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मुरादाबाद मंडल के साहित्यप्रेमियों को 'बेचैन' कर गया गीतों के 'कुंअर' का जाना
Fri, 30 Apr 2021 02:59 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अभिनव चौहान, मुरादाबाद
अभिनव चौहान, मुरादाबाद
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 30 Apr 2021 02:59 AM IST
सार
- एक जुलाई 1942 को मुरादाबाद के उमरी में हुआ था जन्म, चंदौसी में ली उच्च शिक्षा
- कई पुरस्कारों से हो चुके सम्मानित, नौ गीत, 15 गजल संग्रह सहित 150 पुस्तकों के रचनाकार रहे
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कुंअर बेचैन
विस्तार
हिंदी-उर्दू के काव्य मंचों पर माणिक की तरह चमकने वाले गीतकार कुंअर का जाना मुरादाबाद मंडल के साहित्यप्रेमियों को बेचैन कर गया। उनके निधन की खबर मिलते ही मुरादाबाद और चंदौसी में शोक की लहर दौड़ गई। साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने कहा कि उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए अपूर्णनीय क्षति है। इस सूर्य के अस्त होने के बाद उसके स्थान पर कोई दूसरा सूर्योदय नहीं हो सकता।
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कुंअर बेचैन का जन्म एक जुलाई 1942 को मुरादाबाद के उमरी गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम डा. कुंअर बहादुर सक्सेना था। उन्होंने अपनी सारी शिक्षा चंदौसी के बाहरसैनी इंटर कॉलेज और एसएम डिग्री कॉलेज से हासिल की। इसके बाद वह गाजियाबाद के कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। हिंदी गौरव और साहित्य भूषण जैसे सम्मानों से सम्मानित डा. कुंअर बेचैन ने नौ गीत संग्रहों, 15 गजल संग्रहों और एक महाकाव्य सहित छोटी-बड़ी करीब 150 पुस्तकों की रचना की।
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उनकी समकालीन रहीं कवयित्री डा. मधु चतुर्वेदी ने कहा कि कुंअर बेचैन से मुझे सदा भाई का स्नेह मिला। उनके साथ अनेक संस्मरण हैं। 2014 में अंतिम बार वह मेरे षष्ठीपूर्ति ग्रंथ के विमोचन कार्यक्रम में भी वह गजरौला आए थे। 2017 में लंदन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में मेरा और उनका सम्मान साथ ही किया गया था। उनकी अस्वस्थता की खबर से मन परेशान था। आज उनके निधन की खबर ने मुझे तोड़ दिया है। हिंदी गीतों की जिस वाचिक परंपरा का स्थान वह रिक्त छोड़ गए हैं, उसे भरना असंभव है।
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वरिष्ठ नवगीतकार माहेश्वर तिवारी ने कहा कि हिंदी मंच के लिए और वाचिक परंपरा के लिए कुंअर का जाना बहुत बड़ी क्षति है। हिंदी ग़जल और गीतों पर उनका समान अधिकार था। दो दिन पहले सूचना मिली थी कि उनकी पत्नी स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर आ गई हैं और कुंअर बेचैन भी पहले की अपेक्षा स्वस्थ है। मंच पर उनकी कमी को हमेशा महसूस किया जाता रहेगा, क्योंकि वह जिस मंच पर होते थे तो वह मंच उनके इर्द गिर्द रहता था। इतना अधिक सम्मान पाने के बावजूद बड़ों के प्रति आदर और छोटो के प्रति स्नेह उनके व्यक्तित्व का गुण था।
बोले साहित्यकार :::
गजल, गीत और कविता का बड़ा नुकसान है। कुंअर बेचैन हमारे दौर की शान थे। आम इंसान की अनुभूतियां शब्दों में नहीं बयां नहीं होती हैं, उन्हें वह कविता बनाकर गुनगुनाते थे। हमारी दो विदेश यात्राएं साथ रहीं। वर्ष 2008 में वह पाकिस्तान गए थे। हिंदी कविताओं से उन्होंने देश का सिर गर्व से ऊंचा किया था। दुबई, अमेरिका, लंदन आदि जहां-जहां गए हिंदी भाषा और हिंदी कविता का परचम लहरा कर आए। उनकी प्रतिभा देश की सीमाओं से परे थी। उनके निधन की सूचना से मन बहुत व्यथित है।
- मंसूर उस्मानी, वरिष्ठ शायर
प्रमुख कृतियां : गीत-संग्रह - पिन बहुत सारे, भीतर सांकल : बाहर सांकल, उर्वशी हो तुम, झुलसो मत मोर पंख,
नदी पसीने की, दिन दिवंगत हुए,
ग़जल संग्रह - शामियाने कांच के, महावर इंतजारों का, रस्सियां पानी की, पत्थर की बांसुरी, दीवारों पर दस्तक, नाव बनता हुआ कागज, आग पर कंदील,
आंधियों में पेड़, आंगन की अलगनी, तो सुबह हो, कोई आवाज देता है,
कविता संग्रह : नदी तुम रुक क्यों गईं,
सम्मान : हिंदी साहित्य अवार्ड (1997), उप्र हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान (2002), परिवार पुरस्कार सम्मान, मुंबई (2004), राष्ट्रपति
महामहिम ज्ञानी जैलसिंह एवं महामहिम डा. शंकरदयाल शर्मा द्वारा सम्मानित।