{"_id":"ee5e63a221d78c3ff982837a0b2a0cdb","slug":"muzaffarnagar-riots-victims-pain","type":"story","status":"publish","title_hn":"उन्मादियों ने किया दलितों को भी ‘दर-बदर’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उन्मादियों ने किया दलितों को भी ‘दर-बदर’
कपिल कुमार/मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 14 Sep 2013 12:09 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुजफ्फरनगर में नफरत की आंधी ने लगभग हर गांव के कमजोर तबके को जख्म दिए हैं। सैकड़ों परिवार पलायन कर गए।
विज्ञापन
कुछ जंगलों में छिपे हैं और कुछ गांव के मंदिरों और धर्मशालाओं में पनाह लिए हैं। राहत शिविरों में 41 हजार लोगों के अलावा भी हजारों लोग जान बचाने के लिए जंगल दर जंगल भटक रहे हैं।
बहुसंख्यक आबादी के डर से कमजोर तबके के लोगों को भी पलायन का दंश झेलना पड़ रहा है। जिले के 50 से अधिक गांवों में बवालियों से खौफजदा बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे दूसरे ठिकानों पर शरण लिए हैं।
विज्ञापन
इस बीच प्रशासन ने स्थिति सामान्य होने पर शुक्रवार को सुबह सात बजे से शाम सात बजे (12 घंटे) तक कर्फ्यू में ढील दी है। कहीं से कोई अप्रिय घटना की खबर नहीं है।
विज्ञापन
जिले के शाहपुर, फुगाना और भौराकलां इलाके में उन्माद भड़का तो मजलूम और मजदूर पेशा लोग भी जान बचाने के लिए घर छोड़ आए। बसी कलां में सात सितंबर को भड़की हिंसा ने आसपास के इलाके में दहशत फैला दी।
‘अमर उजाला’ की टीम ने शुक्रवार को शाहपुर इलाके का दौरा किया तो हकीकत सामने आई। बसी कलां के करीब 250 लोग कमालपुर के एक मंदिर में आसरा लिए हैं।
बच्चे भूख से बिलख रहे हैं और महिलाओं की बेबसी साफ दिखती है। परिवार के ज्यादातर पुरुष खेतों में छिपे हैं। दो युवक हमें उस जंगल में ले गए, जहां परिवार के लोग छुपे हुए थे। हमें देखते ही सभी इधर-उधर भागने लगे।
किसी तरह समझाया तो उन्हें भरोसा हुआ। उन्माद के दर्द से बोझिल आंखों में खौफ पसरा था। दलित चंद्रपाल, राजवीर, करण, संजय, रामनिवास, सुनील आदि ने बताया कि बसी कलां में सांप्रदायिक संघर्ष हुआ तो भीड़ उनकी बस्ती में भी पहुंच गई।
किसी तरह वह घरों से निकले और जंगलों में छिप गए। महिलाओं और बच्चों को कमालपुर मंदिर में पहुंचाया। हमें नहीं मालूम कि बस्तियों का क्या हाल हुआ होगा।
प्रशासन एक ही समुदाय को राहत देने में लगा है, उन्हें भी गांव लौटने पर सुरक्षा का भरोसा चाहिए। बसी और कुटबा की हिंसा के बाद आसपास के जंगलों में ऐसे परिवारों की संख्या बहुतायत में है।
फुगाना इलाके के लांक, बहावड़ी, लिसाढ़ के उपद्रव ने गरीब परिवारों को बेघर कर दिया है। उन्माद के खौफ से जिले के 50 से ज्यादा गांवों के मजदूरी करने वाले लोग जान बचाने के लिए गांव छोड़ गए।
गर्भवती की चिंता
राहत शिविरों में बीमार और गर्भवती महिलाओं को फसाद की सबसे बड़ी पीड़ा झेलनी पड़ रही है। शाहपुर और बुढ़ाना के शिविरों में कई महिलाएं बच्चों को जन्म दे चुकी हैं।
कमालपुर में आसरा लिए बसी कलां की गर्भवती ममता भी यही दर्द झेल रही है। बुजुर्ग महिला सतवीरी बताती हैं कि ऐसी मुसीबत कभी नहीं आई। दूसरे गांव में बेघर भी कब तक रहेंगे।
ऐसे शिविरों में बीमार बुजुर्गों और बुखार से पीड़ित बच्चों का दर्द देखा नहीं जाता। इसी मंदिर में वह किशोर भी साथ है, जो मंदबुद्धि होने के साथ विकलांग भी है।