेला, एंटेरोकोकस और बोर्डोटेला जैसे पैथोजैनिक वैक्टीरिया मिले। यह गंदे स्थानों पर पाए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि गुड़ बनाने में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा गया। इन वैक्टीरिया से पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं। डा. सौरभ जैन बताते हैं कि गुड़ के लिए कुछ मानक निर्धारित हैं। कोल्हू संचालकों को चाहिए कि वे अपने गुड़ की जांच कराएं और उसे सर्टिफाइड कर बेचें। इससे उन्हें अच्छे दाम मिलेंगे।
कोटिंग कर गुड़ बचाने की कर रहे कोशिश
डा. सौरभ जैन गुड़ को लंबे समय से सुरक्षित रखने के लिए उस पर कोटिंग का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने 40 दिन पूर्व गुड़ पर मीठा नीम (करी पत्ता), तुलसी और एलोवेरा की अलग-अलग कोटिंग कर प्रिजर्व किया है। वह कहते हैं कि बरसात के बात पता चलेगा कि इस कोटिंग का गुड़ पर क्या प्रभाव रहा। यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो कोटिंग के जरिए गुड़ को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
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गुड़ बनाने में प्राकृतिक चीजों का करें प्रयोग
गुड़ को बनाने की प्रक्रिया में यदि प्राकृतिक चीजों का प्रयोग हो तो उसमें हानिकारक तत्व शामिल नहीं होंगे। आर्गेनिक गन्ने से गुड़ उत्पादन करने वाले कटार सिंह बताते हैं कि रस की निखारी के लिए सुकलाई का प्रयोग सबसे बढ़िय़ा हैं। इसके साथ ही सरसों का तेल, खाने का सोडा और दूध का प्रयोग भी बेहतर होता है।
गुड़ के लिए निर्धारित मानक
लक्षण अनुज्ञेय सीमा (पार्ट पर मिलियन)
आद्रर्ता अधिकतम 7.0
सुक्रोस न्यूनतम 70.0
इन्वर्ट शर्करा न्यूनतम 90.0
उपचायक शर्करा अधिकतम 20.0
सल्फेट भस्म अधिकतम 4.0
तनु हाइड्रोलेरिक अम्ल अधिकतम 0.03
बाहरी सामग्री अधिकतम 1.5
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मुजफ्फरनगर। औषधीय गुणों से भरपूर गुड़ को कोल्हू संचालकों को थोड़ी सी लापरवाही दूषित कर देती है। उसे चमकदार दिखाने के लिए फिटकरी, हानिकारक रंग और केमिकल का प्रयोग किया जा रहा है। साथ ही साफ-सफाई का ध्यान भी नहीं रखा जाता। यदि इस दिशा में सुधार हो जाए और गुड़ बनाने की प्रक्रिया में पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल हो तो गुड़ अपने पहले जैसे मुकाम को हासिल कर सकेगा।
गुड़ महोत्सव में श्रीराम कॉलेज की बायो टेक्नालॉजी विभाग द्वारा एक टेस्टिंग लैब बनाई गई है। यहां कुछ किसानों ने कोल्हुओं पर बनवाए गए या बाजार से खरीदे गए गुड़ की जांच कराई। अब तक 15 सैंपल की जांच हुई। लैब का संचालन कर रहे एसोसिएट प्रोफेसर डा. सौरभ जैन ने बताया कि दो सैंपल में मिलेनियल येलो कलर पाया गया। एक में पेस्टीसाइड के अंश मिले। कोल्हू संचालकों से बात करने पर पता लगा कि गुड़ बनाने की प्रक्रिया में फिटकरी, रसायनिक रंगों, सल्फर आदि का प्रयोग किया जा रहा है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बाजार से मंगाए गए गुड़ के चार सैंपल में वैक्टीरिया की जांच की गई। इसमें एक में इकोलाई, सेल्मोनेला, एंटेरोकोकस और बोर्डोटेला जैसे पैथोजैनिक वैक्टीरिया मिले। यह गंदे स्थानों पर पाए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि गुड़ बनाने में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा गया। इन वैक्टीरिया से पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं। डा. सौरभ जैन बताते हैं कि गुड़ के लिए कुछ मानक निर्धारित हैं। कोल्हू संचालकों को चाहिए कि वे अपने गुड़ की जांच कराएं और उसे सर्टिफाइड कर बेचें। इससे उन्हें अच्छे दाम मिलेंगे।
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कोटिंग कर गुड़ बचाने की कर रहे कोशिश
डा. सौरभ जैन गुड़ को लंबे समय से सुरक्षित रखने के लिए उस पर कोटिंग का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने 40 दिन पूर्व गुड़ पर मीठा नीम (करी पत्ता), तुलसी और एलोवेरा की अलग-अलग कोटिंग कर प्रिजर्व किया है। वह कहते हैं कि बरसात के बात पता चलेगा कि इस कोटिंग का गुड़ पर क्या प्रभाव रहा। यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो कोटिंग के जरिए गुड़ को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
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गुड़ बनाने में प्राकृतिक चीजों का करें प्रयोग
गुड़ को बनाने की प्रक्रिया में यदि प्राकृतिक चीजों का प्रयोग हो तो उसमें हानिकारक तत्व शामिल नहीं होंगे। आर्गेनिक गन्ने से गुड़ उत्पादन करने वाले कटार सिंह बताते हैं कि रस की निखारी के लिए सुकलाई का प्रयोग सबसे बढ़िय़ा हैं। इसके साथ ही सरसों का तेल, खाने का सोडा और दूध का प्रयोग भी बेहतर होता है।
गुड़ के लिए निर्धारित मानक
लक्षण अनुज्ञेय सीमा (पार्ट पर मिलियन)
आद्रर्ता अधिकतम 7.0
सुक्रोस न्यूनतम 70.0
इन्वर्ट शर्करा न्यूनतम 90.0
उपचायक शर्करा अधिकतम 20.0
सल्फेट भस्म अधिकतम 4.0
तनु हाइड्रोलेरिक अम्ल अधिकतम 0.03
बाहरी सामग्री अधिकतम 1.5