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Moradabad News: 700 रुपये की बंदूक, एक लाख किराया...51 साल बाद भी लाइसेंसी लेने नहीं आया
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अब्दुल सलाम
मुरादाबाद। छजलैट क्षेत्र के किसान शिव कुमार ने 1975 में शहर के एक गन हाउस में अपनी लाइसेंसी बंदूक जमा की थी। करीब 51 साल हो गए लेकिन वह बंदूक लेने नहीं आए। इस बंदूक पर हर महीने 200 रुपये किराया बढ़ रहा है। जो अब एक लाख रुपये तक पहुंच गया। जबकि उन्होंने 51 साल पहले इस बंदूक को महज सात 700 रुपये में खरीदा था। ऐसे ही शहर के 12 गन हाउसों में करीब 1200 से ज्यादा बंदूकें 65 से 40 साल से रखीं हैं।
जिले में करीब 18500 लाइसेंसी असलहे हैं। इनमें बंदूक, पिस्टल, रायफल हैं। करीब पांच हजार से ज्यादा असलहे महिलाओं के नाम पर दर्ज हैं। चुनाव के समय इन असलहों को स्थानीय थानों में जमा करना होता है। इसके अलावा शहर से बाहर जाने पर भी कुछ लोग असलहे जमा कर देते हैं। थानों के अलावा गन हाउसों पर भी असलहे जमा किए जाते हैं। यहां लाइसेंसधारकों को प्रतिमाह दो सौ रुपये किराया देना होता है।
मौजूदा समय में शहर में 12 गन हाउस संचालित हैं। जहां कारतूसों और असलहों की बिक्री होती है। इन गन हाउसों में 1200 से ज्यादा लाइसेंसी बंदूकें रखी हैं। किसी गन हाउस में सौ तो किसी में डेढ़ सौ तक बंदूकें जमा हैं। कोई 1961 से गन हाउस में है तो कोई 1975 से। लेकिन इन्हें कोई लेने नहीं आ रहा है। कुछ असलहों के स्वामियों की मौत भी हो चुकी है। इनका वारिसान नहीं हो सका है। इन बंदूकों का किराया इतना हो गया है कि इसमें नई पिस्टल और रिवाल्वर खरीदी जा सकता है।
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केस-एक
मुरादाबाद। मूंढापांडे क्षेत्र के किसान जलालुद्दीन अहमद ने 1985 में अपनी दो नाली बंदूक गन हाउस में जमा की थी। वह दोबारा पलट कर बंदूक लेने नहीं पहुंचे। दो साै रुपये प्रति माह के हिसाब से बंदूक का किराया 98400 रुपये हो गया है। जब उन्होंने बंदूक खरीदी थी उसकी कीमत छह साै रुपये थी।
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केस-दो
मुरादाबाद। कांठ के किसान राजेश कुमार ने भी चुनाव के दाैरान अपनी लाइसेंसी बंदूक गन हाउस में रखी थी। गन हाउस में बंदूक रखे उन्हेें 46 साल हो गए। उन्होंने बंदूक वापस नहीं लिया। गन हाउस में रखी करीब पांच हजार की उनकी बंदूक का किराया अब एक लाख रुपये से अधिक पहुंच गया है।
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शहर में संचालित गन हाउस
- प्रभात आर्मरी, इंडियन ऑर्म कंपनी, मुरादाबाद ऑर्म स्टोर, नेशनल ऑर्म स्टोर, कमल आर्मरी, राजेश आर्मरी, ताज गन हाउस, इकबाल आर्मरी, एसएम अहमद बुक्श एंड सन, इकबाल गन हाउस, महेंद्र आर्मरी, मान सिंह गन हाउस आदि शामिल है।
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यहां ये बंदूकें जमा हैं
- राइफल, एमएल गन (मदर लोडिंग गन), सिंगल बैरिल (एसबीबीएल), डबल बैरिल, रिवाल्वर, पिस्टल।
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कभी 55 गन हाउस थे, अब बचे सिर्फ 12
मुरादाबाद। कभी शहर में 55 गन हाउस हुआ करते थे। लेकिन आज सिर्फ 12 गन हाउस बचे हैं। नए शस्त्र लाइसेंस कम जारी होने, कारतूस खरीदने के नियमों और शर्तों के कारण ग्राहकों की संख्या में कमी आना है इसकी सबसे बड़ी वजह रही। पिछले कुछ सालों में 43 गन हाउस बंद हो गए।
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बंदूकों को नहीं ले जाने के ये हो सकते हैं कारण
- बंदूक की कीमतों से ज्यादा उनका किराया होना
- कारतूसों की खरीद के कड़े नियम होना
- कारतूसों के खर्च का हिसाब किताब रखना
- बंदूकों को चलन बाजार से खत्म होना
- बंदूकों को लाने ले जाने में मुश्किल होना
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- मेरे यहां करीब 35 बंदूकें जमा हैं। ये बंदूकें 1975 से 1980 के बीच जमा की गईं थीं। इनके स्वामियों से कई बार संपर्क किया गया। लेकिन इन्हें लेने नहीं आता है। कुछ के स्वामियों का निधन भी चुका है। 1975 में जमा की गई बंदूक का किराया 1.22 लाख तक पहुंच चुका है। - अंबर कुमार वर्मा, प्रभात आर्मरी
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- मेरे गन हाउस में सौ से ज्यादा लाइसेंसी बंदूकें जमा हैं। जमा करने के बाद इनके स्वामी असलहों के लेने नहीं आए। असलहों को नहीं लेने की एक वजह उनके वारिसान न होना भी है। जिन लाइसेंसधारकों का निधन हो गया उनके परिवार से कोई नहीं आया। - अशरफ अहमद, इंडिया आर्म कंपनी
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बंदूकों का चलन अब बाहर हो गया है। इसे लेकर चलने में भी परेशानी होती है। जबकि रिवाल्वर पिस्टल को आसानी ले जाया जा सकता है। यही वजह है कि गन हाउसों में जमा सौ से ज्यादा बंदूकों को कोई लेने नहीं आता है। कुछ बंदूकों की कीमत से ज्यादा उनका किराया हो गया है। इसलिए भी लोग लेने नहीं आते हैं। - सरताज अहमद, ताज गन हाउस
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मुरादाबाद। छजलैट क्षेत्र के किसान शिव कुमार ने 1975 में शहर के एक गन हाउस में अपनी लाइसेंसी बंदूक जमा की थी। करीब 51 साल हो गए लेकिन वह बंदूक लेने नहीं आए। इस बंदूक पर हर महीने 200 रुपये किराया बढ़ रहा है। जो अब एक लाख रुपये तक पहुंच गया। जबकि उन्होंने 51 साल पहले इस बंदूक को महज सात 700 रुपये में खरीदा था। ऐसे ही शहर के 12 गन हाउसों में करीब 1200 से ज्यादा बंदूकें 65 से 40 साल से रखीं हैं।
जिले में करीब 18500 लाइसेंसी असलहे हैं। इनमें बंदूक, पिस्टल, रायफल हैं। करीब पांच हजार से ज्यादा असलहे महिलाओं के नाम पर दर्ज हैं। चुनाव के समय इन असलहों को स्थानीय थानों में जमा करना होता है। इसके अलावा शहर से बाहर जाने पर भी कुछ लोग असलहे जमा कर देते हैं। थानों के अलावा गन हाउसों पर भी असलहे जमा किए जाते हैं। यहां लाइसेंसधारकों को प्रतिमाह दो सौ रुपये किराया देना होता है।
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मौजूदा समय में शहर में 12 गन हाउस संचालित हैं। जहां कारतूसों और असलहों की बिक्री होती है। इन गन हाउसों में 1200 से ज्यादा लाइसेंसी बंदूकें रखी हैं। किसी गन हाउस में सौ तो किसी में डेढ़ सौ तक बंदूकें जमा हैं। कोई 1961 से गन हाउस में है तो कोई 1975 से। लेकिन इन्हें कोई लेने नहीं आ रहा है। कुछ असलहों के स्वामियों की मौत भी हो चुकी है। इनका वारिसान नहीं हो सका है। इन बंदूकों का किराया इतना हो गया है कि इसमें नई पिस्टल और रिवाल्वर खरीदी जा सकता है।
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केस-एक
मुरादाबाद। मूंढापांडे क्षेत्र के किसान जलालुद्दीन अहमद ने 1985 में अपनी दो नाली बंदूक गन हाउस में जमा की थी। वह दोबारा पलट कर बंदूक लेने नहीं पहुंचे। दो साै रुपये प्रति माह के हिसाब से बंदूक का किराया 98400 रुपये हो गया है। जब उन्होंने बंदूक खरीदी थी उसकी कीमत छह साै रुपये थी।
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केस-दो
मुरादाबाद। कांठ के किसान राजेश कुमार ने भी चुनाव के दाैरान अपनी लाइसेंसी बंदूक गन हाउस में रखी थी। गन हाउस में बंदूक रखे उन्हेें 46 साल हो गए। उन्होंने बंदूक वापस नहीं लिया। गन हाउस में रखी करीब पांच हजार की उनकी बंदूक का किराया अब एक लाख रुपये से अधिक पहुंच गया है।
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शहर में संचालित गन हाउस
- प्रभात आर्मरी, इंडियन ऑर्म कंपनी, मुरादाबाद ऑर्म स्टोर, नेशनल ऑर्म स्टोर, कमल आर्मरी, राजेश आर्मरी, ताज गन हाउस, इकबाल आर्मरी, एसएम अहमद बुक्श एंड सन, इकबाल गन हाउस, महेंद्र आर्मरी, मान सिंह गन हाउस आदि शामिल है।
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यहां ये बंदूकें जमा हैं
- राइफल, एमएल गन (मदर लोडिंग गन), सिंगल बैरिल (एसबीबीएल), डबल बैरिल, रिवाल्वर, पिस्टल।
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कभी 55 गन हाउस थे, अब बचे सिर्फ 12
मुरादाबाद। कभी शहर में 55 गन हाउस हुआ करते थे। लेकिन आज सिर्फ 12 गन हाउस बचे हैं। नए शस्त्र लाइसेंस कम जारी होने, कारतूस खरीदने के नियमों और शर्तों के कारण ग्राहकों की संख्या में कमी आना है इसकी सबसे बड़ी वजह रही। पिछले कुछ सालों में 43 गन हाउस बंद हो गए।
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बंदूकों को नहीं ले जाने के ये हो सकते हैं कारण
- बंदूक की कीमतों से ज्यादा उनका किराया होना
- कारतूसों की खरीद के कड़े नियम होना
- कारतूसों के खर्च का हिसाब किताब रखना
- बंदूकों को चलन बाजार से खत्म होना
- बंदूकों को लाने ले जाने में मुश्किल होना
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- मेरे यहां करीब 35 बंदूकें जमा हैं। ये बंदूकें 1975 से 1980 के बीच जमा की गईं थीं। इनके स्वामियों से कई बार संपर्क किया गया। लेकिन इन्हें लेने नहीं आता है। कुछ के स्वामियों का निधन भी चुका है। 1975 में जमा की गई बंदूक का किराया 1.22 लाख तक पहुंच चुका है। - अंबर कुमार वर्मा, प्रभात आर्मरी
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- मेरे गन हाउस में सौ से ज्यादा लाइसेंसी बंदूकें जमा हैं। जमा करने के बाद इनके स्वामी असलहों के लेने नहीं आए। असलहों को नहीं लेने की एक वजह उनके वारिसान न होना भी है। जिन लाइसेंसधारकों का निधन हो गया उनके परिवार से कोई नहीं आया। - अशरफ अहमद, इंडिया आर्म कंपनी
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बंदूकों का चलन अब बाहर हो गया है। इसे लेकर चलने में भी परेशानी होती है। जबकि रिवाल्वर पिस्टल को आसानी ले जाया जा सकता है। यही वजह है कि गन हाउसों में जमा सौ से ज्यादा बंदूकों को कोई लेने नहीं आता है। कुछ बंदूकों की कीमत से ज्यादा उनका किराया हो गया है। इसलिए भी लोग लेने नहीं आते हैं। - सरताज अहमद, ताज गन हाउस