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एक्सक्लूसिव : आत्महत्या नहीं जिंदगी के संघर्ष का समाधान, फिर क्यों देते हो जान
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मुरादाबाद। कोरोनाकाल में लोगों की सहन शक्ति कम हुई है। लॉकडाउन के बाद से बेरोजगारी, कारोबार और व्यापार में मंदी और नौकरी जाने से परिवारों के भरण पोषण का दबाव मुख्य वजह रही हैं। मानसिक तनाव और आपसी मनमुटाव से लोगों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं। मुरादाबाद में आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा बेहद डरावना है। पांच महीनों में 92 लोगों ने जिंदगी से हारकर मौत को गले लगाया है। इनमें कोरोना संक्रमित बैंक मैनेजर और हेड कांस्टेबल ने टीएमयू के कोविड वार्ड की खिड़कियों से कूदकर अपनी जान दे दी है।
कोरोनाकाल में अधिकतर लोगों की दिनचर्या ही नहीं बल्कि व्यापार और कारोबार से लेकर नौकरी तक प्रभावित हुई है। इससे तनाव बढ़ा है। जो लोग तनाव से उबर नहीं पाए उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक पिछले पांच महीनों में मुरादाबाद में 102 आत्महत्या करने वालों के पोस्टमार्टम हुए हैं। इनमें 92 लोग मुरादाबाद जिले के हैं। अधिकतर मामलों में कोरोनाकाल के बाद हुई जीवन संघर्ष में विषम परिस्थितियां रही हैं। चिकित्सकों का कहना है कि आत्महत्या किसी भी परेशानी का समाधान नहीं है। आत्महत्या करने वाले पहले ही इंडिकेशन देने लगते हैं। ऐसे लोगों को भावनात्मक सपोर्ट की जरूरत होती है। परिवार में ऐसे लोगों को नजर अंदाज करने से बाद में पछतावे के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता है।
- कोरोनाकाल में अवसाद जैसी स्थिति पैदा हुई है। व्यापार, कारोबार, नौकरी को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ी हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने और परिवार की जिम्मेदारियों से मानसिक स्तर पर दबाव बढ़ा है। तनाव में न्यूरो केमिकल पदार्थों में कमी आ जाती है। इससे दिमाग के सोचने में बदलाव आने लगता है। इसांन अपना धैर्य खो देता है और आत्महत्या के विचार दिमाग में आने लगते हैं। इस विषम परिस्थितियों में सकारात्मक सोच के साथ अच्छे वक्त का इंतजार करना जरूरी है। समय का पहिया हमेशा घूमता रहता है। कोरोना भी खत्म होगा और फिर पहले जैसा वक्त लौटेगा। इस परीक्षा की घड़ी में लोगों को धैर्य बनाना होगा और यदि कोई व्यक्ति हताश हो रहा है तो परिवार और दोस्तों को उसका मनोबल बढ़ाना होगा।
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- प्रेरणा गुप्ता, मनोचिकित्सक टीएमयू
- आत्महत्या जिदंगी के संघर्ष से मुक्ति का समाधान नहीं है। आत्महत्या जैसे कदम इंसान दो परिस्थितियों में उठाता है। इनमें वो लोग जो पहले से दिमागी रूप से बीमार होते हैं और दूसरे वो जो गुस्से को काबू नहीं कर पाते हैं। दोनों ही पस्थितियों में आत्महत्या करने वाला इंडिकेशन देता है। गुमसुम रहने लगता है। चिड़चिड़ा हो जाता है। सोशल नेटवर्किंग पर निराशाजनक कमेंट और पोस्ट करता है। नेट पर आत्महत्या करने की घटनाओं को सर्च करता है। ऐसे लोगों को नजर अंदाज करने के बजाए समझाने और डाक्टर की सलाह की जरूरत है। समझाने और इलाज से उसे बचाया जा सकता है।
- दीक्षांतर गोयल, मनोचिकित्सक।
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कोरोनाकाल में अधिकतर लोगों की दिनचर्या ही नहीं बल्कि व्यापार और कारोबार से लेकर नौकरी तक प्रभावित हुई है। इससे तनाव बढ़ा है। जो लोग तनाव से उबर नहीं पाए उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक पिछले पांच महीनों में मुरादाबाद में 102 आत्महत्या करने वालों के पोस्टमार्टम हुए हैं। इनमें 92 लोग मुरादाबाद जिले के हैं। अधिकतर मामलों में कोरोनाकाल के बाद हुई जीवन संघर्ष में विषम परिस्थितियां रही हैं। चिकित्सकों का कहना है कि आत्महत्या किसी भी परेशानी का समाधान नहीं है। आत्महत्या करने वाले पहले ही इंडिकेशन देने लगते हैं। ऐसे लोगों को भावनात्मक सपोर्ट की जरूरत होती है। परिवार में ऐसे लोगों को नजर अंदाज करने से बाद में पछतावे के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता है।
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- कोरोनाकाल में अवसाद जैसी स्थिति पैदा हुई है। व्यापार, कारोबार, नौकरी को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ी हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने और परिवार की जिम्मेदारियों से मानसिक स्तर पर दबाव बढ़ा है। तनाव में न्यूरो केमिकल पदार्थों में कमी आ जाती है। इससे दिमाग के सोचने में बदलाव आने लगता है। इसांन अपना धैर्य खो देता है और आत्महत्या के विचार दिमाग में आने लगते हैं। इस विषम परिस्थितियों में सकारात्मक सोच के साथ अच्छे वक्त का इंतजार करना जरूरी है। समय का पहिया हमेशा घूमता रहता है। कोरोना भी खत्म होगा और फिर पहले जैसा वक्त लौटेगा। इस परीक्षा की घड़ी में लोगों को धैर्य बनाना होगा और यदि कोई व्यक्ति हताश हो रहा है तो परिवार और दोस्तों को उसका मनोबल बढ़ाना होगा।
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- प्रेरणा गुप्ता, मनोचिकित्सक टीएमयू
- आत्महत्या जिदंगी के संघर्ष से मुक्ति का समाधान नहीं है। आत्महत्या जैसे कदम इंसान दो परिस्थितियों में उठाता है। इनमें वो लोग जो पहले से दिमागी रूप से बीमार होते हैं और दूसरे वो जो गुस्से को काबू नहीं कर पाते हैं। दोनों ही पस्थितियों में आत्महत्या करने वाला इंडिकेशन देता है। गुमसुम रहने लगता है। चिड़चिड़ा हो जाता है। सोशल नेटवर्किंग पर निराशाजनक कमेंट और पोस्ट करता है। नेट पर आत्महत्या करने की घटनाओं को सर्च करता है। ऐसे लोगों को नजर अंदाज करने के बजाए समझाने और डाक्टर की सलाह की जरूरत है। समझाने और इलाज से उसे बचाया जा सकता है।
- दीक्षांतर गोयल, मनोचिकित्सक।