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दंगे ने दिया दंश, सुलह से जगी उम्मीद
Updated Thu, 15 Feb 2018 12:37 AM IST
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मुजफ्फरनगर।
थमते-थमते थमेंगे आंसू, रोना है कोई हंसी नहीं। दंगे के बाद बने सांप्रदायिक माहौल ने यहां सदियों का ताना-बाना कुछ ही समय में छिन्न-भिन्न कर दिया था। पश्चिम की राजनीति में इन दंगों से लोकसभा चुनाव में शून्य पर आई रालोद, आपसी भाईचारे के दम पर जीत का विकल्प तलाश रही है। नेता तो एक मंच पर आ गए, लेकिन जनता के घाव भरना और सौहार्द का माहौल स्थापित करना इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि रालोद का यह प्रयास विधानसभा चुनाव से पहले से चल रहा है, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने जिले में सांप्रदायिक सौहार्द के लिए कदम उठाए हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय ही कहा जाएगा। हालांकि बीजेपी से बनी दूरियों के बाद रालोद के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं रह जाता है। जिले में 2013 में हुए दंगे के बाद जिस पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, वह रालोद ही है। लोकसभा में रालोद शून्य पर चली गई और विधानसभा में मात्र छपरौली में ही खाता खोल पाई। एकतरफा बहुमत से सत्ता में आई बीजेपी ने उन मुस्लिम नेताओं को भी सोचने को मजबूर कर दिया जो जिले की राजनीति में अपने आपको ताकतवर समझते थे। सपा शासन काल में एंटी जाट राजनीति करने वाले अमीर आलम खां को आखिरकार रालोद की ही शरण में आना पड़ा।
दंगे के दौरान भी वह खासा चर्चाओं में रहे। इसके अलावा कई अन्य मुस्लिम नेता भी रालोद के संपर्क में है। पूर्व विधायक शाहनवाज राना, आमिर अली, सलमान जैदी विधानसभा चुनाव से पहले ही रालोद में आ गए थे। विधानसभा चुनाव में भी रालोद ने जाट-मुस्लिम समीकरण को बनाने का प्रयास किया था, लेकिन यह सफल नहीं हो पाया। लोकसभा चुनाव से पहले अजित सिंह का यह प्रयास क्या रंग दिखाता है, यह तो समय के गर्भ में ही छिपा है, लेकिन नेताओं का मिलन जनता के मिलन से कितना मैच खाता है यह तो 2019 का चुनाव ही बतायेगा।
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जीतना होगा गांव के गरीबों का विश्वास
विधानसभा चुनाव में रालोद का वोटर पूरी तरह अलग-थलग दिखाई दिया था। जाट बाहुल्य गांवों में अन्य अति पिछड़ी जातियों के वोट एक तरफा बीजेपी को चले गए। ऐसे में रालोद बहुत से अपने ही गांवों में हार गई। रालोद को चुनाव जीतने के लिए अपने गांवों के गरीबों का विश्वास भी जीतना होगा, यदि उनमें बीजेपी का माहौल बना रहता है, तो रालोद की राह आसान नहीं होगी।
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थमते-थमते थमेंगे आंसू, रोना है कोई हंसी नहीं। दंगे के बाद बने सांप्रदायिक माहौल ने यहां सदियों का ताना-बाना कुछ ही समय में छिन्न-भिन्न कर दिया था। पश्चिम की राजनीति में इन दंगों से लोकसभा चुनाव में शून्य पर आई रालोद, आपसी भाईचारे के दम पर जीत का विकल्प तलाश रही है। नेता तो एक मंच पर आ गए, लेकिन जनता के घाव भरना और सौहार्द का माहौल स्थापित करना इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि रालोद का यह प्रयास विधानसभा चुनाव से पहले से चल रहा है, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने जिले में सांप्रदायिक सौहार्द के लिए कदम उठाए हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय ही कहा जाएगा। हालांकि बीजेपी से बनी दूरियों के बाद रालोद के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं रह जाता है। जिले में 2013 में हुए दंगे के बाद जिस पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, वह रालोद ही है। लोकसभा में रालोद शून्य पर चली गई और विधानसभा में मात्र छपरौली में ही खाता खोल पाई। एकतरफा बहुमत से सत्ता में आई बीजेपी ने उन मुस्लिम नेताओं को भी सोचने को मजबूर कर दिया जो जिले की राजनीति में अपने आपको ताकतवर समझते थे। सपा शासन काल में एंटी जाट राजनीति करने वाले अमीर आलम खां को आखिरकार रालोद की ही शरण में आना पड़ा।
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दंगे के दौरान भी वह खासा चर्चाओं में रहे। इसके अलावा कई अन्य मुस्लिम नेता भी रालोद के संपर्क में है। पूर्व विधायक शाहनवाज राना, आमिर अली, सलमान जैदी विधानसभा चुनाव से पहले ही रालोद में आ गए थे। विधानसभा चुनाव में भी रालोद ने जाट-मुस्लिम समीकरण को बनाने का प्रयास किया था, लेकिन यह सफल नहीं हो पाया। लोकसभा चुनाव से पहले अजित सिंह का यह प्रयास क्या रंग दिखाता है, यह तो समय के गर्भ में ही छिपा है, लेकिन नेताओं का मिलन जनता के मिलन से कितना मैच खाता है यह तो 2019 का चुनाव ही बतायेगा।
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जीतना होगा गांव के गरीबों का विश्वास
विधानसभा चुनाव में रालोद का वोटर पूरी तरह अलग-थलग दिखाई दिया था। जाट बाहुल्य गांवों में अन्य अति पिछड़ी जातियों के वोट एक तरफा बीजेपी को चले गए। ऐसे में रालोद बहुत से अपने ही गांवों में हार गई। रालोद को चुनाव जीतने के लिए अपने गांवों के गरीबों का विश्वास भी जीतना होगा, यदि उनमें बीजेपी का माहौल बना रहता है, तो रालोद की राह आसान नहीं होगी।