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सृष्टि में जब कुछ भी नहीं था, आदि पुरुष पारब्रह्म मेरी आत्मा के सामने था : फुलसंदे
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मुरादाबाद। रॉयल विला बैंकट हाल में सोमवार को तीन दिवसीय सत्संग का शुभारंभ हुआ। सतपुरुष बाबा फुलसंदे वालों ने कहा कि इस सृष्टि में जब कुछ भी नहीं था वह आदि पुरुष पारब्रह्म ही मेरी आत्मा के सामने था। आदि पुरुष की रोशनी में मैं उसके आगे मस्तक झुकाए उसकी आराधना करता था। उसको सजदे करता था। उन बातों में कुछ बातें मुझे याद रही और बहुत सी बातें मैं भूल गया।
मुरादाबाद के अलावा अमरोहा, बरेली, रामपुर, बिजनौर समेत अन्य जगहों के लोग सत्संग सुनने पहुंचे। दोपहर 1:46 बजे आरती शुरू हुई। इसके बाद भजन किया गया। दोपहर दो बजे बाबा फुलसंदे ने प्रवचन शुरू किया। उन्होंने कहा कि देव आत्माओं के संग-संग मैं स्वर्ग के फूलों को चुगता था। उन फूलों पर परम ब्रह्म के वेद मंत्रों को पढ़कर आदि पुरुष का अभिषेक करता था। उन्होंने कहा कि हे अनंत ब्रह्म, हे परमात्मा उसमें से कुछ आज भी मुझे याद है। बहुत सी बातें मैं भूल चुका हूं। लाखों बरस कभी पतझड़, कभी बहार, कभी बसंत, तहत-तरह के मौसम आते रहते हैं। मनुष्यों का जीवन कभी गरद गुबार से तो कभी ज्ञान की रोशनी से भर जाता है। जो कभी उपवन थे कभी गुलशन थे वह आज भी कहीं-कहीं महकते हैं और कितने ही उजड़ गए उनमें से कुछ मुझे याद आते रहते हैं। बहुत को मैं भूल चुका हूं। हे सनातन शाखा, हे मेरे अनादि मित्र तुम मेरे साथ थे तो पूर्णमासी की रात थी। चारो तरफ उजाला फैला था जब से मेरी आत्मा तुमसे अलग हुई, जुदा हुई फूल भी खिलने बंद हो गए। मेरे आंचल में, मेरे दामन में केवल कुछ दाग बाकी रह गए। इसमें बहुत सी बातें भूल चुका हूं और बहुत सी बातें आज भी मुझे याद हैं।
उन्होंने कहा कि यह दुनिया बनती बिगड़ती रहती है। मनुष्य की कामनाएं अनंत हैं। वह खुशियों को ढूंढता रहता है मगर वह खुशियां उसे प्राप्त नहीं होती हैं। ब्रह्म रूप गुरु के चरणों पर मेरी परछाई रात दिन पड़ी रही। नतमस्तक रही यह जीवन न जाने कहां पर खो गया। ब्रह्मा वेदों का शिल्पी है वह तरह-तरह के मंत्र वेद में लिखता रहता है। यह मन मनुष्य का सुख और दुख का शिल्पी है। मनुष्य स्वयं अपने कर्मों का शिल्पी है। क्या-क्या दुनिया में आकर करता है और क्या इसको करना चाहिए था यही इसे ध्यान ही नहीं रहता। उन्होंने कहा कि तेरे अखंड ध्यान में लीन थी मेरी आत्मा फुलसंदे वाले बाबा कहें सुन मेरे परमात्मा। मेरी आत्मा नाचती फिरी जाने किस-किस गली में कितनी बातें आज भी मुझे याद रहीं और कितनी बातें मैं भूल गया। इसके बाद लोगों ने मंत्र दीक्षा प्राप्त की और भोजन का प्रसाद ग्रहण किया।
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मुरादाबाद के अलावा अमरोहा, बरेली, रामपुर, बिजनौर समेत अन्य जगहों के लोग सत्संग सुनने पहुंचे। दोपहर 1:46 बजे आरती शुरू हुई। इसके बाद भजन किया गया। दोपहर दो बजे बाबा फुलसंदे ने प्रवचन शुरू किया। उन्होंने कहा कि देव आत्माओं के संग-संग मैं स्वर्ग के फूलों को चुगता था। उन फूलों पर परम ब्रह्म के वेद मंत्रों को पढ़कर आदि पुरुष का अभिषेक करता था। उन्होंने कहा कि हे अनंत ब्रह्म, हे परमात्मा उसमें से कुछ आज भी मुझे याद है। बहुत सी बातें मैं भूल चुका हूं। लाखों बरस कभी पतझड़, कभी बहार, कभी बसंत, तहत-तरह के मौसम आते रहते हैं। मनुष्यों का जीवन कभी गरद गुबार से तो कभी ज्ञान की रोशनी से भर जाता है। जो कभी उपवन थे कभी गुलशन थे वह आज भी कहीं-कहीं महकते हैं और कितने ही उजड़ गए उनमें से कुछ मुझे याद आते रहते हैं। बहुत को मैं भूल चुका हूं। हे सनातन शाखा, हे मेरे अनादि मित्र तुम मेरे साथ थे तो पूर्णमासी की रात थी। चारो तरफ उजाला फैला था जब से मेरी आत्मा तुमसे अलग हुई, जुदा हुई फूल भी खिलने बंद हो गए। मेरे आंचल में, मेरे दामन में केवल कुछ दाग बाकी रह गए। इसमें बहुत सी बातें भूल चुका हूं और बहुत सी बातें आज भी मुझे याद हैं।
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उन्होंने कहा कि यह दुनिया बनती बिगड़ती रहती है। मनुष्य की कामनाएं अनंत हैं। वह खुशियों को ढूंढता रहता है मगर वह खुशियां उसे प्राप्त नहीं होती हैं। ब्रह्म रूप गुरु के चरणों पर मेरी परछाई रात दिन पड़ी रही। नतमस्तक रही यह जीवन न जाने कहां पर खो गया। ब्रह्मा वेदों का शिल्पी है वह तरह-तरह के मंत्र वेद में लिखता रहता है। यह मन मनुष्य का सुख और दुख का शिल्पी है। मनुष्य स्वयं अपने कर्मों का शिल्पी है। क्या-क्या दुनिया में आकर करता है और क्या इसको करना चाहिए था यही इसे ध्यान ही नहीं रहता। उन्होंने कहा कि तेरे अखंड ध्यान में लीन थी मेरी आत्मा फुलसंदे वाले बाबा कहें सुन मेरे परमात्मा। मेरी आत्मा नाचती फिरी जाने किस-किस गली में कितनी बातें आज भी मुझे याद रहीं और कितनी बातें मैं भूल गया। इसके बाद लोगों ने मंत्र दीक्षा प्राप्त की और भोजन का प्रसाद ग्रहण किया।
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